श्रीमद भगवद गीता

संत रामपाल जी महाराज द्वारा अनुवादित

गीता अध्याय 3 | Gita Adhyay 3

श्लोक |Shlokas

1-10
11-20
21-30
31-40
41-43
  • अध्याय 3 का श्लोक 1 (अर्जुन उवाच)

    ज्यायसी, चेत्, कर्मणः, ते, मता, बुद्धिः, जनार्दन,
    तत्, किम्, कर्मणि, घोरे, माम्, नियोजयसि, केशव।।1।।

    अनुवाद: (जनार्दन) हे जनार्दन! (चेत्) यदि (ते) आपको (कर्मणः) कर्मकी अपेक्षा (बुद्धिः) तत्वदर्शी द्वारा दिया ज्ञान (ज्यायसी) श्रेष्ठ (मता) मान्य है (तत्) तो फिर (केशव) हे केशव! (माम्) मुझे एक स्थान पर बैठ कर इन्द्रियों को रोक कर, गर्दन व सिर को सीधा रख कर गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 15 तक वर्णित (घोरे) तथा युद्ध करने जैसे भयंकर (कर्मणि) तुच्छ कर्ममें (किम्) क्यों (नियोजयसि) लगाते हैं। (1)

    अध्याय 3 का श्लोक 2

    व्यामिश्रेण, इव, वाक्येन, बुद्धिम्, मोहयसि, इव, मे,
    तत्, एकम्, वद, निश्चित्य, येन, श्रेयः, अहम्, आप्नुयाम्।।2।।

    अनुवाद: (व्यामिश्रेण,इव) इस प्रकार आप मिले हुए से अर्थात् दो तरफा (वाक्येन) वचनोंसे (मे) मेरी (बुद्धिम्) बुद्धि (मोहयसि,इव) भ्रमित हो रही है इसलिए (तत्) उस (एकम्) एक बातको (निश्चित्य) निश्चित करके (वद) कहिये (येन) जिससे (अहम्) मैं (श्रेयः) कल्याणको (आप्नुयाम्) प्राप्त हो जाऊँ। (2)

    अध्याय 3 का श्लोक 3 (श्री भगवान उवाच)

    लोके, अस्मिन्, द्विविधा, निष्ठा, पुरा, प्रोक्ता, मया, अनघ,
    ज्ञानयोगेन, साङ्ख्यानाम्, कर्मयोगेन, योगिनाम्।।3।।

    अनुवाद: (अनघ) हे निष्पाप! (अस्मिन्) इस (लोके) लोकमें (द्विविधा) दो प्रकारकी (निष्ठा) निष्ठा (मया) मेरे द्वारा (पुरा) पहले (प्रोक्ता) कही गयी है उनमेंसे (साङ्ख्यानाम्) ज्ञानियों की निष्ठा तो (ज्ञानयोगेन) ज्ञानयोग अर्थात् अपनी ही सूझ-बूझ से निकाले भक्ति विधि के निष्कर्ष में और (योगिनाम्) योगियोंकी निष्ठा (कर्मयोगेन) कर्मयोगसे अर्थात् सांसारिक कार्य करते हुए साधना करने में होती है। (3)

    अध्याय 3 का श्लोक 4

    न, कर्मणाम्, अनारम्भात्, नैष्कम्र्यम्, पुरुषः, अश्नुते,
    न, च, सóयसनात्, एव, सिद्धिम्, समधिगच्छति।।4।।

    अनुवाद: (न) न तो (कर्मणाम्) कर्मोंका (अनारम्भात्) आरम्भ किये बिना (नैष्कम्र्यम्) शास्त्रों में वर्णित शास्त्रा अनुकुल साधना जो संसारिक कर्म करते-करते करने से पूर्ण मुक्ति होती है वह गति अर्थात् (पुरूषः) परमात्मा (अश्नुते) प्राप्त होता है जैसे किसी ने एक एकड़ गेहूँ की फसल काटनी है तो वह काटना प्रारम्भ करने से ही कटेगी। फिर काटने वाला कर्म शेष नही रहेगा (च) और (एव) इसलिए (सóयसनात्) कर्मोंके केवल त्यागमात्रासे एक स्थान पर बैठ कर विशेष आसन पर बैठ कर संसारिक कर्म त्यागकर हठ योग से (सिद्धिम्) सिद्धि (न समधिगच्छति) प्राप्त नहीं होती है। (4)

    अध्याय 3 का श्लोक 5

    न, हि, कश्चित्, क्षणम्, अपि, जातु, तिष्ठति, अकर्मकृत्,
    कार्यते, हि, अवशः, कर्म, सर्वः, प्रकृतिजैः, गुणैः।।5।।

    अनुवाद: (हि) निःसन्देह (कश्चित्) कोई भी मनुष्य (जातु) किसी भी कालमें (क्षणम्) क्षणमात्रा (अपि) भी (अकर्मकृृत्) बिना कर्म किये (न) नहीं (तिष्ठति) रहता (हि) क्योंकि (सर्वः) सारा मनुष्य समुदाय (प्रकृतिजैः) प्रकृति अर्थात् दुर्गा जनित (गुणैः) रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिव जी गुणोंद्वारा (अवशः) परवश हुआ (कर्म) कर्म करनेके लिये (कार्यते) बाध्य किया जाता है। (5)(इसी का प्रमाण अध्याय 14 श्लोक 3 से 5 में भी है।)

    अध्याय 3 का श्लोक 6

    कर्मेन्द्रियाणि, संयम्य, यः, आस्ते, मनसा, स्मरन्,
    इन्द्रियार्थान्, विमूढात्मा, मिथ्याचारः, सः, उच्यते।।6।।

    अनुवाद: (यः) जो (विमूढात्मा) महामूर्ख मनुष्य (कर्मेन्द्रियाणि) समस्त कर्म इन्द्रियोंको हठपूर्वक ऊपरसे (संयम्य) रोककर (मनसा) मनसे उन (इन्द्रियार्थान्) ज्ञान इन्द्रियोंके विषयोंका (स्मरन्) चिन्तन करता (आस्ते) रहता है, (सः) वह (मिथ्याचारः) मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी (उच्यते) कहा जाता है(6)(इसी का विस्तृत वर्णन गीता अध्याय 17 श्लोक 19 में है।)

    अध्याय 3 का श्लोक 7

    यः, तु, इन्द्रियाणि, मनसा, नियम्य, आरभते, अर्जुन,
    कर्मेन्द्रियैः, कर्मयोगम्, असक्तः, सः, विशिष्यते।।7।।

    अनुवाद: (तु) किंतु (अर्जुन) हे अर्जुन! (यः) जो पुरुष (मनसा) मनसे (इन्द्रियाणि)गहरी नजर गीता में इन्द्रियोंको (नियम्य) नियन्त्रिात अर्थात् वशमें करके (असक्तः) अनासक्त हुआ (कर्मेन्द्रियैः) समस्त कर्म इन्द्रियोंद्वारा (कर्मयोगम्) शास्त्रा विधि अनुसार संसारी कार्य करते-करते भक्ति कर्म अर्थात् कर्मयोगका (आरभते) आचरण करता है (सः) वही (विशिष्यते) श्रेष्ठ है। (7)

    विशेष:- उपरोक्त न करने वाले हठयोग को गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 15 में करने को कहा है। इसलिए अर्जुन इसी अध्याय 3 के श्लोक 2 में कह रहा है कि आप की दोगली बातें मुझे भ्रम में डाल रही हैं।

    अध्याय 3का श्लोक 8

    नियतम्, कुरु, कर्म, त्वम्, कर्म, ज्यायः, हि, अकर्मणः,
    शरीरयात्रा, अपि, च, ते, न, प्रसिद्धयेत्, अकर्मणः।।8।।

    अनुवाद: (त्वम्) तू (नियतम्) शास्त्राविहित (कर्म) कर्म (कुरु) कर (हि) क्योंकि (अकर्मणः) कर्म न करनेकी अपेक्षा अर्थात् एक स्थान पर एकान्त स्थान पर विशेष कुश के आसन पर बैठ कर भक्ति कर्म हठपूर्वक करने की अपेक्षा (कर्म) संसारिक कर्म करते-करते भक्ति कर्म करना (ज्यायः) श्रेष्ठ है (च) तथा (अकर्मणः) कर्म न करनेसे अर्थात् हठयोग करके एकान्त स्थान पर बैठा रहेगा तो (ते) तेरा (शरीरयात्रा) शरीर-निर्वाह अर्थात् तेरा परिवार पोषण (अपि) भी (न) नहीं (प्रसिद्धयेत्) सिद्ध होगा। (8)

    अध्याय 3का श्लोक 9

    यज्ञार्थात्, कर्मणः, अन्यत्रा, लोकः, अयम्, कर्मबन्धनः,
    तदर्थम्, कर्म, कौन्तेय, मुक्तसंगः, समाचर।।9।।

    अनुवाद: (यज्ञार्थात्) यज्ञ अर्थात् धार्मिक अनुष्ठान के निमित किये जानेवाले (कर्मणः) शास्त्रा विधि अनुसार कर्मोंसे अतिरिक्त (अन्यत्रा) शास्त्रा विधि त्याग कर दूसरे कर्मोंमें लगा हुआ ही (अयम्) इस (लोकः) संसार में (कर्मबन्धनः) कर्मोंसे बँधता है अर्थात् चैरासी लाख योनियों में यातनाऐं सहन करता है।। इसलिए (कौन्तेय) हे अर्जुन! तू (मुक्तसंगः) आसक्तिसे रहित होकर (तदर्थम्) उस शास्त्रानुकूल यज्ञके निमित ही भलीभाँति (कर्म) भक्ति के शास्त्रा विधि अनुसार करने योग्य कर्म अर्थात् कर्तव्यकर्म (समाचर) संसारिक कर्म करता हुआ शास्त्रा अनुकूल अर्थात् विधिवत् साधना कर। (9)

    विशेष:- उपरोक्त गीता अध्याय 3 श्लोक 6 से 9 तक एक स्थान पर एकान्त में विशेष आसन पर बैठ कर कान-आंखें आदि बन्द करके हठ करने की मनाही की है तथा शास्त्रों में वर्णित भक्ति विधि अनुसार साधना करना श्रेयकर बताया है।

    प्रत्येक सद्ग्रन्थों में संसारिक कार्य करते-करते नाम जाप व यज्ञादि करने का भक्ति विद्यान बताया है।

    प्रमाण:- पवित्रा गीता अध्याय 8 श्लोक 13 में कहा है कि मुझ ब्रह्म का उच्चारण करके सुमरण करने का केवल एक मात्रा ओ3म् अक्षर है जो इसका जाप अन्तिम स्वांस तक कर्म करते-करते भी करता है वह मेरे वाली परमगति को प्राप्त होता है।

    फिर अध्याय 8 श्लोक 7 में कहा है कि हर समय मेरा सुमरण भी कर तथा युद्ध भी कर। इस प्रकार मेरे आदेश का पालन करते हुए अर्थात् संसारिक कर्म करते-करते साधना करता हुआ मुझे ही प्राप्त होगा। भले ही अपनी परमगति को गीता अध्याय 7 मंत्रा 18 में अति अश्रेष्ठ अर्थात् अति व्यर्थ बताया है। फिर भी भक्ति विधि यही है।

    फिर अध्याय 8 श्लोक 8 से 10 तक विवरण दिया है कि चाहे उस परमात्मा अर्थात् पूर्णब्रह्म की भक्ति करो, जिसका विवरण गीता अध्याय 17 श्लोक 23 तथा अध्याय 18 श्लोक 62 व अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में दिया है। उसका भी यही विद्यान है कि जो साधक पूर्ण परमात्मा की साधना तत्वदर्शी संत से उपदेश प्राप्त करके नाम जाप करता हुआ तथा संसारिक कार्य करता हुआ शरीर त्याग कर जाता है वह उस परम दिव्य पुरुष अर्थात् पूर्ण परमात्मा को ही प्राप्त होता है। तत्वदर्शी संत का संकेत गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में दिया है।

    यही प्रमाण पवित्रा यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्रा 10 तथा 15 में दिया है।

    यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्रा 10 का भावार्थ:- पवित्रा वेदों को बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा के विषय में कोई तो कहता है कि वह अवतार रूप में उत्पन्न होता है अर्थात् आकार में कहा जाता है, कोई उसे कभी अवतार रूप में आकार में न आने वाला अर्थात् निराकार कहता है। उस पूर्ण परमात्मा का तत्वज्ञान तो कोई धीराणाम् अर्थात् तत्वदर्शी संत ही बताऐंगे कि वास्तव में पूर्ण परमात्मा का शरीर कैसा है? वह कैसे प्रकट होता है? पूर्ण परमात्मा की पूरी जानकारी उसी धीराणाम् अर्थात् तत्वदर्शी संत से सुनों। मैं वेद ज्ञान देने वाला ब्रह्म भी नहीं जानता।

    फिर भी अपनी भक्ति विधि को बताते हुए अध्याय 40 मंत्रा 15 में कहा है कि मेरी साधना ओ3म् नाम का जाप कर्म करते-करते कर, विशेष आस्था के साथ सुमरण कर तथा मनुष्य जीवन का मुख्य कत्र्तव्य जान कर सुमरण कर इससे मृत्यु उपरान्त अर्थात् शरीर छूटने पर मेरे वाला अमरत्व अर्थात् मेरी परमगति को प्राप्त हो जाएगा। जैसे सूक्ष्म शरीर में कुछ शक्ति आ जाती है कुछ समय तक अमर हो जाता है। जिस कारण स्वर्ग में चला जाता है। फिर जन्म-मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

    अध्याय 3का श्लोक 10

    सहयज्ञाः, प्रजाः, सृष्टा , पुरा, उवाच, प्रजापतिः,
    अनेन, प्रसविष्यध्वम्, एषः, वः, अस्तु, इष्टकामधुक्।।10।।

    अनुवाद: (प्रजापतिः) प्रजापति ने (पुरा) कल्पके आदिमें (सहयज्ञाः) यज्ञसहित (प्रजाः) प्रजाओंको (सृष्टा ) रचकर उनसे (उवाच) कहा कि (अनेन) अन्न द्वारा होने वाला धार्मिक कर्म जिसे धर्म यज्ञ कहते हैं, जिसमें भण्डारे करना आदि है, इस यज्ञके द्वारा (प्रसविष्यध्वम्) वृद्धिको प्राप्त होओ और (वः) तुम को (एषः) यह पूर्ण परमात्मा (इष्टकामधुक्) यज्ञ में प्रतिष्ठित इष्ट ही इच्छित भोग प्रदान करनेवाला (अस्तु) हो। (10)

  • अध्याय 3 का श्लोक 11

    देवान्, भावयत, अनेन, ते, देवाः, भावयन्तु, वः,
    परस्परम् भावयन्तः, श्रेयः, परम्, अवाप्स्यथ।।11।।

    विशेष:- गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में वर्णित उल्टा लटका हुआ संसार रूपी वृक्ष है, उस की जड़ (मूल) तो पूर्ण परमात्मा है तथा तना परब्रह्म अर्थात् अक्षर पुरुष है तथा डार क्षर पुरुष (ब्रह्म) है व तीनों गुण अर्थात् रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी रूपी शाखायें हैं। वृृक्ष को मूल(जड़) से ही खुराक अर्थात् आहार प्राप्त होता है। जैसे हम आम का पौधा लगायेंगे तो मूल को सीचेंगे, जड़ से खुराक तना में जायेगी, तना से मोटी डार में, डार से शाखाओं में जायेगी, फिर उन शाखाओं को फल लगेंगे, फिर वह टहनियां अपने आप फल देंगी। इसी प्रकार पूर्णब्रह्म अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म रूपी मूल की पूजा अर्थात् सिंचाई करने से अक्षर पुरुष अर्थात् परब्रह्म रूपी तना में संस्कार अर्थात् खुराक जायेगी, फिर अक्षर पुरुष से क्षर पुरुष अर्थात् ब्रह्म रूपी डार में संस्कार अर्थात् खुराक जायेगी। फिर ब्रह्म से तीनों गुण अर्थात् श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी रूपी तीनों शाखाओं में संस्कार अर्थात् खुराक जायेगी। फिर इन तीनों देवताओं रूपी टहनियों को फल लगेंगे अर्थात् फिर तीनों प्रभु श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी हमें संस्कार आधार पर ही कर्म फल देते हैं। यही प्रमाण गीता अध्याय 15 श्लोक 16 व 17 में भी है कि दो प्रभु इस पृथ्वी लोक में है, एक क्षर पुरुष अर्थात् ब्रह्म, दूसरा अक्षर पुरुष अर्थात् परब्रह्म। ये दोनों प्रभु तथा इनके लोक में सर्व प्राणी तो नाशवान हैं, वास्तव में अविनाशी तथा तीनों लोकों में प्रवेश करके सर्व का धारण-पोषण करने वाला परमेश्वर परमात्मा तो उपरोक्त दोनों भगवानों से भिन्न है।

    अनुवाद: (अनेन) इस यज्ञके द्वारा (देवान्) देवताओं अर्थात् शाखाओं को (भावयत) उन्नत करो और (ते) वे (देवाः) देवता अर्थात् शाखायें (वः) तुमलोगोंको (भावयन्तु) उन्नत करें अर्थात् संस्कार वश फल प्रदान करें। इस प्रकार निःस्वार्थभावसे (परस्परम्) एक-दूसरेको (भावयन्तः) उन्नतकरते हुए (परम्) परम (श्रेयः) कल्याणको (अवाप्स्यथ) प्राप्त हो जाओगे। (11)

    अध्याय 3 का श्लोक 12

    इष्टान् भोगान्, हि, वः, देवाः, दास्यन्ते, यज्ञभाविताः,
    तैः दत्तान्, अप्रदाय, एभ्यः, यः, भुङ्क्ते, स्तेनः, एव, सः।।12।।

    अनुवाद: (हि) क्योंकि (इष्टान्) उस यज्ञों में प्रतिष्ठित इष्ट देव अर्थात् पूर्ण परमात्मा को (भोगान्) भोग लगाने से मिलने वाले प्रतिफल रूप भोगों को (वः) तुमको (यज्ञभाविताः) यज्ञों के द्वारा फले (देवाः) देवता (दास्यन्ते) इसका प्रतिफल देते रहेगें। (तैः) उनके द्वारा (दत्तान्) दिये हुए भौतिक सुख को (यः) जो (एभ्यः) इनको (अप्रदाय) बिना दिये अर्थात् यज्ञ दान आदि नहीं करते (भुङ्क्ते) स्वयं ही खा जाते हैं, (सः) वह (एव) वास्तव में (स्तेनः) चोर है। (12)

    अध्याय 3 का श्लोक 13

    यज्ञशिष्टाशिनः, सन्तः, मुच्यन्ते, सर्वकिल्बिषैः,
    भुजते, ते, तु, अघम्, पापाः, ये, पचन्ति, आत्मकारणात्।। 13।।

    अनुवाद: (यज्ञशिष्टाशिनः) यज्ञ में प्रतिष्ठित इष्ट अर्थात् पूर्ण परमात्मा को भोग लगाने के बाद बने प्रसाद को खाने वाले (सन्तः) साधु (सर्वकिल्बिषैः) यज्ञादि न करने से होने वाले सब पापोंसे (मुच्यन्ते) बच जाते हैं और (ये) जो (पापाः) पापीलोग (आत्मकारणात्) अपना शरीर पोषण करनेके लिये ही (पचन्ति) अन्न पकाते हैं (ते) वे (तु) तो (अघम्) पापको ही (भुजते) खाते हैं। ( 13)

    अध्याय 3 का श्लोक 14-15

    अन्नात्, भवन्ति, भूतानि, पर्जन्यात्, अन्नसम्भवः,
    यज्ञात्, भवति, पर्जन्यः, यज्ञः, कर्मसमुद्भवः।।14।।

    कर्म, ब्रह्मोद्भवम्, विद्धि, ब्रह्म, अक्षरसमुद्भवम्,
    तस्मात्, सर्वगतम्, ब्रह्म, नित्यम्, यज्ञे, प्रतिष्ठितम्।।15।।

    अनुवाद: (भूतानि) प्राणी ( अन्नात्) अन्नसे (भवन्ति) उत्पन्न होते हैं , (अन्नसम्भवः) अन्नकी उत्पत्ति (पर्जन्यात्) वृ ष्टिसे होती है (पर्जन्यः) वृृष्टि (यज्ञात्) यज्ञसे (भवति) होती है और (यज्ञः) यज्ञ (कर्मसमुद्भवः) विहित कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाला है। (कर्म) कर्मको तू (ब्रह्मोद्भवम्) ब्रह्मसे उत्पन्न और (ब्रह्म) ब्रह्म अर्थात् क्षर पुरुष को (अक्षरसमुद्भवम्) अविनाशी परमात्मासे उत्पन्न हुआ (विद्धि) जान। (तस्मात्) इससे सिद्ध होता है कि (सर्वगतम्) सर्वव्यापी (ब्रह्म) परमात्मा (नित्यम्) सदा ही (यज्ञे) यज्ञमें (प्रतिष्ठितम्) प्रतिष्ठित है अर्थात् यज्ञों का भोग लगा कर फल दाता भी वही पूर्णब्रह्म है। (इसी का प्रमाण पवित्रा गीता अध्याय 4 श्लोक 13 में है कि गुणों के आधार से कर्म लगाकर चार वर्ण बनाए हैं तथा कर्म का लगाने वाला कत्र्ता मैं ब्रह्म ही हूं।)(14-15)

    अध्याय 3 का श्लोक 16

    एवम्, प्रवर्तितम्, चक्रम्, न, अनुवर्तयति, इह, यः,
    अघायुः, इन्द्रियारामः, मोघम्, पार्थ, सः, जीवति।।16।।

    अनुवाद: (पार्थ) हे पार्थ! (यः) जो पुरुष (इह) इस लोकमें (एवम्) इस प्रकार परम्परासे (प्रवर्तितम्) प्रचलित (चक्रम्) सृष्टिचक्रके (न, अनुवर्तयति) अनुकूल नहीं बरतता अर्थात् अपने कत्र्तव्यका पालन नहीं करता (सः) वह (इन्द्रियारामः) इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला (अघायुः) पापी पुरुष (मोघम्) व्यर्थ ही (जीवति) जीवित है। (16)

    अध्याय 3 का श्लोक 17

    यः, तु, आत्मरतिः, एव, स्यात्, आत्मतृप्तः, च, मानवः,
    आत्मनि, एव, च, सन्तुष्टः, तस्य, कार्यम्, न, विद्यते।।17।।

    अनुवाद: (तु) परंतु (यः) जो (मानवः) मनुष्य (एव) वास्तव में (आत्मरतिः) आत्मा के साथ अभेद रूप में रहने वाले परमात्मा में लीन रहने वाला ही रमण (च) और (आत्मतृप्तः) परमात्मा में ही तृप्त (च) तथा (आत्मनि एव) परमात्मा में ही (सन्तुष्टः) संतुष्ट (स्यात्) हो, (तस्य) उसके लिये (कार्यम्) कोई कत्र्तव्य (न) नहीं (विद्यते) जान पड़ता। (17)

    अध्याय 3 के श्लोक 18

    न, एव, तस्य, कृृतेन, अर्थः, न, अकृृतेन, इह, कश्चन,
    न, च, अस्य, सर्वभूतेषु, कश्चित्, अर्थव्यपाश्रयः।।18।।

    अनुवाद: (तस्य) उस महापुरुषका (इह) इस विश्वमें (न) न तो (कृतेन) कर्म करनेसे (कश्चन) कोई (अर्थः) प्रयोजन रहता है और (न) न (अकृतेन) कर्मोंके न करनेसे (एव) ही कोई प्रयोजन रहता है (च) तथा (सर्वभूतेषु) सम्पूर्ण प्राणियोंमें भी (अस्य) इसका (कश्चित्) किंचितमात्रा भी (अर्थव्यपाश्रयः) स्वार्थका सम्बन्ध (न) नहीं रहता। क्योंकि वह स्वार्थ रहित होने से किसी को शास्त्रा विधि रहित भक्ति कर्म नहीं करवाता, न ही स्वयं करता है। वह धन उपार्जन के उद्देश्य से साधना नहीं करता या करवाता। (18)

    अध्याय 3 का श्लोक 19

    तस्मात्, असक्तः, सततम्, कार्यम्, कर्म, समाचर,
    असक्तः, हि, आचरन्, कर्म, परम्, आप्नोति, पूरुषः।।19।।

    अनुवाद: (तस्मात्) इसलिये तू (सततम्) निरन्तर (असक्तः) आसक्तिसे रहित होकर सदा (कार्यम् कर्म) शास्त्रा विधि अनुसार कर्तव्यकर्मको (समाचर) भलीभाँति करता रह। (हि) क्योंकि (असक्तः) इच्छासे रहित होकर (कर्म) भक्ति कर्म (आचरन्) करता हुआ (परम् पूरुषः) पूर्ण परमात्माको (आप्नोति) प्राप्त हो जाता है। (19)

    अध्याय 3 का श्लोक 20

    कर्मणा, एव, हि, संसिद्धिम्, आस्थिताः, जनकादयः,
    लोकसंग्रहम्, एव, अपि, सम्पश्यन्, कर्तुम्, अर्हसि।।20।।

    अनुवाद: (जनकादयः) जनकादि भी (कर्मणा) आसक्ति रहित कर्मद्वारा (एव) ही (संसिद्धिम्) सिद्धिको (आस्थिताः) प्राप्त हुए थे। (हि) इसलिये (लेाकसंग्रहम्) लोकसंग्रहको (सम्पश्यन्) देखते हुए (अपि) भी तू (कर्तुम्) सांसारिक कार्य करते हुए भी शास्त्रा विधि अनुसार कर्म करनेको (एव) ही (अर्हसि) योग्य है अर्थात् तुझे कर्म करना ही उचित है। (20)

  • अध्याय 3 का श्लोक 21

    यत्, यत् आचरति, श्रेष्ठः, तत्, तत्, एव, इतरः, जनः,
    सः, यत्, प्रमाणम्, कुरुते, लोकः, तत्, अनुवर्तते।।21।।

    अनुवाद: (श्रेष्ठः) श्रेष्ठ पुरुष अर्थात् शास्त्रा विधि अनुसार साधना करने वाले साधक (यत्,यत्) जो-जो (आचरति) आचरण करता है (इतरः) अन्य (जनः) पुरुष भी (तत्,तत्) वैसा-वैसा (एव) ही आचरण करते हैं (सः) वह (यत्) जो कुछ (प्रमाणम्) प्रमाण (कुरुते) कर देता है (लोकः) समस्त मनुष्यसमुदाय (तत्) उसीके (अनुवर्तते) अनुसार बरतने लग जाता है। (21)

    अध्याय 3 का श्लोक 22

    न, मे, पार्थ, अस्ति, कर्तव्यम्, त्रिषु, लोकेषु, कि×चन,
    न, अनवाप्तम्, अवाप्तव्यम्, वर्ते, एव, च, कर्मणि।।22।।

    अनुवाद: (पार्थ) हे अर्जुन! (मे) मुझे इन (त्रिषु) तीनों (लोकेषु) लोकोंमे (न) न तो (कि×चन) कुछ (कर्तव्यम्) कर्तव्य (अस्ति) है (च) और (न) न कोई भी (अवाप्तव्यम्) प्राप्त करने योग्य वस्तु (अनवाप्तम्) अप्राप्त है तो भी मैं (कर्मणि) कर्ममें (एव) ही (वर्ते) बरतता हूँ। (22)

    अध्याय 3 का श्लोक 23

    यदि, हि, अहम्, न, वर्तेयम्, जातु, कर्मणि, अतन्द्रितः,
    मम, वत्र्म, अनुवर्तन्ते, मनुष्याः, पार्थ, सर्वशः।।23।।

    अनुवाद: (हि) क्योंकि (पार्थ) हे पार्थ! (यदि) यदि (जातु) कदाचित् (अहम्) मैं (अतन्द्रितः) सावधान होकर (कर्मणि) कर्मोंमें (न) न (वर्तेयम्) बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाऐ क्योंकि (मनुष्याः) मनुष्य (सर्वशः) सब प्रकारसे (मम) मेरे ही (वत्र्म) मार्गका (अनुवर्तन्ते) अनुसरण करते हैं। (23)

    अध्याय 3 का श्लोक 24

    उत्सीदेयुः, इमे, लोकाः, न, कुर्याम्, कर्म, चेत्, अहम्,
    संकरस्य, च, कर्ता, स्याम्, उपहन्याम्, इमाः, प्रजाः।।24।।

    अनुवाद: (चेत्) यदि (अहम्) मैं (कर्म) कर्म (न) न (कुर्याम्) करूँ तो (इमे) ये (लोकाः) सब मनुष्य (उत्सीदेयुः) नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ (च) और मैं (संकरस्य) संकरताका (कर्ता) करनेवाला (स्याम्) होऊँ तथा (इमाः) इस (प्रजाः) समस्त प्रजाको (उपहन्याम्) नष्ट करनेवाला बनूँ। (24)

    अध्याय 3का श्लोक 25

    सक्ताः, कर्मणि, अविद्वांसः, यथा, कुर्वन्ति, भारत,
    कुर्यात्, विद्वान्, तथा, असक्तः, चिकीर्षुः, लोकसङ्ग्रहम्।।25।।

    अनुवाद: (भारत) हे भारत! (कर्मणि) कर्ममें (सक्ताः) आसक्त हुए (अविद्वांसः) अज्ञानीजन (यथा) जिस प्रकार शास्त्राअनुकूल कर्म (कुर्वन्ति) करते हैं (असक्तः) आसक्तिरहित (विद्वान्) विद्वान् भी (लोकसङ्ग्रहम्) शिष्य बनाने की इच्छा से जनता इक्कठी (चिकीर्षुः) करना चाहता हुआ (तथा) उपरोक्त शास्त्रा विधि अनुसार कर्म (कुर्यात्) करे। (25)

    भावार्थ:- भगवान कह रहे है कि यदि अशिक्षित व्यक्ति शास्त्राविधि अनुसार साधना करते हैं तो शिक्षित व्यक्ति को भी उसका अनुसरण करना चाहिए। इसी में विश्व कल्याण है।

    अध्याय 3का श्लोक 26

    न, बुद्धिभेदम्, जनयेत्, अज्ञानाम्, कर्मसंगिनाम्,
    जोषयेत्, सर्वकर्माणि, विद्वान्, युक्तः, समाचरन्।।26।।

    अनुवाद: (कर्मसंगिनाम्) शास्त्रा अनुकूल साधकों द्वारा दिए ज्ञान से शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति कर्मों पर अडिग (अज्ञानाम्) अशिक्षितों अर्थात् अज्ञानियोंकी (बुद्धिभेदम्) साधनाओं शास्त्रा विरुद्ध साधना से हानि तथा शास्त्रा विधि अनुसार साधना से लाभ होता है, इसे प्रत्यक्ष देखकर उनकी बुद्धि में अन्तर (न, जनयेत्) उत्पन्न न करे अर्थात् उनको विचलित न करें कि तुम अशिक्षित हो तुम क्या जानों सत्य साधना। अपने मान वश उनको भ्रमित न करके अन्य शास्त्रा विरूद्ध (युक्तः) साधना में लीन (विद्वान्) ज्ञानी पुरुषको चाहिए कि वह (सर्वकर्माणि) भक्ति कर्मों को (समाचरन्) सुचारू रूप से करता हुआ उनसे भी वैसे ही (जोषयेत्) करवावे अर्थात् उनको भ्रमित न करके प्रोत्साहन करे। (26)

    अध्याय 3 का श्लोक 27

    प्रकृतेः, क्रियमाणानि, गुणैः, कर्माणि, सर्वशः,
    अहंकारविमूढात्मा, कर्ता, अहम्, इति, मन्यते।।27।।

    अनुवाद: (कर्माणि) सम्पूर्ण कर्म (सर्वशः) सब प्रकारसे (प्रकृतेः) प्रकृति दुर्गा से उत्पन्न (गुणैः) रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिव जी अर्थात् तीनों गुणोंद्वारा (क्रियमाणानि) संस्कार वश किये जाते हैं तो भी (अहंकार विमूढात्मा) अहंकार युक्त शिक्षित होते हुए तत्वज्ञान हीन अज्ञानी (अहम्,कर्ता) ‘मैं कत्र्ता हूँ‘ (इति) ऐसा (मन्यते) मानता है। (27)

    अध्याय 3 का श्लोक 28

    तत्त्ववित्, तु, महाबाहो, गुणकर्मविभागयोः,
    गुणाः, गुणेषु, वर्तन्ते, इति, मत्वा, न, सज्जते।।28।।

    अनुवाद: (तु) परंतु (महाबाहो) हे महाबाहो! (गुणकर्मविभागयोः) गुणविभाग और कर्मविभागके (तत्त्ववित्) तत्वको जाननेवाला ज्ञानी अर्थात् तत्वदर्शी (गुणाः) सम्पूर्ण गुण ही (गुणेषु) गुणोंमें (वर्तन्ते) बरत रहे हैं अर्थात् जितनी शक्ति तीनों गुणों रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तमगुण शिव जी में है, उससे पूर्ण परिचित व्यक्ति की आस्था इन में इतनी रह जाती है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 2 श्लोक 45-46 में भी है (इति) ऐसा (मत्वा) समझकर उनमें (न,सज्जते) आसक्त नहीं होता अर्थात् अहंकार त्यागकर तुरन्त शास्त्राअनुकूल साधना करने लग जाता है। (28)

    अध्याय 3 का श्लोक 29

    प्रकृृतेः, गुणसम्मूढाः, सज्जन्ते, गुणकर्मसु,
    तान्, अकृत्स्न्नविदः, मन्दान्, कृत्स्न्नवित्, न, विचालयेत्।।29।।

    अनुवाद: (प्रकृतेः) प्रकृति से उत्पन्न प्रकृति के पुत्रा तीनों (गुणसम्मूढाः) गुणों अर्थात् रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी से अत्यन्त मोहित हुए मुर्ख मनुष्य (गुणकर्मसु) गुणों अर्थात् तीनों प्रभुओं की साधना के कर्मोंमें (सज्जन्ते) आसक्त रहते हैं (तान्) उन (अकृृत्स्त्राविदः) पूर्णतया न समझनेवाले अर्थात् शास्त्रा विधि त्याग कर साधना करने वाले जो स्वभाव वश चल रहे हैं उन (मन्दान्) मन्दबुद्धि अशिक्षितों को (कृत्स्त्रावित्) सत्यभक्ति जाननेवाला ज्ञानी अर्थात् शास्त्रा अनुसार साधना करने वाले (न, विचालयेत्) मन्द बुद्धि अज्ञानियों को जो स्वभाववश तीनों गुणों अर्थात् श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी तक की साधना पर अडिग हैं, उनकी गलत साधना से विचलित नहीं कर सकते अर्थात् बहुत कठिन है, वे तो नष्ट ही हैं। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 तक में भी है। (29)

    अध्याय 3का श्लोक 30

    मयि, सर्वाणि, कर्माणि, सóयस्य, अध्यात्मचेतसा,
    निराशीः, निर्ममः, भूत्वा, युध्यस्व, विगतज्वरः।।30।।

    अनुवाद: (अध्यात्मचेतसा) पूर्ण परमात्मामें लगे हुए चितद्वारा (सर्वाणि) सम्पूर्ण (कर्माणि) कर्मोंको (मयि) मुझमें (सóयस्य) त्याग करके (निराशीः) आशारहित (निर्ममः) ममतारहित और (विगतज्वरः) संतापरहित (भूत्वा) होकर (युध्यस्व) युद्ध कर। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 66 में है कि मेरी सर्व धार्मिक पूजाओं को मुझमें छोड़ कर सर्व शक्तिमान परमेश्वर की शरण में जा। (30)

  • अध्याय 3 का श्लोक 31

    ये, मे, मतम्, इदम्, नित्यम्, अनुतिष्ठन्ति, मानवाः,
    श्रद्धावन्तः, अनसूयन्तः, मुच्यन्ते, ते, अपि, कर्मभिः।।31।।

    अनुवाद: (ये) जो कोई (मानवाः) मनुष्य (अनसूयन्तः) दोषदृष्टिसे रहित और (श्रद्धावन्तः) श्रद्धायुक्त होकर (मे) मेरे (इदम्) इस (मतम्) मत अर्थात् सिद्धांत का (नित्यम्) सदा (अनुतिष्ठन्ति) अनुसरण करते हैं (ते) वे (अपि) भी (कर्मभिः) शास्त्रा विधि त्याग कर अर्थात् सिद्धान्त छोड़ कर किए जाने वाले दोष युक्त कर्मोंसे (मुच्यन्ते) बच जाते हैं। (31)

    अध्याय 3 का श्लोक 32

    ये, तु, एतत्, अभ्यसूयन्तः, न, अनुतिष्ठन्ति, मे, मतम्,
    सर्वज्ञानविमूढान्, तान्, विद्धि, नष्टान्, अचेतसः।।32।।

    अनुवाद: (तु) परंतु (ये) जो (अभ्यसूयन्तः) दोषारोपण करते हुए (मे) मेरे (एतत्) इस (मतम्) मत अर्थात् सिद्धान्त के (न, अनुतिष्ठन्ति) अनुसार नहीं चलते हैं (तान्) उन (अचेतसः) मूर्खोंको तू (सर्वज्ञानविमूढ़ान्) सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित और (नष्टान्) नष्ट हुए ही (विद्धि) जान। (32)

    विशेष:- गीता अध्याय 3 श्लोक 25 से 29 में अपने द्वारा बतायें गए मत अर्थात् सिद्धान्त का विस्तृृत वर्णन किया है। 3 श्लोक 25 से 29 में विचार व्यक्त किए हैं कि शिक्षित व्यक्ति यदि शास्त्रा विधि त्याग कर साधना कर रहे हैं और उन्हें कोई अशिक्षित शास्त्रा अनुसार साधना करता हुआ मिले तो उसे विचलित न करें अपितु स्वयं भी उनकी साधना को स्वीकार करे। पूर्ण सन्त से उपदेश प्राप्त करके अपना कल्याण कराऐं। यही प्रमाण गीता अध्याय 13 श्लोक 11 में भी है।

    अध्याय 3 का श्लोक 33

    सदृशम्, चेष्टते, स्वस्याः, प्रकृतेः, ज्ञानवान्, अपि,
    प्रकृतिम्, यान्ति, भूतानि, निग्रहः, किम्, करिष्यति।।33।।

    अनुवाद: (भूतानि) सभी प्राणी (प्रकृतिम्) प्रकृति अर्थात् स्वभाव को (यान्ति) प्राप्त होते हैं (ज्ञानवान्) ज्ञानवान् (अपि) भी (स्वस्याः) अपने निष्कर्ष द्वारा निकाले भक्ति मार्ग के आधार से (प्रकृृतेः) स्वभावके (सदृृशम्) अनुसार (चेष्टते) चेष्टा करता है (निग्रहः) हठ (किम्) क्या (करिष्यति) करेगा? (33)

    विशेष:- स्वभाव वश सर्व प्राणी धार्मिक कर्म करते हैं। कहने से भी नहीं मानते। वे राक्षस स्वभाव के व्यक्ति शास्त्रा विधि रहित अर्थात् मेरे मत के विपरीत मनमाना आचरण करते हैं:- प्रमाण गीता अध्याय 16 व 17 में।

    विचार करें:-- अध्याय 3 के श्लोक 33, 34, 35 का भाव है कि सर्व प्राणी प्रकृति(माया) के वश ही हैं। स्वभाववश कर्म करते हैं। ऐसे ही ज्ञानी भी अपनी आदत वश कर्म करते हैं फिर हठ क्या करेगा।

    सार: -- शिक्षित व्यक्ति जो तत्वज्ञान हीन हैं अपनी गलत पूजा को नहीं त्यागते चाहे कितना आग्रह करें, चाहे सद्ग्रन्थों के प्रमाण भी दिखा दिए जाऐं वे नहीं मानते। कुछ ज्ञानी-विद्वान पुरुष मान वश पैसा प्राप्ति व अधिक शिष्य बनाने की इच्छा से सच्चाई का अनुसरण नहीं करते। उन तत्वज्ञान हीन सन्तों के अशिक्षित शिष्य व शिक्षित शिष्य प्रमाण देखकर भी उन अज्ञानी सन्तों को नहीं त्यागते सत्य साधना ग्रहण नहीं करते वे मूढ़ हैं। दोनों (ज्ञानी व अज्ञानी) स्वभाव वश चल रहे हैं। इसलिए भक्ति मार्ग गलत दिशा पकड़ चुका है तथा इन दोनों को समझाना व्यर्थ है।

    गरीब, चातुर प्राणी चोर हैं, मूढ मुग्ध हैं ठोठ। संतों के नहीं काम के, इनकूं दे गल जोट।।

    अध्याय 3 का श्लोक 34

    इन्द्रियस्य, इन्द्रियस्य, अर्थे, रागद्वेषौ, व्यवस्थितौ,
    तयोः, न, वशम्, आगच्छेत्, तौ, हि, अस्य, परिपन्थिनौ।।34।।

    अनुवाद: (इन्द्रियस्य, इन्द्रियस्य) इन्द्रिय-इन्द्रियके (अर्थे) अर्थमें अर्थात् प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें (रागद्वेषौ) राग और द्वेष (व्यवस्थितौ) छिपे हुए स्थित हैं। (तयोः) उन दोनोंके (वशम्) वशमें (न) नहीं (आगच्छेत्) होना चाहिये (हि) क्योंकि (तौ) वे दोनों ही (अस्य) इसके (परिपन्थिनौ) विघ्न करनेवाले महान् शत्राु हैं। (34)

    अध्याय 3 का श्लोक 35

    श्रेयान्, स्वधर्मः, विगुणः, परधर्मात्, स्वनुष्ठितात्,
    स्वधर्मे, निधनम्, श्रेयः, परधर्मः, भयावहः।।35।।

    अनुवाद: (विगुणः) गुणरहित अर्थात् शास्त्रा विधि त्याग कर (स्वनुष्ठितात्) स्वयं मनमाना अच्छी प्रकार आचरणमें लाये हुए (परधर्मात्) दूसरोंकी धार्मिक पूजासे (स्वधर्मः) अपनी शास्त्रा विधि अनुसार पूजा (श्रेयान्) अति उत्तम है जो शास्त्रानुकूल है (स्वधर्मे) अपनी पूजा में तो (निधनम्) मरना भी (श्रेयः) कल्याणकारक है और (परधर्मः) दूसरेकी पूजा (भयावहः) भयको देनेवाली है। (35)

    यही प्रमाण श्री विष्णु पुराण तृतीश अंश, अध्याय 18 श्लोक 1 से 12 पृृष्ठ 215 से 220 तक है।

    अध्याय 3 का श्लोक 36 (अर्जुन उवाच)

    अथ, केन, प्रयुक्तः, अयम्, पापम्, चरति, पूरुषः,
    अनिच्छन्, अपि, वाष्र्णेय, बलात्, इव, नियोजितः।।36।।

    अनुवाद: (वाष्र्णेय) हे कृष्ण! तो (अथ) फिर (अयम्) यह (पूरुषः) मनुष्य स्वयम् (अनिच्छन्) न चाहता हुआ (अपि) भी (बलात्) बलात् (नियोजितः) लगाये हुएकी (इव) भाँति (केन) किससे (प्रयुक्तः) प्रेरित होकर (पापम्) पापका (चरति) आचरण करता है?(36)

    अध्याय 3 का श्लोक 37 (भगवान उवाच)

    कामः, एषः, क्रोधः, एषः, रजोगुणसमुद्भवः,
    महाशनः, महापाप्मा, विद्धि, एनम्, इह, वैरिणम्।।37।।

    अनुवाद: (रजोगुणसमुद्भवः) रजोगुणसे उत्पन्न हुआ (एष) यह (कामः) विषय वासना अर्थात् सैक्स और (एष) यह (क्रोधः) क्रोध (महाशनः) जीव को अत्यधिक खाने वाला अर्थात् नष्ट करने वाला (महापाप्मा) बड़ा पापी है (एनम्) इस उपरोक्त पाप को ही तू (इह) इस विषयमें (वैरिणम्) वैरी (विद्धि) जान। (37)

    अध्याय 3 का श्लोक 38

    धूमेन, आव्रियते, वह्निः, यथा, आदर्शः, मलेन, च,
    यथा, उल्बेन, आवृतः, गर्भः, तथा, तेन, इदम्, आवृृतम्।।38।।

    अनुवाद: (यथा) जिस प्रकार (धूमेन) धुएँसे (वह्निः) अग्नि (च) और (मलेन) मैलसे (आदर्शः) दर्पण (आव्रियते) ढका जाता है तथा (यथा) जिस प्रकार (उल्बेन) जेरसे (गर्भः) गर्भ (आवृृतः) ढका रहता है (तथा) वैसे ही (तेन) उपरोक्त विकारों द्वारा (इदम्) यह ज्ञान (आवृृतम्) ढका रहता है। (38)

    अध्याय 3 का श्लोक 39

    आवृतम्, ज्ञानम्, एतेन, ज्ञानिनः, नित्यवैरिणा,
    कामरूपेण, कौन्तेय, दुष्पूरेण, अनलेन, च।।39।।

    अनुवाद: (च) और (कौन्तेय) हे कुन्ति पुत्रा अर्जुन! (एतेन) इस (अनलेन) अग्नि के समान कभी (दुष्पूरेण) न पूर्ण होनेवाले (कामरूपेण) कामरूप विषय वासना अर्थात् सैक्स रूपी (ज्ञानिनः) ज्ञानियोंके (नित्यवैरिणा) नित्य वैरीके द्वारा मनुष्यका (ज्ञानम्) ज्ञान (आवृतम्) ढका हुआ है। (39)

    अध्याय 3 का श्लोक 40

    इन्द्रियाणि, मनः, बुद्धिः, अस्य, अधिष्ठानम्, उच्यते,
    एतैः, विमोहयति, एषः, ज्ञानम्, आवृत्य, देहिनम्।।40।।

    अनुवाद: (इन्द्रियाणि) इन्द्रियाँ (मनः) मन और (बुद्धिः) बुद्धि ये सब (अस्य) इस कामदेव अर्थात् सैक्स का (अधिष्ठानम्) वासस्थान (उच्यते) कहे जाते हैं। (एषः) यह काम विषय वासना की इच्छा (एतैः) इन मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा ही (ज्ञानम्) ज्ञानको (आवृत्य) आच्छादित करके (देहिनम्) जीवात्माको (विमोहयति) मोहित करता है। (40)

  • अध्याय 3 का श्लोक 41

    तस्मात्, त्वम्, इन्द्रियाणि, आदौ, नियम्य, भरतर्षभ,
    पाप्मानम्, प्रजहि, हि, एनम्, ज्ञानविज्ञाननाशनम्।।41।।

    अनुवाद: (तस्मात्) इसलिए (भरतर्षभ) भरतर्षभ अर्जुन! (त्वम्) तू (आदौ) पहले (इन्द्रियाणि) इन्द्रियों को (नियम्य) वश में करके (एनम्) इस (ज्ञान-विज्ञान-नाशनम्) ज्ञान और विज्ञान को नष्ट करने वाले (पाप्मानम्) महापापी काम को (ही) अवश्य ही (प्रजही)मार। (41)

    अध्याय 3 का श्लोक 42

    इन्द्रियाणि, पराणि, आहुः, इन्द्रियेभ्यः, परम्, मनः,
    मनसः, तु, परा, बुद्धिः, यः, बुद्धेः, परतः, तु, सः।।42।।

    अनुवाद: (इन्द्रियाणि) इन्द्रियोंको स्थूल शरीर से (पराणि) पर यानी श्रेष्ठ, बलवान् और सूक्ष्म (आहुः) कहते हैं, (इन्द्रियेभ्यः) इन इन्द्रियोंसे (परम्) अधिक (मनः) मन है, (मनसः) मनसे (तु) तो (परा) उत्तम (बुद्धिः) बुद्धि है (तु) और (यः) जो (बुद्धेः) बुद्धिसे भी (परतः) अत्यन्त शक्तिशाली है, (सः) वह परमात्मा सहित आत्मा है। (42)

    अध्याय 3 का श्लोक 43

    एवम्, बुद्धेः, परम्, बुद्ध्वा, संस्तभ्य, आत्मानम्, आत्मना,
    जहि, शत्रुम्, महाबाहो, कामरूपम्, दुरासदम्।।43।।

    अनुवादः (एवम्) इस प्रकार (बुद्धेः) बुद्धिसे (परम्) अत्यन्त श्रेष्ठ (आत्मानम्) परमात्मा को (बुद्ध्वा) जानकर और (आत्मना) अपने आप को स्वअभ्यास द्वारा (संस्तभ्य) संयमी (महाबाहो) हे महाबाहो! अर्जुन तू इस (कामरूपम्) कामरूप अर्थात् भोग विलास रूप (दुरासदम्) दुर्जय (शत्रुम्) शत्रु को (जहि) मार डाल। (43)

    (इति अध्याय तीसरा)