श्रीमद भगवद गीता

संत रामपाल जी महाराज द्वारा अनुवादित

गीता अध्याय 10 | Gita Adhyay 10

श्लोक |Shlokas

1-10
11-20
21-30
31-40
41-42
  • अध्याय 10 का श्लोक 1 (भगवान उवाच)

    भूयः, एव, महाबाहो, श्रृृणु, मे, परमम्, वचः,
    यत्, ते, अहम्, प्रीयमाणाय, वक्ष्यामि, हितकाम्यया।।1।।

    अनुवाद: (महाबाहो) हे महाबाहो! (भूयः) फिर (एव) भी (मे) मेरे (परमम्) परम रहस्य और प्रभावयुक्त (वचः) वचनको (श्रृणु) सुन (यत्) जिसे (अहम्) मैं (ते) तुझ (प्रीयमाणाय) अतिशय प्रेम रखनेवालेके लिये (हितकाम्यया) हितकी इच्छासे (वक्ष्यामि) कहूँगा। (1)

    अध्याय 10 का श्लोक 2

    न, मे, विदुः, सुरगणाः, प्रभवम्, न, महर्षयः,
    अहम्, आदिः, हि, देवानाम्, महर्षीणाम्, च, सर्वश्ः।।2।।

    अनुवाद: (मे) मेरी (प्रभवम्) उत्पतिको (न) न (सुरगणाः) देवतालोग जानते हैं और (न) न (महर्षयः) महर्षिजन ही (विदुः) जानते हैं, (हि) क्योंकि (अहम्) मैं (सर्वशः) सब प्रकारसे (देवानाम्) देवताओंका (च) और (महर्षीणाम्) महर्षियोंका भी (आदिः) आदि कारण हूँ। (2)

    अध्याय 10 का श्लोक 3

    यः, माम्, अजम्, अनादिम्, च, वेत्ति, लोकमहेश्वरम्,
    असम्मूढः, सः, मत्र्येषु, सर्वपापैः,प्रमुच्यते।।3।।

    अनुवाद: (यः) जो विद्धान व्यक्ति (माम्) मुझको (च) तथा (अनादिम्) सदा रहने वाले अर्थात् पुरातन (अजम्) जन्म न लेने वाले (लोक महेश्वरम्) सर्व लोकों के महान ईश्वर अर्थात् सर्वोंच्च परमेश्वर को (वेत्ति) जानता है (सः) वह (मत्र्येषु) शास्त्रों को सही जानने वाला अर्थात् वेदों के अनुसार ज्ञान रखने वाला मनुष्यों में (असम्मूढः) ज्ञानवान अर्थात् तत्वदर्शी विद्वान् तत्वज्ञान के आधार से सत्य साधना करके(सर्वपापैः) सम्पूर्ण पापों से (प्रमुच्यते) मुक्त हो जाता है वही व्यक्ति पापों के विषय में विस्तृत वर्णन के साथ कहता है अर्थात् वही सृृष्टि ज्ञान व कर्मों का सही वर्णन करता है अर्थात् अज्ञान से पूर्ण रूप से मुक्त कर देता है। (3)

    अध्याय 10 का श्लोक 4-5

    बुद्धिः, ज्ञानम्, असम्मोहः, क्षमा, सत्यम्, दमः, शमः,
    सुखम्, दुःखम्, भवः, अभावः, भयम्, च, अभयम्, एव, च।।

    अहिंसा, समता, तुष्टिः, तपः, दानम्, यशः, अयशः,
    भवन्ति, भावाः, भूतानाम्, मत्तः, एव, पृथग्विधाः।।4ए 5।।

    अनुवाद: (बुद्धिः) निश्चय करनेकी शक्ति (ज्ञानम्) यथार्थ ज्ञान (असम्मोहः) असंमूढता अर्थात् अज्ञान रूप मोह से रहित (क्षमा) क्षमा (सत्यम्) सत्य (दमः) इन्द्रियोंका वशमें करना, (शमः) मनका निग्रह (एव) तथा (सुखम्,दुःखम्) सुख-दुःख (भवः, अभावः) उत्पति प्रलय (च) और (भयम्, अभयम्) भय-अभय (च) तथा (अहिंसा) अहिंसा (समता) समता (तुष्टिः) संतोष (तपः) तप (दानम्) दान (यशः) कीर्ति और (अयशः) अपकीर्ति (भूतानाम्) प्राणियोंके (पृथग्विधाः) नाना प्रकारके (भावाः) भाव (मतः) नियमानुसार (एव) ही (भवन्ति) होते हैं। (5)

    अध्याय 10 का श्लोक 6

    महर्षयः, सप्त, पूर्वे, चत्वारः, मनवः, तथा,
    मद्भावाः, मानसाः, जाताः, येषाम्, लोके,इमाः,प्रजाः।।6।।

    अनुवाद: (सप्त) सात (महर्षयः) महर्षिजन (चत्वारः) चार उनसे भी (पूर्वे) पूर्व होनेवाले सनकादि (तथा) तथा (मनवः) स्वायम्भुव आदि चैदह मनु ये (मद्भावाः) मुझमें भाववाले सब के सब (मानसाः) मेरे संकल्पसे (जाताः) उत्पन्न हुए हैं (येषाम्) जिनकी (लोके) संसारमें (इमाः) यह (प्रजाः) सम्पूर्ण प्रजा है। (6)

    अध्याय 10 का श्लोक 7

    एताम्, विभूतिम्, योगम्, च, मम, यः, वेत्ति, तत्त्वतः,
    सः, अविकम्पेन, योगेन, युज्यते, न, अत्रा, संशयः।।7।।

    अनुवाद: (यः) जो प्राणी (मम) मेरी (एताम्) इस प्रकार (विभूतिम्) विभूतिको (च) और (योगम्) योगशक्तिको (तत्त्वतः) तत्वसे (वेत्ति) जानता है (सः) वह (अविकम्पेन) निश्चल (योगेन) भक्तियोगसे (युज्यते) युक्त हो जाता है (अत्रा) इसमें (संशयः) संशय (न) नहीं है। (7)

    अध्याय 10 का श्लोक 8

    अहम्, सर्वस्य, प्रभवः, मत्तः, सर्वम्, प्रवर्तते,
    इति, मत्वा, भजन्ते, माम्, बुधाः, भावसमन्विताः।।8।।

    अनुवाद: (अहम्) मैं ही (सर्वस्य) सबका (प्रभवः) उत्पतिका कारण हूँ (मतः) मेरे ज्ञान अनुसार (सर्वम्) सब जगत (प्रवर्तते) चेष्टा करता है (इति) इस प्रकार (मत्वा) समझकर (भावसमन्विताः) श्रद्धा और भक्तिसे युक्त (बुधाः) ज्ञानी भक्तजन जिनको तत्वदर्शी संत नहीं मिला वे (माम्) मुझे ही (भजन्ते) निरन्तर भजते हैं। (8)

    अध्याय 10 का श्लोक 9

    मच्चित्ताः, म०तप्राणाः, बोधयन्तः, परस्परम्,
    कथयन्तः, च, माम्, नित्यम्, तुष्यन्ति, च, रमन्ति, च।।9।।

    अनुवाद: (म०तप्राणाः) मेरे पर आधारित प्राणी (बोधयन्तः) इसीको जानने वाले (च) और (मच्चित्ताः) मेरे में लीन मन वाले (परस्परम्) आपसमें (कथयन्तः) विचार विमर्श करते हुए (च) और (नित्यम्) नित्य (तुष्यन्ति) संतुष्ट होते हैं (च) तथा (माम्) मुझमें (रमन्ति) लीन रहते हैं। (9)

    अध्याय 10 का श्लोक 10

    तेषाम्, सततयुक्तानाम्, भजताम्, प्रीतिपूर्वकम्,
    ददामि, बुद्धियोगम्, तम्, येन, माम्, उपयान्ति, ते।।10।।

    अनुवाद: (तेषाम्) उन (सततयुक्तानाम्) निरन्तर ज्ञान पर विचार विमर्श में लगे हुओं तथा (प्रीतिपूर्वकम्) प्रेमपूर्वक (भजताम्) भजनेवालों को (तम्) उसी सत्रा का (बुद्धियोगम्) ज्ञान योग (ददामि) देता हूँ (येन) जिससे (ते) वे (माम्) मुझको (उपयान्ति) प्राप्त होते हैं। (10)

  • अध्याय 10 का श्लोक 11

    तेषाम्, एव, अनुकम्पार्थम्, अहम्, अज्ञानजम्, तमः,
    नाशयामि, आत्मभावस्थः, ज्ञानदीपेन, भास्वता।।11।।

    अनुवाद: (अहम्) मैं (एव) ही (तेषाम्) उनके ऊपर (अनुकम्पार्थम्) कृप्या करनेके लिये (अज्ञानजम्) अज्ञानसे उत्पन्न (तमः) अन्धकारको (नाशयामि) नष्ट करता हूँ। (आत्मभावस्थः) प्रेतवत् प्रवेश करके आत्मा की तरह शरीर में स्थापित होकर जैसे जीवात्मा बोलती है। उसी भाव से अर्थात् आत्म भाव से आत्मा में स्थित होकर (ज्ञानदीपेन) ज्ञानरूप दीपक (भास्वता) प्रकाशमय करता हूँ। (11)

    अध्याय 10 का श्लोक 12,13 (अर्जुन उवाच)

    परम्, ब्रह्म परम्, धाम, पवित्राम्, परमम्, भवान्,
    पुरुषम्, शाश्वतम्, दिव्यम्, आदिदेवम्, अजम्, विभुम्,

    आहुः, त्वाम्, ऋषयः, सर्वे, देवर्षिः, नारदः, तथा,
    असितः, देवलः, व्यासः, स्वयम्, च, एव, ब्रवीषि, मे।।12 - 13।।

    अनुवाद: (भवान्) आप (परम्) परम (ब्रह्म) ब्रह्म (परम्) परम (धाम) धाम और (परमम्) परम (पवित्राम्) पवित्रा हैं क्योंकि (त्वाम्) आपको (सर्वे) सब (ऋषयः) ऋषिगण (शाश्वतम्) सनातन (दिव्यम्) दिव्य (पुरुषम्) पुरुष एवं (आदिदेवम्) देवोंका भी आदिदेव (अजम्) अजन्मा और (विभुम्) सर्वव्यापी (आहुः) कहते हैं (तथा) वैसे ही (देवर्षिः) देवर्षि (नारदः) नारद तथा (असितः) असित और (देवलः) देवल ऋषि तथा (व्यासः) महर्षि व्यास भी कहते हैं (च) और (स्वयम्) स्वयं आप (एव)ही (मे) मेरे लिए (ब्रवीषि) कहते हैं। (12-13)

    अध्याय 10 का श्लोक 14

    सर्वम्, एतत्, ऋतम्, मन्ये, यत्, माम्, वदसि, केशव,
    न, हि, ते, भगवन्, व्यक्तिम्, विदुः, देवाः, न, दानवाः।।14।।

    अनुवाद: (केशव) हे केशव! (यत्) जो कुछ भी (माम्) मुझको (वदसि) आप कहते हैं (एतत्) इस (सर्वम्) सबको मैं (ऋतम्) सत्य (मन्ये) मानता हूँ। (भगवन्) हे भगवन्! (ते) आपके (व्यक्तिम्) मनुष्य जैसे साकार स्वरूपको (न) न तो (दानवाः) दानव (विदुः) जानते हैं और (न) न (देवाः) देवता (हि) ही। (14)

    अध्याय 10 का श्लोक 15

    स्वयम्, एव, आत्मना, आत्मानम्, वेत्थ, त्वम्,
    पुरुषोत्तम, भूतभावन, भूतेश, देवदेव, जगत्पते।।15।।

    अनुवाद: (भूतभावन) हे प्राणियों को उत्पन्न करनेवाले! (भूतेश) हे प्राणियों के प्रभु! (देवदेव) हे देवोंके देव! (जगत्पते) हे जगत्के स्वामी! (पुरुषोत्तम) हे पुरुषोतम! (त्वम्) आप (स्वयम्) स्वयं (एव) ही (आत्मना) अपनेसे (आत्मानम्) अपनेको (वेत्थ) जानते हैं। (15)

    अध्याय 10 का श्लोक 16

    वक्तुम्, अर्हसि, अशेषेण, दिव्याः, हि, आत्मविभूतयः,
    याभिः, विभूतिभिः, लोकान्, इमान्,त्वम्, व्याप्य, तिष्ठसि।।16।।

    अनुवाद: (हि) क्योंकि (त्वम्) आप ही उन (दिव्याः आत्मविभूतयः) अपनी दिव्य विभूतियोंको (अशेषेण) सम्पूर्णतासे (वक्तुम्) कहनेमें (अर्हसि) समर्थ हैं (याभिः) जिन (विभूतिभिः) विभूतियोंक द्वारा आप (इमान्) इन सब (लोकान्) लोकोंको (व्याप्य) व्याप्त करके (तिष्ठसि) स्थित हैं। (16)

    अध्याय 10 का श्लोक 17

    कथम्, विद्याम्, अहम्, योगिन्, त्वाम्, सदा, परिचिन्तयन्,
    केषु, केषु, च, भावेषु, चिन्त्यः, असि, भगवन्, मया।।17।।

    अनुवाद: (योगिन्) हे योगेश्वर! (अहम्) मैं (कथम्) किस प्रकार (सदा) निरन्तर (परिचिन्तयन्) चिन्तन करता हुआ (त्वाम्) आपको (विद्याम्) जानूँ (च) और (भगवन्) हे भगवन्! आप (केषु, केषु) किन-किन (भावेषु) भावोंमें (मया) मेरे द्वारा (चिन्त्यः) चिन्तन करनेयोग्य (असि) हैं। (17)

    अध्याय 10 का श्लोक 18

    विस्तरेण, आत्मनः, योगम्, विभूतिम्, च, जनार्दन,
    भूयः, कथय, तृप्तिः, हि, श्रृण्वतः, न, अस्ति, मे, अमृृतम्।।18।।

    अनुवाद: (जनार्दन) हे जनार्दन! (आत्मनः) अपनी (योगम्) योगशक्तिको (च) और (विभूतिम्) विभूतिको (भूयः) फिर भी (विस्तरेण) विस्तारपूर्वक (कथय) कहिये (हि) क्योंकि आपके (अमृतम्) अमृतमय वचनांेको (श्रृण्वतः) सुनते हुए (मे) मेरी (तृप्तिः) तृृप्ति (न) नहीं होती अर्थात् (अस्ति) सुननेकी उत्कण्ठा बनी ही रहती है। (18)

    अध्याय 10 का श्लोक 19 (भगवान उवाच)

    हन्त, ते, कथयिष्यामि, दिव्याः, हि, आत्मविभूतयः,
    प्राधान्यतः, कुरुश्रेष्ठ, न, अस्ति, अन्तः, विस्तरस्य, मे।।19।।

    अनुवाद: (कुरुश्रेष्ठ) हे कुरुश्रेष्ठ! (हन्त) अब मैं जो (दिव्याःआत्मविभूतयः) मेरी दिव्य विभूतियाँ हैं (ते) तेरे लिये (प्राधान्यतः) प्रधानतासे (कथयिष्यामि) कहूँगा (हि) क्योंकि (मे) मेरे (विस्तरस्य) विस्तारका (अन्तः) अन्त (न) नहीं (अस्ति) है। (19)

    अध्याय 10 का श्लोक 20

    अहम्, आत्मा, गुडाकेश, सर्वभूताशयस्थितः,
    अहम्, आदिः, च, मध्यम्, च, भूतानाम्, अन्तः, एव, च।।20।।

    अनुवाद: (गुडाकेश) हे अर्जुन! (अहम्) मैं (सर्वभूताशयस्थितः) सब प्राणियों मंे स्थित (आत्मा) आत्मा हूँ अर्थात् आत्मा काल इशारे पर नाचती है इसलिए कहा है (च) तथा (भूतानाम्) सम्पूर्ण प्राणियों का (आदिः) आदि, (मध्यम्) मध्य (च) और (अन्तः) अन्त (च) भी (अहम्) मैं (एव) ही हूँ। (20)

  • अध्याय 10 का श्लोक 21

    आदित्यानाम्, अहम्, विष्णुः, ज्योतिषाम्, रविः, अंशुमान्,
    मरीचिः, मरुताम्, अस्मि, नक्षत्राणाम्, अहम्, शशी।।21।।

    अनुवाद: (अहम्) मैं (आदित्यानाम्) अदितिके बारह पुत्रोंमें (विष्णुः) विष्णु और (ज्योतिषाम्) ज्योतियोंमें (अंशुमान्) किरणोंवाला (रविः) सूर्य (अस्मि) हूँ तथा (अहम्) मैं (मरुताम्) उनचास वायुदेवताओंका (मरीचिः) तेज और (नक्षत्राणाम्) नक्षत्रोंका (शशी) अधिपति चन्द्रमा। (21)

    अध्याय 10 का श्लोक 22

    वेदानाम्, सामवेदः, अस्मि, देवानाम्, अस्मि, वासवः,
    इन्द्रियाणाम्, मनः, च, अस्मि, भूतानाम्, अस्मि, चेतना।।22।।

    अनुवाद: (वेदानाम्) वेदोंमें (सामवेदः) सामवेद (अस्मि) हूँ (देवानाम्) देवोंमें (वासवः) इन्द्र (अस्मि) हूँ, (इन्द्रियाणाम्) इन्द्रियोंमें (मनः) मन (अस्मि) हूँ, (च) और (भूतानाम्) भूतप्राणियोंकी (चेतना) चेतना अर्थात् जीवनीशक्ति (अस्मि) हूँ। (22)

    अध्याय 10 का श्लोक 23

    रुद्राणाम्, शंकरः, च, अस्मि, वित्तेशः, यक्षरक्षसाम्,
    वसूनाम्, पावकः, च, अस्मि, मेरुः, शिखरिणाम्, अहम्।।23।।

    अनुवाद: (रुद्राणाम्) एकादश रुद्रोंमें (शंकरः) शंकर (अस्मि) हूँ (च) और (यक्षरक्षसाम्) यक्ष तथा राक्षसोंमें (वित्तेशः) धनका स्वामी कुबेर हूँ (अहम्) मैं (वसूनाम्) आठ वसुओंमें (पावकः) अग्नि (अस्मि) हूँ (च) और (शिखरिणाम्) शिखरवाले पर्वतोंमें (मेरुः) सुमेरु पर्वत। (23)

    अध्याय 10 का श्लोक 24

    पुरोधसाम्, च, मुख्यम्, माम्, विद्धि, पार्थ, बृहस्पतिम्,
    सेनानीनाम्, अहम्, स्कन्दः, सरसाम्, अस्मि, सागरः।।24।।

    अनुवाद: (पुरोधसाम्) पुरोहितोंमें (मुख्यम्) मुखिया (बृहस्पतिम्) बृहस्पति (माम्) मुझको (विद्धि) जान। (पार्थ) हे पार्थ! (अहम्) मैं (सेनानीनाम्) सेनापतियोंमें (स्कन्दः) स्कन्द (च) और (सरसाम्) जलाशयोंमें (सागरः) समुद्र (अस्मि) हूँ। (24)

    अध्याय 10 का श्लोक 25

    महर्षीणाम्, भृृगुः, अहम्, गिराम्, अस्मि, एकम्, अक्षरम्,
    यज्ञानाम्, जपयज्ञः, अस्मि, स्थावराणाम्, हिमालयः।।25।।

    अनुवाद: (अहम्) मैं (महर्षीणाम्) महर्षियोंमें (भृगुः) भृगु और (गिराम्) शब्दोंमें (एकम्) एक (अक्षरम्) अक्षर अर्थात् ओंकार (अस्मि) हूँ। (यज्ञानाम्) सब प्रकारके यज्ञोंमें (जपयज्ञः) जपयज्ञ और (स्थावराणाम्) स्थिर रहनेवालोंमें (हिमालयः) हिमालय पहाड़ (अस्मि) हूँ। (25)

    अध्याय 10 का श्लोक 26

    अश्वत्थः, सर्ववृृक्षाणाम्, देवर्षीणाम्, च, नारदः,
    गन्धर्वाणाम्, चित्रारथः, सिद्धानाम्,कपिलः,मुनिः।।26।।

    अनुवाद: (सर्ववृृक्षाणाम्) सब वृृक्षोंमें (अश्वत्थः) पीपलका वृृक्ष (देवर्षीणाम्) देवर्षियोंमें (नारदः) नारद मुनि, (गन्धर्वाणाम्) गन्धर्वोंमें (चित्रारथः) चित्रारथ (च) और (सिद्धानाम्) सिद्धोंमें (कपिलः) कपिल (मुनिः) मुनि। (26)

    अध्याय 10 का श्लोक 27

    उच्चैः, श्रवसम्, अश्वानाम्, विद्धि, माम्, अमृतोद्भवम्,
    ऐरावतम्, गजेन्द्राणाम्, नराणाम्, च, नराधिपम्।।27।।

    अनुवाद: (अश्वानाम्) घोड़ोंमें (अमृतोद्भवम्) अमृतके साथ उत्पन्न होनेवाला (उच्चैःश्रवसम्) उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा, (गजेन्द्राणाम्) श्रेष्ठ हाथियोंमें (ऐरावतम्) ऐरावत नामक हाथी (च) और (नराणाम्) मनुष्योंमें (नराधिपम्) राजा (माम्) मुझको (विद्धि) जान। (27)

    अध्याय 10 का श्लोक 28

    आयुधानाम्, अहम्, वज्रम्, धेनूनाम्, अस्मि, कामधुक्,
    प्रजनः, च, अस्मि, कन्दर्पः, सर्पाणाम्, अस्मि, वासुकिः।।28।।

    अनुवाद: (अहम्) मैं (आयुधानाम्) शस्त्रोंमें (वज्रम्) वज्र और (धेनूनाम) गौओंमें (कामधुक्) कामधेनु (अस्मि) हूँ। (प्रजनः) शास्त्रोक्त रीतिसे सन्तानकी उत्पतिका हेतु (कन्दर्पः) कामदेव (अस्मि) हूँ (च) और (सर्पाणाम्) सर्पोंमें (वासुकिः) सर्पराज वासुकि (अस्मि) हूँ। (28)

    अध्याय 10 का श्लोक 29

    अनन्तः, च, अस्मि, नागानाम्, वरुणः, यादसाम्, अहम्,
    पित¤णाम्, अर्यमा, च, अस्मि, यमः, संयमताम्, अहम्।।29।।

    अनुवाद: (अहम्) मैं (नागानाम्) नागोंमें (अनन्तः) शेषनाग (च) और (यादसाम्) जलचरोंका अधिपति (वरुणः) वरुण देवता (अस्मि) हूँ (च) और (पित¤णाम्) पितरोंमें (अर्यमा) अर्यमा नामक पितर तथा (संयमताम्) शासन करनेवालोंमें (यमः) यमराज (अहम्) मैं (अस्मि) हूँ। (29)

    अध्याय 10 का श्लोक 30

    प्रहलादः, च, अस्मि, दैत्यानाम्, कालः, कलयताम्, अहम्,
    मृगाणाम्, च, मृगेन्द्रः, अहम्, वैनतेयः, च, पक्षिणाम्।।30।।

    अनुवाद: (अहम्) मैं (दैत्यानाम्) दैत्योंमें (प्रहलादः) प्रहलाद (च) और (कलयताम्) गणना करनेवालोंका (कालः) समय (अस्मि) हूँ (च) तथा (मृगाणाम्) पशुओंमें (मृगेन्द्रः) मृगराज सिंह (च) और (पक्षिणाम्) पक्षियोंमें (अहम्) मैं (वैनतेयः) गरुड़। (30)

  • अध्याय 10 का श्लोक 31

    पवनः, पवताम्, अस्मि, रामः, शस्त्राभृताम्, अहम्,
    झषाणाम्, मकरः, च, अस्मि, स्त्रोतसाम्, अस्मि, जाह्नवी।।31।।

    अनुवाद: (अहम्) मैं (पवताम्) पवित्रा करनेवालोंमें (पवनः) वायु और (शस्त्राभृृताम्) शस्त्राधारियोंमें (रामः) श्रीराम (अस्मि) हूँ तथा (झषाणाम्) मछलियोंमें (मकरः) मगर (अस्मि) हूँ (च) और (स्त्रोतसाम्) नदियोंमें (जाह्नवी) गंगा (अस्मि) हूँ। (31)

    अध्याय 10 का श्लोक 32

    सर्गाणाम्, आदिः, अन्तः, च, मध्यम्, च, एव, अहम्, अर्जुन,
    अध्यात्मविद्या, विद्यानाम्, वादः, प्रवदताम्, अहम्।।32।।

    अनुवाद: (अर्जुन) हे अर्जुन! (सर्गाणाम्) सृष्टियोंका (आदिः) आदि (च) और (अन्तः) अन्त (च) तथा (मध्यम्) मध्य भी (अहम्) मैं (एव) ही हूँ। (अहम्) मैं (विद्यानाम्) विद्याओंमें (अध्यात्मविद्या) अध्यात्मविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या और (प्रवदताम्) परस्पर विवाद करनेवालोंका (वादः) तत्व-निर्णयके लिये किया जानेवाला वाद हूँ। (32)

    अध्याय 10 का श्लोक 33

    अक्षराणाम्, अकारः, अस्मि, द्वन्द्वः, सामासिकस्य, च,
    अहम्, एव, अक्षयः, कालः, धाता, अहम्, विश्वतोमुखः।।33।।

    अनुवाद: (अहम्) मैं (अक्षराणाम्) अक्षरोंमें (अकारः) ओंकार हूँ (च) और (सामासिकस्य) समासोंमें (द्वन्द्वः) द्वन्द्व नाम समास (अस्मि) हूँ, (अक्षयः) समाप्त न होने वाला (कालः) काल तथा (विश्वतोमुखः) सब ओर मुखवाला विराट्स्वरूप (धाता) धारण करनेवाला भी (अहम्) मैं (एव) ही। (33)

    अध्याय 10 का श्लोक 34

    मृृत्युः, सर्वहरः, च, अहम्, उद्भवः, च, भविष्यताम्,
    कीर्तिः, श्रीः, वाक्, च, नारीणाम्, स्मृृतिः, मेधा, धृृतिः, क्षमा।।34।।

    अनुवाद: (अहम्) मैं (सर्वहरः) सबका नाश करनेवाला (मृत्युः) मृत्यु (च) और (भविष्यताम्) उत्पन्न होनेवालोंका (उद्भवः) उत्पत्ति-हेतु हूँ (च) तथा (नारीणाम्) स्त्रिायोंमें (कीर्तिः) कीर्ति, (श्रीः) श्री, (वाक्) वाक्, (स्मृृतिः) स्मृृति, (मेधा) मेधा, (धृृतिः) धृति (च) और (क्षमा) क्षमा हूँ। (34)

    अध्याय 10 का श्लोक 35

    बृहत्साम, तथा, साम्नाम्, गायत्राी, छन्दसाम्, अहम्,
    मासानाम्, मार्गशीर्षः, अहम्, ऋतूनाम्, कुसुमाकरः।।35।।

    अनुवाद: (तथा) तथा (साम्नाम्) गायन करनेयोग्य श्रूतियोंमें (अहम्) मैं (बृहत्साम) बृहत्साम और (छन्दसाम्) छन्दोंमें (गायत्राी) गायत्राी छन्द हूँ तथा (मासानाम्) महीनोंमें (मार्गशीर्षः) मार्गशीर्ष और (ऋतूनाम्) ऋतुओंमें (कुसुमाकरः) वसन्त (अहम्) मैं। (35)

    अध्याय 10 का श्लोक 36

    द्यूतम्, छलयताम्, अस्मि, तेजः, तेजस्विनाम्, अहम्,
    जयः, अस्मि, व्यवसायः, अस्मि, सत्वम्, सत्ववताम्, अहम्।।36।।

    अनुवाद: (अहम्) मैं (छलयताम्) छल करनेवालोंमें (द्यूतम्) जूआ और (तेजस्विनाम्) प्रभावशाली पुरुषोंका (तेजः) प्रभाव (अस्मि) हूँ। (अहम्) मैं (जयः) विजय (अस्मि) हूँ। (व्यवसायः) निश्चय और (सत्त्ववताम्) सात्त्विक पुरुषोंका (सत्त्वम्) सात्त्विक भाव (अस्मि) हूँ। (36)

    अध्याय 10 का श्लोक 37

    वृष्णीनाम्, वासुदेवः, अस्मि, पाण्डवानाम्, धनजयः,
    मुनीनाम्, अपि, अहम्, व्यासः, कवीनाम्, उशना, कविः।।37।।

    अनुवाद: (वृष्णीनाम्) वृृष्णिवंशियोंमें (वासुदेवः) वासुदेव अर्थात् मैं स्वयं तेरा सखा (पाण्डवानाम्) पाण्डवोंमें (धनजयः) धन×जय अर्थात् तू, (मुनीनाम्) मुनियोंमें (व्यासः) वेदव्यास और (कवीनाम्) कवियोंमें (उशना) शुक्राचार्य (कविः) कवि (अपि) भी (अहम्) मैं ही (अस्मि) हूँ। (37)

    अध्याय 10 का श्लोक 38

    दण्डः, दमयताम्, अस्मि, नीतिः, अस्मि, जिगीषताम्,
    मौनम्, च, एव, अस्मि, गुह्यानाम्, ज्ञानम्, ज्ञानवताम्, अहम्।।38।।

    अनुवाद: (दमयताम्) दमन करनेवालोंका (दण्डः) दण्ड अर्थात् दमन करनेकी शक्ति (अस्मि) हूँ, (जिगीषताम्) जीतनेकी इच्छावालोंकी (नीतिः) नीति (अस्मि) हूँ, (गुह्यानाम्) गुप्त रखने योग्य भावोंका रक्षक (मौनम्) मौन (अस्मि) हूँ (च) और (ज्ञानवताम्) ज्ञानवानोंका (ज्ञानम्) ज्ञान (अहम्) मैं (एव) ही। (38)

    अध्याय 10 का श्लोक 39

    यत्, च, अपि, सर्वभूतानाम्, बीजम्, तत्, अहम्, अर्जुन,
    न, तत्, अस्ति, विना, यत्, स्यात्, मया भूतम्, चराचरम्।।39।।

    अनुवाद: (च) और (अर्जुन) हे अर्जुन! (यत्) जो (सर्वभूतानाम्) सब प्राणियोंकी (बीजम्) उत्पत्तिका कारण है, (तत्) वह (अपि) भी (अहम्) मैं ही हूँ क्योंकि ऐसा (तत्) वह (चराचरम्) चर और अचर कोई भी (भूतम्) प्राणी (न) नहीं (अस्ति) है, (यत्) जो (मया) मुझसे (विना) रहित (स्यात्) हो। (39)

    अध्याय 10 का श्लोक 40

    न, अन्तः, अस्ति, मम, दिव्यानाम्, विभूतीनाम्, परन्तप,
    एषः, तु, उद्देशतः, प्रोक्तः, विभूतेः, विस्तरः, मया।।40।।

    अनुवाद: (परन्तप) हे परंतप! (मम) मेरी (दिव्यानाम्) दिव्य (विभूतीनाम्) विभूतियोंका (अन्तः) अन्त (न) नहीं (अस्ति) है (मया) मैंने अपनी (विभूतेः) विभूतियोंका (एषः) यह (विस्तरः) विस्तार (तु) तो तेरे लिये (उद्देशतः) एकदेशसे अर्थात् संक्षेपसे (प्रोक्तः) कहा है। (40)

  • अध्याय 10 का श्लोक 41

    यत्, यत्, विभूतिमत्, सत्वम्, श्रीमत्, ऊर्जितम्, एव, वा,
    तत्, तत्, एव अवगच्छ, त्वम्, मम्, तेजोंऽशसम्भवम्।। 41।।

    अनुवाद: (यत्) जो (यत्) जो (एव) भी (विभूतिमत्) विभूतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त (श्रीमत्) उच्च नियमित विचार (वा) और (ऊर्जितम्) शक्तियुक्त (सत्वम्) वस्तु है (तत्) उस (तत्) उसको (त्वम्) तू (मम्) मेरे (तेजोंऽश सम्भवम् एव) तेजके अंशकी ही अभिव्यक्ति (अवगच्छ) जान। (41)

    अध्याय 10 का श्लोक 42

    अथवा, बहुना, एतेन, किम्, ज्ञातेन्, तव, अर्जुन,
    विष्टभ्य, अहम्, इदम्, कृृत्स्न्नम्, एकांशेन, स्थितः, जगत्।।42।।

    अनुवाद: (अथवा) अथवा (अर्जुन) हे अर्जुन! (एतेन) इसे (बहुना) बहुत (ज्ञातेन) जाननेसे (तव) तेरा (किम्) क्या प्रयोजन है (अहम्) मैं (इदम्) इस (कृत्स्न्नम्) सम्पूर्ण (जगत्) जगतको अपनी योगशक्तिके (एकांशेन) एक अंशमात्रासे (विष्टभ्य) धारण करके (स्थितः) स्थित हूँ। (42)

    (इति अध्याय दशवाँ)