श्रीमद भगवद गीता

संत रामपाल जी महाराज द्वारा अनुवादित

गीता अध्याय 2 | Gita Adhyay 2

श्लोक |Shlokas

1-10
11-20
21-30
31-40
41-50
51-60
61-70
71-72
  • अध्याय 2 का श्लोक 1 (संजय उवाच)

    तम्, तथा, कृपया, आविष्टम्, अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्,
    विषीदन्तम्, इदम्, वाक्यम्, उवाच, मधुसूदनः।।1।।

    अनुवाद: (तथा) और उस प्रकार (कृपया) करुणासे (आविष्टम्) व्याप्त और (अश्रुपूर्णा कुलेक्षणम्) आँसुओंसे पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रोंवाले (विषीदन्तम्) शोकयुक्त (तम्) मोह रूपी अंधकार में डूबे उस अर्जुनके प्रति (मधुसूदनः) भगवान् मधुसूदनने (इदम्) यह (वाक्यम्) वचन (उवाच) कहा। (1)

    अध्याय 2 का श्लोक 2 (भगवान उवाच)

    कुतः, त्वा, कश्मलम्, इदम्, विषमे, समुपस्थितम्,
    अनार्यजुष्टम्, अस्वग्र्यम्, अकीर्तिकरम्, अर्जुन।।2।।

    अनुवाद: (अर्जुन) हे अर्जुन! (त्वा) तुझे इस (विषमे) दुःखदाई असमयमें (इदम्) यह (कश्मलम्) मोह (कुतः) किस हेतुसे (समुपस्थितम्) प्राप्त हुआ? क्योंकि (अनार्यजुष्टम्) यह अश्रेष्ठ पुरुषोंका चरित है (अस्वग्र्यम्) न स्वर्गको देनेवाला है और (अकीर्तिकरम्) अपकीर्तिको करनेवाला ही है। (2)

    अध्याय 2 का श्लोक 3

    क्लैब्यम्, मा, स्म, गमः, पार्थ, न, एतत्, त्वयि, उपपद्यते,
    क्षुद्रम् हृदयदौर्बल्यम्, त्यक्त्वा, उत्तिष्ठ, परन्तप।।3।।

    अनुवाद: (पार्थ) हे अर्जुन! (क्लैब्यम्) नपंुसकताको (मा, स्म, गमः) मत प्राप्त हो (त्वयि) तुझमें (एतत्) यह (न, उपपद्यते) उचित नहीं जान पड़ती। (परन्तप) हे परंतप! (क्षुद्रम् हृदयदौर्बल्यम्)हृदयकी तुच्छ दुर्बलताको (त्यक्त्वा) त्यागकर (उत्तिष्ठ) युद्धके लिये खड़ा हो जा। (3)

    अध्याय 2 का श्लोक 4 (अर्जुन उवाच)

    कथम्, भीष्मम्, अहम्, सङ्ख्ये, द्रोणम्, च, मधुसूदन,
    इषुभिः, प्रति, योत्स्यामि, पूजार्हौ, अरिसूदन।।4।।

    अनुवाद: (मधुसूदन) हे मधुसूदन! (अहम्) मैं (सङ्ख्ये) रणभूमिमें (कथम्) किस प्रकार (इषुभिः) बाणोंसे (भीष्मम्) भीष्मपितामह (च) और (द्रोणम्) द्रोणाचार्यके (प्रति योत्स्यामि) विरुद्ध लडूँगा? क्योंकि (अरिसूदन) हे अरिसूदन! वे दोनों ही (पूजार्हौ) पूजनीय हैं। (4)

    अध्याय 2 का श्लोक 5

    गुरून्, अहत्वा, हि, महानुभावान्, श्रेयः, भोक्तुम्,
    भैक्ष्यम्, अपि, इह, लोके, हत्वा, अर्थकामान्, तु,
    गुरून्, इह, एव, भुजीय, भोगान्, रुधिरप्रदिग्धान्,।। 5।।

    अनुवाद: (महानुभावान्) महानुभाव (गुरुन्) गुरुजनोंको (अहत्वा) न मारकर मैं (इह) इस (लोके) लोकमें (भैक्ष्यम्) भिक्षाका अन्न (अपि) भी (भोक्तुम्) खाना (श्रेयः) कल्याणकारक समझता हूँ (हि) क्योंकि (गुरुन्) गुरुजनोंको (हत्वा) मारकर भी (इह) इस लोकमें (रुधिरप्रदिग्धान्) रुधिरसे सने हुए (अर्थकामान्) अर्थ और कामरूप (भोगान् एव) भोगोंको ही (तु) तो (भुजीय) भोगूँगा। (5)

    अध्याय 2 का श्लोक 6

    न, च, एतत्, विध्मः, कतरत्, नः, गरीयः, यत्, वा,
    जयेम, यदि, वा, नः, जयेयुः, यान् एव, हत्वा, न,
    जिजीविषामः, ते, अवस्थिताः, प्रमुखे, धार्तराष्ट्राः।।6।।

    अनुवाद: (च) तथा (एतत्) यह (न) नहीं (विध्मः) जानते कि (नः) हमारे लिये युद्ध करना और न करना इन (कतरत्) दोनोंमेंसे कौन-सा (गरीयः) श्रेष्ठ है (यत्, वा) अथवा यह भी नहीं जानते कि (जयेम) उन्हें हम जीतेंगे (यदि, वा) या (नः) हमको वे (जयेयुः) जीतेंगे। और (यान्) जिनको (हत्वा) मारकर हम (न, जिजीविषामः) जीना भी नहीं चाहते (ते) वे (एव) ही (धार्तराष्ट्राः) धृतराष्ट्रके पुत्रा (प्रमुखे) मुकाबलेमें (अवस्थिताः) खड़े हैं। (6)

    अध्याय 2 का श्लोक 7

    कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः, पृच्छामि, त्वाम्,
    धर्मसम्मूढचेताः, यत्, श्रेयः, स्यात्, निश्चितम्, ब्रूहि,
    तत्, मे, शिष्यः, ते, अहम्, शाधि, माम्, त्वाम्, प्रपन्नम्।।7।।

    अनुवाद: (कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः) कायरतारूप दोषसे उपहत हुए स्वभाववाला तथा (धर्मसम्मूढचेताः) धर्मके विषयमें मोहितचित्त हुआ मैं (त्वाम्) आपसे (पृच्छामि) पूछता हूँ कि (यत्) जो साधन (निश्चितम्) निश्चित (श्रेयः) कल्याणकारक (स्यात्) हो (तत्) वह (मे) मेरे लिए (बू्रहि) कहिये क्योंकि (अहम्) मैं (ते) आपका (शिष्यः) शिष्य हूँ इसलिए (त्वाम्) आपके (प्रपन्नम्) शरण हुए (माम्) मुझको (शाधि) शिक्षा दीजिये। (7)

    अध्याय 2 का श्लोक 8

    न, हि, प्रपश्यामि, मम, अपनुद्यात्, यत्, शोकम्, उच्छोषणम्, इन्द्रियाणाम्,
    अवाप्य, भूमौ, असपत्नम्, ऋद्धम्, राज्यम्, सुराणाम्, अपि,च,आधिपत्यम्।।8।।

    अनुवाद: (हि) क्योंकि (भूमौ) भूमिमें (असपत्नम्) निष्कण्टक (ऋद्धम्) धनधान्य-सम्पन्न (राज्यम्) राज्यको (च) और (सुराणाम्) देवताओंके (आधिपत्यम्) स्वामीपनेको (अवाप्य) प्राप्त होकर (अपि) भी मैं उस उपाय को (न) नहीं (प्रपश्यामि) देखता हूँ (यत्) जो (मम) मेरी (इन्द्रियाणाम्) इन्द्रियोंके (उच्छोषणम्) सूखानेवाले (शोकम्) शोकको (अपनुद्यात्) समाप्त कर सकें। (8)

    भावार्थ:- अर्जुन कह रहा है कि भगवन यदि मुझे सारी पृथ्वी का राज्य प्राप्त हो चाहे देवताओं का भी स्वामी अर्थात् इन्द्र पद प्राप्त हो, मैं नहीं देखता हूं कि कोई मुझे युद्ध के लिए तैयार कर सकता है अर्थात् मैं युद्ध नहीं करूंगा, ऐसे कह कर चुप हो गया।

    अध्याय 2 का श्लोक 9

    एवम्, उक्त्वा, हृषीकेशम्, गुडाकेशः, परन्तप,
    न, योत्स्ये, इति, गोविन्दम्, उक्त्वा, तूष्णीम्, बभूव, ह।।9।।

    अनुवाद: (परन्तप) हे राजन्! (गुडाकेशः) निद्राको जीतनेवाले अर्जुन (हृषीकेशम्) अन्तर्यामी श्रीकृष्ण महाराजके प्रति (एवम्) इस प्रकार (उक्त्वा) कहकर फिर (गोविन्दम्) श्रीगोविन्द भगवान्से (न, योत्स्ये) युद्ध नहीं करूँगा (इति) यह (ह) स्पष्ट (उक्त्वा) कहकर (तूष्णीम्) चुप (बभूव) हो गये। (9)

    अध्याय 2 का श्लोक 10

    तम्, उवाच, हृषीकेशः, प्रहसन्, इव, भारत,
    सेनयोः, उभयोः, मध्ये, विषीदन्तम्, इदम्, वचः।।10।।

    अनुवाद: (भारत) हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! (हृषीकेशः) अन्तर्यामी श्रीकृष्ण महाराज (उभयोः) दोनों (सेनयोः) सेनाओंके (मध्ये) बीचमें (विषीदन्तम्) शोक करते हुए (तम्) उस अर्जुनको (प्रहसन्, इव) हँसते हुए से (इदम्) यह (वचः) वचन (उवाच) बोले। (10)

  • अध्याय 2 का श्लोक 11 भगवान उवाच- भगवान बोले

    अशोच्यान्, अन्वशोचः, त्वम्, प्रज्ञावादान्, च, भाषसे,
    गतासून्, अगतासून्, च, न, अनुशोचन्ति, पण्डिताः।।11।।

    अनुवाद: (त्वम्) तू (अशोच्यान्) न शोक करने योग्य मनुष्योंके लिये (अन्वशोचः) शोक करता है (च) और (प्रज्ञावादान्) पण्डितोंके से वचनोंको (भाषसे) कहता है परंतु (गतासून्) जिनके प्राण चले गये हैं उनके लिये (च) और (अगतासून्) जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिए भी (पण्डिताः) पण्डितजन (न, अनुशोचन्ति) शोक नहीं करते। (11)

    अध्याय 2 का श्लोक 12

    न, तु, एव, अहम्, जातु, न, आसम्, न, त्वम्, न, इमे, जनाधिपाः,
    न, च, एव, न, भविष्यामः, सर्वे, वयम्, अतः, परम्।।12।।

    अनुवाद: (न) न (तु) तो ऐसा (एव) ही है कि (अहम्) मैं (जातु) किसी कालमें (न) नहीं (आसम्) था अथवा (त्वम्) तू (न) नहीं था अथवा (इमे) ये (जनाधिपाः) राजालोग (न) नहीं थे (च) और (न) न ऐसा (एव) ही है कि (अतः) इससे (परम्) आगे (वयम्) हम (सर्वे) सब (न) नहीं (भविष्यामः) रहेंगे। (12)

    अध्याय 2का श्लोक 13

    देहिनः, अस्मिन्, यथा, देहे, कौमारम्, यौवनम्, जरा,
    तथा, देहान्तरप्राप्तिः, धीरः, तत्रा, न, मुह्यति।।13।।

    अनुवाद: (यथा) जैसे (देहिनः) जीवात्माकी (अस्मिन्) इस (देहे) देहमें (कौमारम्) बालकपन (यौवनम्) जवानी और (जरा) वृद्धावस्था होती है (तथा) वैसे ही (देहान्तरप्राप्तिः) अन्य शरीरकी प्राप्ति होती है (तत्रा) उस विषयमें (धीरः) धीर पुरुष (न, मुह्यति) मोहित नहीं होता। (13)

    अध्याय 2 का श्लोक 14

    मात्रास्पर्शाः, तु, कौन्तेय, शीतोष्णसुखदुःखदाः,
    आगमापायिनः, अनित्याः, तान्, तितिक्षस्व, भारत।।14।।

    अनुवाद: (कौन्तेय) हे कुन्तीपुत्रा! (शीतोष्णसुखदुःखदाः) सर्दी गर्मी और सुख-दुःखको देनेवाले (मात्रास्पर्शाः) इन्द्रिय और विषयोंके संयोग (तु) तो (आगमापायिनः) उत्पत्ति विनाशशील और (अनित्याः) अनित्य हैं इसलिए (भारत) हे भारत! (तान्) उनको तू (तितिक्षस्व) सहन कर। (14)

    अध्याय 2 का श्लोक 15

    यम्, हि, न, व्यथयन्ति, एते, पुरुषम्, पुरुषर्षभ,
    समदुःखसुखम्, धीरम्, सः, अमृतत्वाय, कल्पते।।15।।

    अनुवाद: (हि) क्योंकि (पुरुषर्षभ) हे पुरुषश्रेष्ठ! (समदुःखसुखम्) दुःख-सुखको समान समझनेवाले (यम्) जिस(धीरम्) धीर अर्थात् तत्वदर्शी (पुरुषम्) पुरुषको (एते) ये (न व्यथयन्ति) व्याकुल नहीं करते (सः) वह (अमृतत्वाय) पूर्ण परमात्मा के आनन्द के (कल्पते) योग्य होता है। (15)

    अध्याय 2 का श्लोक 16

    न, असतः, विद्यते, भावः, न, अभावः, विद्यते, सतः,
    उभयोः, अपि, दृष्टः, अन्तः, तु, अनयोः, तत्त्वदर्शिभिः।।16।।

    अनुवाद: (असतः) असत् वस्तु की तो (भावः) सत्ता (न) नहीं (विद्यते) जानी जाती (तु) और (सतः) सत्का (अभावः) अभाव (न) नहीं (विद्यते) जाना जाता इस प्रकार (अनयोः) इन (उभयोः) दोनों की (अपि) भी (अन्तः) तत्व, वास्तविकता को (तत्त्वदर्शिभिः) तत्वज्ञानी अर्थात् तत्वदर्शी संतों द्वारा (दृष्टः) देखा गया है (इसी का प्रमाण गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में है)। (16)

    अध्याय 2 का श्लोक 17

    अविनाशि, तु, तत्, विद्धि, येन्, सर्वम्, इदम्, ततम्,
    विनाशम्, अव्ययस्य, अस्य, न, कश्चित्, कर्तुम्, अर्हति।।17।।

    अनुवाद: (अविनाशि) नाशरहित (तु) तो तू (तत्) उसको (विद्धि) जान (येन्) जिससे (इदम्) यह (सर्वम्) सम्पूर्ण जगत् दृश्यवर्ग (ततम्) व्याप्त है। (अस्य) इस (अव्ययस्य) अविनाशीका (विनाशम्) विनाश (कर्तुम्) करनेमें (कश्चित) कोई भी (न, अर्हति) समर्थ नहीं है।। (17)

    अध्याय 2 का श्लोक 18

    अन्तवन्तः, इमे, देहाः, नित्यस्य, उक्ताः, शरीरिणः,
    अनाशिनः, अप्रमेयस्य, तस्मात्, युध्यस्व, भारत।।18।।

    अनुवाद: (इमे) ये (देहाः) पंच भौतिक शरीर (अन्तवन्तः) नाशवान् है (शरीरिणः) अविनाशी परमात्मा जो आत्मा सहित शरीर में नित्य रहता है। (अप्रमेयस्य) साधारण साधक पूर्ण परमात्मा व आत्मा के अभेद सम्बन्ध से अपरिचित है इसलिए प्रमाण रहित को (नित्यस्य) आत्मा के साथ नित्य रहने वाला (अनाशिनः) अविनाशी (उक्ताः) कहा गया हैं। (तस्मात्) इसलिये (भारत) हे भरतवंशी अर्जुन! (युध्यस्व) युद्ध कर। (18)

    भावार्थ:- परमात्मा की निराकार शक्ति आत्मा के साथ ऐसे जानों जैसे मोबाइल फोन रेंज से ही कार्य करता है। टाॅवर एक स्थान पर होते हुए भी अपनी रंेज से अपने क्षेत्रा वाले मोबाईल फोन के साथ अभेद है। इसको वही समझ सकता है जो मोबाईल फोन रखता है। इसी प्रकार परमात्मा अपने निज स्थान सत्यलोक में रहता है या जहाँ भी आता जाता है अपनी निराकार शक्ति की रेंज को उसी तरह प्रत्येक ब्रह्मण्ड के प्रत्येक प्राणी व स्थान अर्थात् जड़ व चेतन पर फैलाए रहता है। जैसे सूर्य दूर स्थान पर रहते हुए भी अपना प्रकाश व अदृश्य उष्णता (गर्मी) को अपने क्षमता क्षेत्रा सर्व ब्रह्मण्ड़ों पर कण-कण में फैलाए रहता है। इसी प्रकार परमात्मा के शरीर से निकल रहा प्रकाश व अदृश्य शक्ति सर्व जड़ व चेतन को संभाले हुए है।

    अध्याय 2 का श्लोक 19

    यः, एनम्, वेत्ति, हन्तारम्, यः, च, एनम्, मन्यते, हतम्,
    उभौ तौ, न, विजानीतः, न, अयम्, हन्ति, न, हन्यते।।19।।

    अनुवाद: (यः) जो (एनम्) इसको (हन्तारम्) मारनेवाला (वेत्ति) समझता है (च) तथा (यः) जो (एनम्) इसको (हतम्) मरा (मन्यते) मानता है (तौ) वे (उभौ) दोनों ही (न) नहीं (विजानीतः) जानते क्योंकि (अयम्) वह वास्तवमें (न) न तो किसीको (हन्ति) मारता है और (न) न किसीके द्वारा (हन्यते) मारा जाता है। (19)

    भावार्थ:- पूर्ण ब्रह्म का अभेद सम्बन्ध होने से आत्मा मरती नहीं तथा पूर्ण प्रभु दयालु है वह किसी को मारता नहीं। जो कहे कि आत्मा मरती है व पूर्ण परमात्मा किसी को मारता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं।

    अध्याय 2 का श्लोक 20

    न, जायते, म्रियते, वा, कदाचित्, न, अयम्, भूत्वा, भविता, वा, न,
    भूयः, अजः, नित्यः, शाश्वतः, अयम्, पुराणः, न, हन्यते, हन्यमाने, शरीरे।।20।।

    अनुवाद: (अयम्) यह (कदाचित्) किसी कालमें भी (न) न तो (जायते) जन्मता है (वा) और (न) न (म्रियते) मरता ही है (वा) तथा (न) न यह (भूत्वा) उत्पन्न होकर (भूयः) फिर (भविता) होनेवाला ही है क्योंकि (अयम्) यह (अजः) अजन्मा (नित्यः) नित्य (शाश्वतः) सनातन और (पुराणः) पुरातन है (शरीरे) शरीरके (हन्यमाने) मारे जानेपर भी यह (न) नहीं (हन्यते) मारा जाता। (20)

  • अध्याय 2 का श्लोक 21

    वेद, अविनाशिनम्, नित्यम्, यः, एनम्, अजम्, अव्ययम्,
    कथम्, सः, पुरुषः, पार्थ, कम्, घातयति, हन्ति, कम्।।21।।

    अनुवाद: (पार्थ) हे पृथापुत्रा अर्जुन! (यः) जो व्यक्ति (एनम्) इस आत्म सहित परमात्मा को (अविनाशिनम्) नाशरहित (नित्यम्) नित्य (अजम्) अजन्मा और (अव्ययम्) अविनाशी (वेद) जानता है (सः) वह (पुरुषः) व्यक्ति (कम्) किसको (घातयति) मरवाता है और (कथम्) कैसे (कम्) किसको (हन्ति) मारता है?
    (अध्याय 2 श्लोक 22-23 में जीवात्मा की स्थिति बताई है।)(21)

    अध्याय 2 का श्लोक 22

    वासांसि, जीर्णानि, यथा, विहाय, नवानि, गृह्णतिः, नरः, अपराणि,
    तथा, शरीराणि, विहाय, जीर्णानि, अन्यानि, संयाति, नवानि, देही।।22।।

    अनुवाद: (यथा) जैसे (नरः) मनुष्य (जीर्णानि) पुराने (वासांसि) वस्त्रोंको (विहाय) त्यागकर (अपराणि) दूसरे (नवानि) नये वस्त्रोंको (गृह्णतिः) ग्रहण करता है (तथा) वैसे ही (देही) जीवात्मा (जीर्णानि) पुराने (शरीराणि) शरीरोंको (विहाय) त्यागकर (अन्यानि) दूसरे (नवानि) नये शरीरोंको (संयाति) प्राप्त होता है। (22)

    अध्याय 2 का श्लोक 23

    न, एनम्, छिन्दन्ति, शस्त्राणि, न, एनम्, दहति, पावकः,
    न, च, एनम्, क्लेदयन्ति, आपः, न, शोषयति, मारुतः।।23।।

    अनुवाद: (एनम्) इसे (शस्त्राणि) शस्त्रा (न) नहीं (छिन्दन्ति) काट सकते (एनम्) इसको (पावकः) आग (न) नहीं (दहति) जला सकती (एनम्) इसको (आपः) जल (न) नहीं (क्लेदयन्ति) गला सकता (च) और (मारुतः) वायु (न) नहीं (शोषयति) सूखा सकती। (23)

    अध्याय 2 का श्लोक 24

    अच्छेद्यः, अयम्, अदाह्यः, अयम्, अक्लेद्यः, अशोष्यः, एव, च,
    नित्यः, सर्वगतः, स्थाणुः, अचलः, अयम्, सनातनः।।24।।

    अनुवाद: (अयम्) यह (अच्छेद्यः) अच्छेद्य है (अयम्) यह परमात्मा (अदाह्यः) अदाह्य (अक्लेद्यः) अक्लेद्य (च) और (एव) निःसंदेह (अशोष्यः) अशोष्य है तथा (अयम्) यह परमात्मा (नित्यः) नित्य (सर्वगतः) सर्वव्यापी (अचलः) अचल (स्थाणुः) स्थिर रहनेवाला और (सनातनः) सनातन है। (24)

    अध्याय 2 का श्लोक 25

    अव्यक्तः, अयम्, अचिन्त्यः, अयम्, अविकार्यः, अयम्, उच्यते,
    तस्मात्, एवम्, विदित्वा, एनम्, न, अनुशोचितुम्, अर्हसि।।25।।

    अनुवाद: (अयम्) यह परमात्मा इस आत्मा के साथ (अव्यक्तः) गुप्त रहता है (अयम्) यह (अचिन्त्यः) अचिन्त्य है और (अयम्) यह (अविकार्यः) विकाररहित (उच्यते) कहा जाता है। (तस्मात्) इससे हे अर्जुन! (एनम्) इस परमात्मा को (एवम्) इस प्रकारसे (विदित्वा) जानकर तू (अनुशोचितुम्) शोक करनेके (न, अर्हसि) योग्य नहीं है अर्थात् तुझे शोक करना उचित नहीं है। भावार्थ है कि जब परमात्मा जीव के साथ है तो जीव का अहित नहीं होता। (25)

    अध्याय 2 का श्लोक 26

    अथ, च, एनम्, नित्यजातम्, नित्यम्, वा, मन्यसे, मृतम्,
    तथापि त्वम्, महाबाहो, न, एवम्, शोचितुम्, अर्हसि।।26।।

    अनुवाद: (च) और (अथ) यदि इसके बाद (त्वम्) तू (एनम्) इन्हें (नित्यजातम्) सदा जन्मनेवाला (वा) या (नित्यम्) सदा (मृतम्) मरनेवाला (मन्यसे) मानता है (तथापि) तो भी (महाबाहो) हे महाबाहो! तू (एवम्) इस प्रकार (शोचितुम्) शोक करनेको (न, अर्हसि) योग्य नहीं है। (26)

    अध्याय 2 का श्लोक 27

    जातस्य, हि, ध्रुवः, मृत्युः, ध्रुवम्, जन्म, मृतस्य, च,
    तस्मात्, अपरिहार्ये, अर्थे, न, त्वम्, शोचितुम्, अर्हसि।।27।।

    अनुवाद: (हि) क्योंकि (जातस्य) जन्मे हुएकी (मृत्युः) मृत्यु (ध्रुवः) निश्चित है (च) और (मृतस्य) मरे हुएका (जन्म) जन्म (धु्रवम्) निश्चित है। (तस्मात्) इससे भी इस (अपरिहार्ये) बिना उपायवाले (अर्थे) विषयमें (त्वम्) तू (शोचितुम्) शोक करनेके (न, अर्हसि) योग्य नहीं है (27)

    अध्याय 2 का श्लोक 28

    अव्यक्तादीनि, भूतानि, व्यक्तमध्यानि, भारत,
    अव्यक्तनिधनानि, एव, तत्रा, का, परिदेवना।।28।।

    अनुवाद: (भारत) हे अर्जुन! (भूतानि) सम्पूर्ण प्राणी (अव्यक्तादीनि) जन्मसे पहले अप्रकट थे और (अव्यक्त निधनानि, एव) मरनेके बाद भी अप्रकट हो जानेवाले हैं केवल (व्यक्तमध्यानि) बीच में ही प्रकट हैं फिर (तत्रा) ऐसी स्थितिमें (का) क्या (परिदेवना) शोक करना है?(28)

    अध्याय 2 का श्लोक 29

    आश्चर्यवत्, पश्यति, कश्चित्, एनम्, आश्चर्यवत्,
    वदति, तथा, एव, च, अन्यः, आश्चर्यवत्, च, एनम्, अन्यः,
    श्रृणोति, श्रुत्वा, अपि, एनम्, वेद, न, च, एव, कश्चित्।।29।।

    अनुवाद: (कश्चित्) कोई एक ही (एनम्) इस परमात्मा सहित आत्माको (आश्चर्यवत्) आश्चर्यकी भाँति (पश्यति) देखता है (च) और (तथा) वैसे (एव) ही (अन्यः) दूसरा कोई महापुरुष ही (आश्चर्यवत्) आश्र्चयकी भाँति (वदति) वर्णन करता है (च) तथा (अन्यः) दूसरा (एनम्) इसे (आश्चर्यवत्) आश्र्चयकी भाँति (श्रृणोति) सुनता है (च) और (कश्चित्) कोई (श्रुत्वा) सुनकर (अपि) भी (एनम्) इसको (न, एव) नहीं (वेद) जानता। (29)

    अध्याय 2 का श्लोक 30

    देही, नित्यम्, अवध्यः, अयम्, देहे, सर्वस्य, भारत,
    तस्मात्, सर्वाणि, भूतानि, न, त्वम्, शोचितुम्, अर्हसि।।30।।

    अनुवाद: (भारत) हे अर्जुन! (अयम्) यह (देही) जीवाआत्मा परमात्मा के साथ (सर्वस्य) सबके (देहे) शरीरोंमें (नित्यम्) सदा ही (अवध्यः) अविनाशी है (तस्मात्) इस कारण (सर्वाणि) सम्पूर्ण (भूतानि) प्राणियोंके लिये (त्वम्) तू (शोचितुम्) शोक करनेको (न, अर्हसि) योग्य नहीं है। (30)

  • अध्याय 2 का श्लोक 31

    स्वधर्मम्, अपि, च, अवेक्ष्य, न, विकम्पितुम्, अर्हसि,
    धम्र्यात्, हि, युद्धात्, श्रेयः, अन्यत्, क्षत्रियस्य, न, विद्यते।।31।।

    अनुवाद: (च) तथा (स्वधर्मम्) अपनी शास्त्रा अनुकूल धार्मिक पूजाओं को (अवेक्ष्य) देखकर (अपि) भी तू (विकम्पितुम्) भय करने (न,अर्हसि) योग्य नहीं है (हि) क्योंकि (क्षत्रियस्य) क्षत्रियके लिये (धम्र्यात्) धर्मयुक्त (युद्धात्) युद्धसे बढ़कर (अन्यत्) दूसरा कोई (श्रेयः) कल्याणकारी कर्तव्य (न) नहीं (विद्यते) जाना जाता है। (31)

    विशेष:- गीताप्रैस गोरखपुर से प्रकाशित गीता अध्याय 10 श्लोक 17 में विद्याम का अर्थ जानना अर्थात् जानूँ किया है।

    अध्याय 2 का श्लोक 32

    यदृच्छया, च, उपपन्नम्, स्वर्गद्वारम्, अपावृतम्,
    सुखिनः, क्षत्रियाः, पार्थ, लभन्ते, युद्धम्, ईदृशम्।।32।।

    अनुवाद: (पार्थ) हे पार्थ! (यदृच्छया) अपने-आप (उपपन्नम्) प्राप्त हुए (च) और (अपावृतम्) खुले हुए (स्वर्गद्वारम्) स्वर्गके द्वाररूप (ईदृशम्) इस प्रकारके (युद्धम्) युद्धको (सुखिनः) भाग्यवान् (क्षत्रियाः) क्षत्रियलोग ही (लभन्ते) पाते हैं। (32)

    अध्याय 2 का श्लोक 33

    अथ, चेत्, त्वम्, इमम्, धम्र्यम्, सङ्ग्रामम्, न, करिष्यसि,
    ततः, स्वधर्मम्, कीर्तिम्, च, हित्वा, पापम्, अवाप्स्यसि।।33।।

    अनुवाद: (अथ) किंतु (त्वम्) तू (इमम्) इस (धम्र्यम्) धार्मिकता युक्त (चेत्) ज्ञान के आधार से (सङ्ग्रामम्) युद्धको (न) नहीं (करिष्यसि) करेगा (ततः) वही (स्वधर्मम्) स्वधर्म (च) और (कीर्तिम्) कीर्तिको (हित्वा) खोकर (पापम्) पापको (अवाप्स्यसि) प्राप्त होगा। (33)

    अध्याय 2का श्लोक 34

    अकीर्तिम्, च, अपि, भूतानि, कथयिष्यन्ति, ते, अव्ययाम्,
    सम्भावितस्य, च, अकीर्तिः, मरणात्, अतिरिच्यते।।34।।

    अनुवाद: (च) तथा (भूतानि) सब लोग (ते) तेरी (अव्ययाम्) बहुत कालतक रहनेवाली (अकीर्तिम्) अपकीर्तिका (अपि) भी (कथयिष्यन्ति) कथन करेंगे (च) और (सम्भावितस्य) माननीय पुरुष के लिये (अकीर्तिः) अपकीर्ति (मरणात्) मरणसे भी (अतिरिच्यते) बढ़कर है। (34)

    अध्याय 2 का श्लोक 35

    भयात्, रणात्, उपरतम्, मंस्यन्ते, त्वाम्, महारथाः,
    येषाम्, च, त्वम्, बहुमतः, भूत्वा, यास्यसि, लाघवम्।।35।।

    अनुवाद: (च) और (येषाम्) जिनकी दृष्टिमें (त्वम्) तू पहले (बहुमतः) बहुत सम्मानित (भूत्वा) होकर अब (लाघवम्) लघुताको (यास्यसि) प्राप्त होगा वे (महारथाः) महारथी लोग (त्वाम्) तुझे (भयात्) भयके कारण (रणात्) युद्धसे (उपरतम्) हटा हुआ (मंस्यन्ते) मानेंगे। (35)

    अध्याय 2का श्लोक 36

    अवाच्यवादान्, च, बहून्, वदिष्यन्ति, तव, अहिताः,
    निन्दन्तः, तव, सामथ्र्यम्, ततः, दुःखतरम्, नु, किम्।।36।।

    अनुवाद: (तव) तेरे (अहिताः) वैरी लोग (तव) तेरे (सामथ्र्यम्) सामथ्र्यकी (निन्दन्तः) निन्दा करते हुए तुझे (बहून्) बहुत-से (अवाच्यवादान्) न कहने योग्य वचन (च) भी (वदिष्यन्ति) कहेंगे (ततः) उससे (दुःखतरम्) अधिक दुःख (नु) और (किम्) क्या होगा?। (36)

    अध्याय 2 का श्लोक 37

    हतः, वा, प्राप्स्यसि, स्वर्गम्, जित्वा, वा, भोक्ष्यसे, महीम्,
    तस्मात्, उत्तिष्ठ, कौन्तेय, युद्धाय, कृतनिश्चयः।।37।।

    अनुवाद: (वा) या तो तू युद्धमें (हतः) मारा जाकर (स्वर्गम्) स्वर्गको (प्राप्स्यसि) प्राप्त होगा (वा) अथवा संग्राममें (जित्वा) जीतकर (महीम्) पृथ्वीका राज्य (भोक्ष्यसे) भोगेगा। (तस्मात्) इस कारण (कौन्तेय) हे अर्जुन! तू (युद्धाय) युद्धके लिये (कृतनिश्चयः) निश्चय करके (उत्तिष्ठ) खड़ा हो जा। (37)

    अध्याय 2 का श्लोक 38

    सुखदुःखे, समे, कृत्वा, लाभालाभौ, जयाजयौ,
    ततः, युद्धाय, युज्यस्व, न, एवम्, पापम्, अवाप्स्यसि।।38।।

    अनुवाद: (जयाजयौ) जय-पराजय (लाभालाभौ) लाभ-हानि और (सुखदुःखे) सुख-दुःखको (समे) समान (कृत्वा) समझकर (ततः) उसके बाद (युद्धाय) युद्धके लिये (युज्यस्व) तैयार हो जा (एवम्) इस प्रकार (पापम्) पापको (न) नहीं (अवाप्स्यसि) प्राप्त होगा। (38)

    अध्याय 2 का श्लोक 39

    एषा, ते, अभिहिता, साङ्ख्ये, बुद्धिः, योगे, तु, इमाम्, श्रृणु,
    बुद्धया, युक्तः, यया, पार्थ, कर्मबन्धम्, प्रहास्यसि।।39।।

    अनुवाद: (पार्थ) हे पार्थ! (एषा) यह (बुद्धिः) ज्ञानवाणी (ते) तेरे लिये (साङ्ख्ये) ज्ञानयोगके विषयमें (अभिहिता) कही गयी (तु) और अब तू (इमाम्) इसको (योगे) योगके विषयमें (श्रृणु) सुन (यया) जिस (बुद्धया) बुद्धिसे (युक्तः) युक्त हुआ तू (कर्मबन्धम्) कर्मोंके बन्धनको (प्रहास्यसि) भलीभाँति त्याग देगा यानी सर्वथा नष्ट कर डालेगा। गीता अध्याय 6 श्लोक 46 में कहा है कि ज्ञान योगियों और कर्मयोगियों से तत्वदर्शी सन्त अर्थात् योगी श्रेष्ठ है। इसी गीता अध्याय 5 श्लोक 2 में शास्त्राविरूद्ध ज्ञान योगी अर्थात् सन्यासी तथा कर्मयोगी दोनों को ही अश्रेष्ठ कहा है। (39)

    अध्याय 2 का श्लोक 40

    न, इह, अभिक्रमनाशः, अस्ति, प्रत्यवायः, न, विद्यते,
    स्वल्पम्, अपि, अस्य, धर्मस्य, त्रायते, महतः, भयात्।।40।।

    अनुवाद: (इह) इस योगमें (अभिक्रमनाशः) आरम्भका अर्थात् बीजका नाश (न) नहीं (अस्ति) है और (प्रत्यवायः) उलटा फलरूप दोष भी (न) नहीं (विद्यते) जानते बल्कि (अस्य) इस योगरूप (धर्मस्य) धर्मका (स्वल्पम्) थोड़ा-सा भक्ति धन (अपि) भी (महतः) महान् (भयात्) भयसे (त्रायते) रक्षा कर लेता है। (40)

  • अध्याय 2 का श्लोक 41

    व्यवसायात्मिका, बुद्धिः, एका, इह, कुरुनन्दन,
    बहुशाखाः, हि, अनन्ताः, च, बुद्धयः, अव्यवसायिनाम्।।41।।

    अनुवाद: (कुरुनन्दन) हे अर्जुन! (इह) इस योगमें (व्यवसायात्मिका) निश्चयात्मिका (बुद्धिः) बुद्धि व ज्ञान वाणी (एका) एक ही होती है किंतु (अव्यवसायिनाम्) अस्थिर विचारवाले विवेकहीन सकाम मनुष्योंकी (बुद्धयः) बुद्धियाँ अर्थात् ज्ञान विचार धाराऐं (हि) निश्चय ही (बहुशाखाः) बहुत भेदोंवाली (च) और (अनन्ताः) अनन्त होती है। (41)

    अध्याय 2 का श्लोक 42.43.44

    याम्, इमाम्, पुष्पिताम्, वाचम्, प्रवदन्ति, अविपश्चितः,
    वेदवादरताः, पार्थ, न, अन्यत्, अस्ति, इति, वादिनः।।42।।

    कामात्मानः, स्वर्गपराः, जन्मकर्मफलप्रदाम्,
    क्रियाविशेषबहुलाम्, भोगैश्वर्यगतिम्, प्रति।।43।।

    भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्, तया, अपहृतचेतसाम्,
    व्यवसायात्मिका, बुद्धिः, समाधौ, न, विधीयते।।44।।

    अनुवाद: (पार्थ) हे अर्जुन्! (कामात्मानः) जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं (वेदवादरताः) वेद वाक्यों में ही प्रीति रखते हैं (स्वर्गपराः) जिनकी बुद्धिमें स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है (अन्यत्) दूसरी (न) नहीं (अस्ति) है (इति) ऐसा (वादिनः) कहनेवाले हैं (अविपश्चितः) वे अविवेकीजन (इमाम्) इस प्रकारकी (याम्) जिस (पुष्पिताम्) पुष्पित यानी दिखाऊ शोभायुक्त (वाचम्) वाणीको (प्रवदन्ति) कहा करते हैं (जन्मकर्मफलप्रदाम्) जन्मरूप कर्मफल देनेवाली (भोगैश्वर्यगतिम् प्रति) भोग तथा ऐश्वर्यकी प्राप्ति के लिए (क्रियाविशेषबहुलाम्) बहुत-सी क्रियाओंको वर्णन करनेवाली है। (तया) उस वाणीद्वारा (अपहृतचेतसाम्) जिनका चित्त हर लिया गया है। (भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्) जो भोग और ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन पुरुषोंकी (समाधौ) परमात्मा के चिन्तन में (व्यवसायात्मिका) निश्चयात्मिका (बुद्धिः) बुद्धि (न) नहीं (विधीयते) जान पड़ती। (42.43.44)

    अध्याय 2 का श्लोक 45

    त्रौगुण्यविषयाः, वेदाः, निस्त्रौगुण्यः, भव, अर्जुन,
    निद्र्वन्द्वः, नित्यसत्त्वस्थः, निर्योगक्षेमः, आत्मवान्।।45।।

    अनुवाद: (अर्जुन) हे अर्जुन! (त्रौगुण्यविषयाः) तीनों गुणों अर्थात् रजगुण-ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिव के भोगों के (वेदाः) ज्ञान से (निस्त्रौगुण्यः) तीनों गुणों से ऊपर उठ कर (निद्र्वन्द्वः) हर्ष-शोकादि द्वन्द्वोंसे रहित (नित्यसत्त्वस्थः) नित्यवस्तु सत्यपुरूष अर्थात् पूर्ण परमात्मामें स्थित (निर्योगक्षेमः) योग क्षेमको अर्थात् भक्ति के प्रतिफल में संसारिक सुख न चाहनेवाला (आत्मवान्) आत्म विश्वासी (भव) हो। (45)

    अध्याय 2 का श्लोक 46

    यावान्, अर्थः, उदपाने, सर्वतः, सम्प्लुतोदके,
    तावान्, सर्वेषु, वेदेषु, ब्राह्मणस्य, विजानतः।।46।।

    अनुवाद: (सर्वतः) सब ओरसे (सम्प्लुतोदके) परिपूर्ण जलाशयके प्राप्त हो जाने पर (उदपाने) छोटे जलाशयमें मनुष्यका (यावान्) जितना (अर्थः) प्रयोजन रहता है पूर्ण परमात्माको (विजानतः) तत्वसे जाननेवाले (ब्राह्मणस्य) विद्वानका (सर्वेषु) समस्त (वेदेषु) ज्ञानों में (तावान्) उतना ही प्रयोजन रह जाता है। (46)

    भावार्थ:- जिस प्रकार बहुत बड़े जलास्य (जिस का जल दस वर्ष वर्षा न होने पर भी समाप्त न हो) के प्राप्त हो जाने के पश्चात् छोटे जलास्य (जिस का जल एक वर्षा न होने पर समाप्त हो जाए) में जैसी श्रद्धा रह जाती है(छोटा जलास्य बुरा नहीं लगता परन्तु उसकी क्षमता का ज्ञान हो जाता है) इसी प्रकार तत्वज्ञान की प्राप्ति पर अन्य ज्ञानों (चारों वेदों अठारह पुराणों व गीता जी आदि) मैं ऐसी श्रद्धा रह जाती है। क्योंकि उनमें पर्याप्त ज्ञान नहीं है। इसी प्रकार तत्वज्ञान के आधार से पूर्ण परमात्मा के गुणों का ज्ञान हो जाने पर अन्य परमात्माओं (परब्रह्म, ब्रह्म तथा श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव व दुर्गा) में ऐसी ही श्रद्धा रह जाती है। ये अन्य देवता बुरे नहीं लगते परन्तु इनसे मिलने वाला लाभ पर्याप्त नहीं है। (46)

    अध्याय 2 का श्लोक 47

    कर्मणि, एव, अधिकारः, ते, मा, फलेषु, कदाचन,
    मा, कर्मफलहेतुः, भूः, मा, ते, संगः, अस्तु, अकर्मणि।।47।।

    अनुवाद: (ते) तेरा (कर्मणि) कर्म करनेमें (एव) ही (अधिकारः) अधिकार है उसके (फलेषु) फलोंमें (कदाचन) कभी (मा) नहीं। इसलिए तू (कर्मफलहेतुः) कर्मोंके फलका हेतु (मा, भूः) मत हो तथा (ते) तेरी (अकर्मणि) कर्म न करनेमें भी (संगः) आसक्ति (मा) न (अस्तु) हो। (47)

    अध्याय 2 का श्लोक 48

    योगस्थः, कुरु, कर्माणि, संगम्, त्यक्त्वा, धन×जय,
    सिद्धयसिद्धयोः, समः, भूत्वा, समत्वम्, योगः, उच्यते।।48।।

    अनुवाद: (धनजय) हे धनजय! (संगम्) तू आसक्तिको (त्यक्त्वा) त्यागकर तथा (सिद्धयसिद्धयोः) सिद्धि और असिद्धिमें (समः) समान बुद्धिवाला (भूत्वा) होकर (योगस्थः) शास्त्रानुकूल भक्ति योगमें स्थित हुआ (कर्माणि) शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति कर्तव्यकर्मोंको (कुरु) कर (समत्वम्) एक रूप ही (योगः) योग अर्थात् वास्तविक भक्ति (उच्यते) कहलाता है। (48)

    अध्याय 2 का श्लोक 49

    दूरेण, हि, अवरम्, कर्म, बुद्धियोगात्, धनजय,
    बुद्धौ, शरणम्, अन्विच्छ, कृपणाः, फलहेतवः।।49।।

    अनुवाद: (बुद्धियोगात्) अपने आप निकाला भक्ति मार्ग का निष्कर्ष अर्थात् मनमाना आचरण अर्थात् अपनी बुद्धियोगसे (कर्म) भक्ति कर्म (दूरेण) अत्यन्त ही (अवरम्) निम्न श्रेणीका है। इसलिये (धन×जय) हे धन×जय! तू (बुद्धौ) एक पूर्ण परमात्मा का ज्ञान देने वाले संत की (शरणम्) शरण (अन्विच्छ) ढूँढ़ अर्थात् तत्वदर्शी संतों द्वारा बताया एक पूर्ण प्रभु की भक्ति साधन का ही आश्रय ग्रहण कर (हि) क्योंकि (फलहेतवः) फलके हेतु बननेवाले (कृपणाः) अत्यन्त दीन हैं। (49)

    अध्याय 2 का श्लोक 50

    बुद्धियुक्तः, जहाति, इह, उभे, सुकृतदुष्कृते,
    तस्मात् योगाय, युज्यस्व, योगः, कर्मसु, कौशलम्।।50।।

    अनुवाद: (बुद्धियुक्तः) समबुद्धियुक्त अर्थात् तत्वदर्शी संत द्वारा बताया वास्तविक एक रूप शास्त्रा अनुकूल भक्ति मार्ग पर लगा साधक पुरुष (सुकृतदुष्कृते) अच्छे कर्म जैसे मनमानी पूजाऐं जो सुकृत मान कर कर रहा था या मेरे बताए मार्ग अनुसार ओम् का जाप व यज्ञ आदि पुण्य करता था उस पुण्य को तथा बुरे कर्म जैसे मांस-मदिरा-तम्बाखु आदि नशीली वस्तुओं के सेवन रूपी दुष्कर्म पाप इन (उभे) दोनोंको (इह)इसी लोक में अर्थात् काल लोक में (जहाति) त्याग देता है अर्थात् जैसे पूर्ण संत कहता है वैसे ही करता है (तस्मात्) इसलिए तू (योगाय) शास्त्रा विधि अनुसार साधना अर्थात् समत्वरूप योगमें (युज्यस्व) लग जा यह (योगः) तत्वदर्शी संत द्वारा बताया भक्ति मार्ग ही (कर्मसु) भक्ति कर्मों में (कौशलम्) कुशलता है अर्थात् बुद्धिमत्ता है। (50)

    यही प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 66 में है जिसमें कहा है कि मेरी सर्व धार्मिक पूजाओं को मेरे में त्याग कर उस पूर्ण परमात्मा की शरण में जा तब मैं तुझे सर्व पापों से मुक्त कर दूंगा।

  • अध्याय 2 का श्लोक 51

    कर्मजम्, बुद्धियुक्ताः, हि, फलम्, त्यक्त्वा, मनीषिणः,
    जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः, पदम्, गच्छन्ति, अनामयम्।।51।।

    अनुवाद: (हि) क्योंकि (बुद्धियुक्ताः) तत्वज्ञान के आधार से समबुद्धिसे युक्त (मनीषिणः) ज्ञानीजन (कर्मजम्) कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाले (फलम्) फलको (त्यक्त्वा) त्यागकर (जन्मबन्ध विनिर्मुक्ताः) जन्म रूपबन्धनसे पूर्ण रूप से मुक्त हो (अनामयम्) अनामी अर्थात् जन्म-मरण रोग रहित (पदम्) परम पद अर्थात् सतलोक को (गच्छन्ति) चले जाते हैं अर्थात् पूर्ण मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् जन्म-मरण का रोग पूर्णरूप से समाप्त हो जाता है। (51)

    अध्याय 2 का श्लोक 52

    यदा, ते, मोहकलिलम्, बुद्धिः, व्यतितरिष्यति,
    तदा, गन्तासि, निर्वेदम्, श्रोतव्यस्य, श्रुतस्य, च।।52।।

    अनुवाद: (यदा) जिस कालमें (ते) तेरी (बुद्धिः) बुद्धि (मोहकलिलम्) मोहरूप अर्थात् अज्ञान रूप दलदलको (व्यतितरिष्यति) भलीभाँति पार कर जाएगी अर्थात् आपको तत्वज्ञान हो जायेगा (तदा) उस समय तू (श्रुतस्य) सुने हुए (च) और (श्रोतव्यस्य) सुननेमें आनेवाले इस लोक और परलोक अर्थात् स्वर्ग-महास्वर्ग सम्बन्धी सभी भोगों का सुना सुनाया लोकवेद (निर्वेदम्)वेद विस्द्ध ज्ञान अर्थात् ज्ञानहीन वार्ता (गन्तासि) जैसा गया गुजरा महसूस होगा। (52)

    अध्याय 2 का श्लोक 53

    श्रुतिविप्रतिपन्ना, ते, यदा, स्थास्यति, निश्चला,
    समाधौ, अचला, बुद्धिः, तदा, योगम्, अवाप्स्यसि।।53।।

    अनुवाद: (श्रुतिविप्रतिपन्ना) भाँति-भाँतिके वचनोंको सुननेसे विचलित हुई (ते) तेरी (बुद्धिः) बुद्धि (अचला) स्थिर होकर (यदा) जब (समाधौ) तत्वज्ञान के आधार से एक परमात्मा के चिन्तन में (अचला)स्थाई रूप से (स्थास्यति) ठहर जायगी (तदा) तब तू (योगम्) योग अर्थात् भक्तिको (अवाप्स्यसि) प्राप्त हो जायगा। तब तेरी भक्ति प्रारम्भ हो जायेगी। अर्थात् तब तू योगी बनेगा। गीता अध्याय 6 श्लोक 46 में कहा है कि अर्जुन तू योगी बन। (53)

    अध्याय 2 का श्लोक 54 (अर्जुन उवाच)

    स्थितप्रज्ञस्य, का, भाषा, समाधिस्थस्य, केशव,
    स्थितधीः, किम्, प्रभाषेत, किम्, आसीत, व्रजेत, किम्।।54।।

    अनुवाद: (केशव) हे केशव! (समाधिस्थस्य) सहज समाधिमें स्थित (स्थितप्रज्ञस्य) परमात्माको प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुषका (का) क्या (भाषा) परिभाषा अर्थात् लक्षण है? वह (स्थितधीः) स्थिरबुद्धि पुरुष (किम्) कैसे (प्रभाषेत) बोलता है (किम्) कैसे (आसीत) बैठता है और (किम्) कैसे (व्रजेत) चलता है। (54)

    अध्याय 2 का श्लोक 55 (भगवान उवाच)

    प्रजहाति, यदा, कामान्, सर्वान्, पार्थ, मनोगतान्
    आत्मनि, एव, आत्मना, तुष्टः, स्थितप्रज्ञः, तदा, उच्यते।।55।।

    अनुवाद: (पार्थ) हे अर्जुन! (यदा) जिस कालमें यह पुरुष (मनोगतान्) मनमें स्थित (सर्वान्) सम्पूर्ण (कामान्) कामनाओंको (प्रजहाति) भलीभाँति त्याग देता है और (आत्मना) आत्मासे अर्थात् समर्पण भाव से (आत्मनि) आत्मा के साथ अभेद रूप में रहने वाले परमात्मा में (एव) ही (तुष्टः) संतुष्ट रहता है, (तदा) उस कालमें वह (स्थितप्रज्ञः) स्थितप्रज्ञ अर्थात् स्थाई बुद्धि वाला (उच्यते) कहा जाता है अर्थात् फिर वह विचलित नहीं होता, केवल तत्वदर्शी संत के तत्वज्ञान पर पूर्ण रूप से आधारित रहता है। वह योगी है। (55)

    अध्याय 2 का श्लोक 56

    दुःखेषु, अनुद्विग्नमनाः, सुखेषु, विगतस्पृहः,
    वीतरागभयक्रोधः, स्थितधीः, मुनिः, उच्यते।।56।।

    अनुवाद: (दुःखेषु) दुःखोंकी प्राप्ति होनेपर (अनुद्विग्नमनाः) जिसके मनमे उद्वेग नहीं होता (सुखेषु) सुखोंकी प्राप्तिमें (विगतस्पृहः) जो सर्वथा इच्छा रहित है तथा (वीतरागभयक्रोधः) जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं ऐसा (मुनिः) मुनि अर्थात् साधक (स्थितधीः) स्थिरबुद्धि (उच्यते) कहा जाता है। (56)

    अध्याय 2 का श्लोक 57

    यः, सर्वत्रा, अनभिस्नेहः, तत्, तत्, प्राप्य, शुभाशुभम्,
    न, अभिनन्दति, न, द्वेष्टि, तस्य, प्रज्ञा, प्रतिष्ठिता।।57।।

    अनुवाद: (यः) जो (सर्वत्रा) सर्वत्रा (अनभिस्नेहः) स्नेहरहित हुआ (तत् तत्) उस-उस (शुभाशुभम्) शुभ या अशुभ वस्तु को (प्राप्य) प्राप्त होकर (न) न (अभिनन्दति) प्रसन्न होता है और (न) न (द्वेष्टि) द्वेष करता है। (तस्य) उसकी (प्रज्ञा) बुद्धि (प्रतिष्ठिता) स्थिर है। (57)

    अध्याय 2 का श्लोक 58

    यदा, संहरते, च, अयम्, कूर्मः, अंगानि, इव, सर्वशः,
    इन्द्रियाणि, इन्द्रियार्थेभ्यः, तस्य, प्रज्ञा, प्रतिष्ठिता।।58।।

    अनुवाद: (च) और जिस प्रकार (कूर्मः) कछुआ (सर्वशः) सब ओरसे अपने (अगंानि) अंगोंको (इव) जैसे समेट लेता है वैसे ही (यदा) जब (अयम्) यह पुरुष (इन्द्रियार्थेभ्यः) इन्द्रियोंके विषयोंसे (इन्द्रियाणि) इन्द्रियोंको (संहरते) सब प्रकारसे हटा लेता है तब (तस्य) उसकी (प्रज्ञा) बुद्धि (प्रतिष्ठिता) स्थिर है ऐसा समझना चाहिए। (58)

    अध्याय 2 का श्लोक 59

    विषयाः, विनिवर्तन्ते, निराहारस्य, देहिनः,
    रसवर्जम्, रसः, अपि, अस्य, परम्, दृष्टवा, निवर्तते।।59।।

    अनुवाद: (निराहारस्य) इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंको ग्रहण न करनेवाले (देहिनः) पुरुषके भी केवल (विषयाः) विकार (विनिवर्तन्ते) निवृत्त हो जाते हंै (रसवर्जम्) आसक्ति निवृत्त नहीं होती। (अस्य) इस स्थिर बुद्धि वालेके (परम्) उत्तम (दृष्टवा) देखने अर्थात् विकारों से होने वाली हानि को जानने वाले के (रसः) आसक्ति (अपि) भी (निवर्तते) निवृत्त हो जाती है। (59)

    अध्याय 2 का श्लोक 60

    यततः, हि, अपि, कौन्तेय, पुरुषस्य, विपिश्चितः,
    इन्द्रियाणि, प्रमाथीनि, हरन्ति, प्रसभम्, मनः।।60।।

    अनुवाद: (कौन्तेय) हे अर्जुन! (हि) क्योंकि (प्रमाथीनि) ये प्रमथन स्वभाववाली (इन्द्रियाणि) इन्द्रियाँ (यततः) यतन करते हुए (विपिश्चितः) बुद्धिमान् (पुरुषस्य) पुरुषके (मनः) मनको (अपि) भी (प्रसभम्) बलात् (हरन्ति) हर लेती हैं। (60)

  • अध्याय 2 का श्लोक 61

    तानि, सर्वाणि, संयम्य, युक्तः, आसीत, मत्परः,
    वशे, हि, यस्य, इन्द्रियाणि, तस्य, प्रज्ञा, प्रतिष्ठिता।।61।।

    अनुवाद: (तानि) उन (सर्वाणि) सम्पूर्ण इन्द्रियोंको (संयम्य) वशमें करके (युक्तः) समाहित चित हुआ (मत्परः) शास्त्रानुसार साधना (आसीत) में दृढता से लगे (हि) क्योंकि (यस्य) जिस पुरुषकी (इन्द्रियाणि) इन्द्रियाँ (वशे) वशमें होती है (तस्य) उसकी (प्रज्ञा) बुद्धि (प्रतिष्ठिता) स्थिर हो जाती है अर्थात् मन व इन्द्रियों के ऊपर बुद्धि की प्रभुत्ता रहती है। (61)

    अध्याय 2का श्लोक 62

    ध्यायतः, विषयान्, पंुसः, संग, तेषु, उपजायते, संगात्,
    सजायते, कामः, कामात्, क्रोधः, अभिजायते।। 62।।

    अनुवाद: (विषयान्) विषयोंका (ध्यायतः) चिन्तन करनेवाले (पुंसः) पुरुषकी (तेषु) उन विषयोंमें (संग) आसक्ति (उपजायते) उत्पन्न हो जाती है (संगात्) आसक्तिसे (कामः) उन विषयोंकी कामना (स×जायते) उत्पन्न होती है और (कामात्) कामना में विघ्न पड़ने से (क्रोधः) क्रोध (अभिजायते) उत्पन्न होता है। (62)

    अध्याय 2 का श्लोक 63

    क्रोधात्, भवति, सम्मोहः, सम्मोहात्, स्मृतिविभ्रमः,
    स्मृतिभ्रंशात्, बुद्धिनाशः, बुद्धिनाशात्, प्रणश्यति।।63।।

    अनुवाद: (क्रोधात्) क्रोधसे (सम्मोहः) अत्यन्त मूढ़भाव (भवति) उत्पन्न हो जाता है (सम्मोहात्) मूढ़भावसे (स्मृतिविभ्रमः) स्मृतिमें भ्रम हो जाता है (स्मृतिभ्रंशात्) स्मृतिमें भ्रम हो जानेसे (बुद्धिनाशः) बुद्धि अर्थात् ज्ञान-शक्तिका नाश हो जाता है। और (बुद्धिनाशात्) बुद्धिका नाश हो जानेसे यह पुरुष अपनी स्थितिसे (प्रणश्यति) गिर जाता है। (63)

    अध्याय 2 का श्लोक 64

    रागद्वेषवियुक्तैः, तु, विषयान्, इन्द्रियैः, चरन्,
    आत्मवश्यैः, विधेयात्मा, प्रसादम्, अधिगच्छति।।64।।

    अनुवाद: (तु) परंतु (विधेयात्मा) तत्वज्ञान से अधीन किये हुए अन्तःकरणवाला साधक (आत्मवश्यैः) अपने वशमें की हुई (रागद्वेषवियुक्तैः) राग-द्वेषसे रहित (इन्द्रियैः) इन्द्रियोंद्वारा (विषयान्) विषयोंमें (चरन्) विचरण करता हुआ भी उसमें लीन न होकर (प्रसादम्) प्रसन्नताको (अधिगच्छति) प्राप्त होता है। (64)

    अध्याय 2 का श्लोक 65

    प्रसादे, सर्वदुःखानाम्, हानिः, अस्य, उपजायते,
    प्रसन्नचेतसः, हि, आशु, बुद्धिः, पर्यवतिष्ठते।।65।।

    अनुवाद: (प्रसादे) अन्तःकरणकी प्रसन्नता होनेपर (अस्य) इसके (सर्वदुःखानाम्) सम्पूर्ण दुःखोंका (हानिः) अभाव (उपजायते) हो जाता है और उस (प्रसन्नचेतसः) प्रसन्न-चित्तवाले कर्मयोगीकी (बुद्धिः) बुद्धि (आशु) शीघ्र (हि) ही सब ओरसे हटकर एक परमात्मामें ही (पर्यवतिष्ठते) भलीभाँति स्थिर हो जाती है। (65)

    अध्याय 2 का श्लोक 66

    न, अस्ति, बुद्धिः, अयुक्तस्य, न, च, अयुक्तस्य, भावना,
    न, च, अभावयतः, शान्तिः, अशान्तस्य, कुतः, सुखम्।।66।।

    अनुवाद: (अयुक्तस्य) न जीते हुए मन और इन्द्रियोंवाले पुरुषमें (बुद्धिः) निश्चयात्मिका बुद्धि (न) नहीं (अस्ति) होती (च) और उस (अयुक्तस्य) अयुक्त मनुष्यके अन्तःकरणमें (भावना) भावना भी (न) नहीं होती (च) तथा (अभावयतः) भावनाहीन मनुष्यको (शान्तिः) शान्ति (न) नहीं मिलती और (अशान्तस्य) शान्तिरहित मनुष्यको (सुखम्) सुख (कुतः) कैसे मिल सकता है?(66)

    भावार्थ:- जिस साधक का संश्य निवार्ण नहीं हो जाता अर्थात् जिसे तत्वदर्शी संत नहीं मिलता जिससे उसकी बुद्धि एक परमात्मा की भक्ति के स्थान पर नाना प्रकार की साधना व कामना करता रहता है, उस साधक को कोई लाभ नहीं होता।

    अध्याय 2 का श्लोक 67

    इन्द्रियाणाम्, हि, चरताम्, यत्, मनः, अनु, विधीयते,
    तत्, अस्य, हरति, प्रज्ञाम्, वायुः, नावम्, इव, अम्भसि।।67।।

    अनुवाद: (हि) क्योंकि (इव) जैसे (अम्भसि) जलमें चलनेवाली (नावम्) नावको (वायुः) वायु (हरति) हर लेती है वैसे ही (चरताम्) विषयोंमें विचरती हुई (इन्द्रियाणाम्) इन्द्रियोंमेंसे (मनः) मन (यत्) जिस इन्द्रियके (अनु) अधूरे (विधीयते) ज्ञान पर आधारित हो जाता है (तत्) जिस कारण से (अस्य) इस अयुक्त पुरुष की (प्रज्ञाम्) बुद्धि हर ली जाती है। (67)

    अध्याय 2 का श्लोक 68

    तस्मात् यस्य, महाबाहो, निगृहीतानि, सर्वशः,
    इन्द्रियाणि, इन्द्रियार्थेभ्यः, तस्य, प्रज्ञा, प्रतिष्ठिता।।68।।

    अनुवाद: (तस्मात्) इसलिये (महाबाहो) हे महाबाहो! (यस्य) जिस पुरुषकी (इन्द्रियाणि) इन्द्रियाँ तत्वज्ञान के आधार से (इन्द्रियार्थेभ्यः) इन्द्रियोंके विषयोंसे (सर्वशः) सब प्रकार (निगृहीतानि) निग्रह की हुई हैं (तस्य) उसीकी (प्रज्ञा) बुद्धि (प्रतिष्ठिता) स्थिर है। (68)

    अध्याय 2 का श्लोक 69

    या, निशा, सर्वभूतानाम्, तस्याम्, जागर्ति, संयमी,
    यस्याम्, जाग्रति, भूतानि, सा, निशा, पश्यतः, मुनेः।।69।।

    अनुवाद: (सर्वभूतानाम्) सम्पूर्ण प्राणियों के लिये (या) जो (निशा) रात्रिके समान है (तस्याम्) उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्दकी प्राप्तिमें (संयमी) स्थितप्रज्ञ योगी (जाग्रति) जागता है और (यस्याम्) जिस नाशवान् सांसारिक सुखकी प्राप्ति में (भूतानि) सब प्राणी (जाग्रति) जागते हैं (पश्यतः) परमात्माके तत्वको जाननेवाले (मुनेः) मुनिके लिये (सा) वह (निशा) रात्रिके समान है। (69)

    अध्याय 2 का श्लोक 70

    आपूर्यमाणम्, अचलप्रतिष्ठम्, समुद्रम्, आपः, प्रविशन्ति, यद्वत्,
    तद्वत्, कामाः, यम्, प्रविशन्ति, सर्वे, सः, शान्तिम्, आप्नोति, न, कामकामी।।70।।

    अनुवाद: (यद्वत्) जैसे नाना नदियोंके (आपः) जल जब (आपूर्यमाणम्) सब ओरसे परिपूर्ण (अचलप्रतिष्ठम्) अचल प्रतिष्ठावाले (समुद्रम्) समुद्रमें उसको विचलित न करते हुए ही (प्रविशन्ति) समा जाते हैं (तद्वत्) वैसे ही (सर्वे) सब (कामाः) भोग (यम्) जिस स्थितप्रज्ञ पुरुषमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न किये बिना ही (प्रविशन्ति) समा जाते हैं (सः) वही पुरुष (शान्तिम्) परम शान्तिको (आप्नोति) प्राप्त होता है (कामकामी) भोगोंको चाहनेवाला (न) नहीं। (70)

  • अध्याय 2का श्लोक 71

    विहाय, कामान्, यः, सर्वान्, पुमान्, चरति, निःस्पृहः,
    निर्ममः, निरहंकारः, सः, शान्तिम्, अधिगच्छति।।71।।

    अनुवाद: (यः) जो (पुमान्) पुरुष (सर्वान्) सम्पूर्ण (कामान्) कामनाओंको (विहाय) त्यागकर (निर्ममः) ममता रहित (निरहंकारः) अहंकाररहित और (निःस्पृहः) स्पृहारहित हुआ (चरति) विचरता है (सः) वही (शान्तिम्) शान्तिको (अधिगच्छति) प्राप्त होता है अर्थात् वह शान्तिको प्राप्त है। (71)

    अध्याय 2 का श्लोक 72

    एषा, ब्राह्मी, स्थितिः, पार्थ, न, एनाम्, प्राप्य, विमुह्यति,
    स्थित्वा, अस्याम्, अन्तकाले, अपि, ब्रह्मनिर्वाणम्, ऋच्छति।।72।।

    अनुवाद: (पार्थ) हे अर्जुन! (एषा) यह इच्छाओं आदि का त्याग, अहंकार रहित उपरोक्त स्थिति (ब्राह्मी) परमात्मा को प्राप्त साधक की (स्थितिः) स्थिति है। (एनाम्) इसको (प्राप्य) प्राप्त (न) न होकर साधक (विमुह्यति) विषयों में मोहित हो जाता है और (अन्तकाले) अन्त समय में (अस्याम्) जिस साधक के विकार समाप्त नहीं हुए वह इस स्थितिमें (स्थित्वा) स्थित होकर (अपि) भी (ब्रह्मनिर्वाणम्) पूर्ण परमात्माको (ऋच्छति) प्राप्त होने की क्षमता समाप्त हो जाती है अर्थात् पूर्ण परमात्मा प्राप्ति के लाभ से वंचित रह जाता है। (72)

    भावार्थ:- जो साधक पूर्ण संत से उपदेश प्राप्त करके साधना सम्पन्न नजर आता है, परंत विषय विकार त्याग नहीं करता, वह सर्व नाम प्राप्त करके भी पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति से वंचित रह जाता है। गीता अध्याय 2 श्लोक 70 में दोनों प्रकार के व्यक्तियों के विषय में कहा गया है। इसलिए श्लोक 71 में विकार रहित साधक के विषय में कहा है तथा श्लोक 72 में विकारों में मोहित साधक के विषय में कहा है।

    (इति अध्याय दूसरा)