श्रीमद भगवद गीता

संत रामपाल जी महाराज द्वारा अनुवादित

गीता अध्याय 4 | Gita Adhyay 4

श्लोक |Shlokas

1-10
11-20
21-30
31-40
41-42
  • अध्याय 4 का श्लोक 1 (भगवान उवाच)

    इमम्, विवस्वते, योगम्, प्रोक्तवान्, अहम्, अव्ययम्,
    विवस्वान्, मनवे, प्राह, मनुः, इक्ष्वाकवे, अब्रवीत्।।1।।

    अनुवाद: (अहम्) मैंने (इमम्) इस (अव्ययम्) अविनाशी (योगम्) भक्ति मार्ग को (विवस्वते) सूर्यसे (प्रोक्तवान्) कहा था (विवस्वान्) सूर्यने अपने पुत्रा वैवस्वत (मनवे) मनु से (प्राह) कहा और (मनुः) मनुने अपने पुत्रा (इक्ष्वाकवे) राजा इक्ष्वाकुसे (अब्रवीत्) कहा। (1)

    अध्याय 4 का श्लोक 2

    एवम्, परम्पराप्राप्तम्, इमम्, राजर्षयः, विदुः,
    सः, कालेन, इह, महता, योगः, नष्टः, परन्तप।।2।।

    अनुवाद: (परन्तप) हे परन्तप अर्जुन! (एवम्) इस प्रकार (परम्पराप्राप्तम्) परम्परासे प्राप्त (इमम्) इस भक्ति मार्ग को (राजर्षयः) राजर्षियोंने (विदुः) जाना किंतु उसके बाद (सः) वह (योगः) योग अर्थात् भक्ति मार्ग (महता) बहुत (कालेन) समय से (इह) इस पृथ्वीलोकमें (नष्टः) समाप्त हो गया।।2।।

    अध्याय 4 का श्लोक 3

    सः, एव, अयम्, मया, ते, अद्य, योगः, प्रोक्तः, पुरातनः,
    भक्तः, असि, मे, सखा, च, इति, रहस्यम्, हि, एतत्, उत्तमम्।।3।।

    अनुवाद: तू (मे) मेरा (भक्तः) भक्त (च) और (सखा) सखा (असि) है (इति) इसलिये (सः) वही (अयम्) यह (पुरातनः) पुरातन (एव) वास्तविक (योगः) भक्ति मार्ग (अद्य) पुराना (मया) मैंने (ते) तुझको (प्रोक्तः) कहा है (हि) क्योंकि (एतत्) यह (उत्तमम्) बड़ा ही उत्तम (रहस्यम्) रहस्य वाला है अर्थात् गुप्त रखने योग्य विषय है। (3)

    अध्याय 4 का श्लोक 4 (अर्जुन उवाच)

    अपरम्, भवतः, जन्म, परम्, जन्म, विवस्वतः,
    कथम्, एतत्, विजानीयाम्, त्वम्, आदौ, प्रोक्तवान् इति।।4।।

    अनुवाद: (भवतः) आपका (जन्म) जन्म तो (अपरम्) अधिक समय का नहीं है अर्थात् अभी हाल का है और (विवस्वतः) सूर्यका (जन्म) जन्म (परम्) अधिक पहले का है (इति) इस बातको (कथम्) कैसे (विजानीयाम्) समझूँ कि (त्वम्) आपहीने (आदौ) कल्पके आदिमें सूर्यसे (एतत्) यह योग (प्रोक्तवान्) कहा था?। (4)

    अध्याय 4 का श्लोक 5 (भगवान उवाच)

    बहूनि, मे, व्यतीतानि, जन्मानि, तव, च, अर्जुन,
    तानि, अहम्, वेद, सर्वाणि, न, त्वम्, वेत्थ, परन्तप।।5।।

    अनुवाद: (परन्तप) हे परन्तप (अर्जुन) अर्जुन! (मे) मेरे (च) और (तव) तेरे (बहूनि) बहुत-से (जन्मानि) जन्म (व्यतीतानि) हो चुके हैं। (तानि) उन (सर्वाणि) सबको (त्वम्) तू (न) नहीं (वेत्थ) जानता किंतु (अहम्) मैं (वेद) जानता हूँ। (5)

    अध्याय 4 का श्लोक 6

    अजः, अपि, सन्, अव्ययात्मा, भूतानाम्, ईश्वरः, अपि, सन्,
    प्रकृतिम्, स्वाम्, अधिष्ठाय, सम्भवामि, आत्ममायया।।6।।

    अनुवाद: (अजः) मनुष्यों की तरह मैं जन्म न लेने वाला और (अव्ययात्मा) अविनाशीआत्मा (सन्) होते हुए (अपि) भी तथा (भूतानाम्) मेरे इक्कीस ब्रह्मण्डों के प्राणियोंका (ईश्वरः) ईश्वर (सन्) होते हुए (अपि) भी (स्वाम्) अपनी (प्रकृतिम्) प्रकृृति अर्थात् दुर्गा को (अधिष्ठाय) अधीन करके अर्थात् पत्नी रूप में रखकर (आत्ममायया) अपने अंश अर्थात् पुत्रा श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, व शिव जी उत्पन्न करता हूँ, फिर उन्हें श्री कृष्ण, श्री राम, श्री परसुराम आदि अंश अवतार (सम्भवामि) प्रकट करता हूँ। (6)

    अध्याय 4 का श्लोक 7

    यदा, यदा, हि, धर्मस्य, ग्लानिः, भवति, भारत,
    अभ्युत्थानम्, अधर्मस्य, तदा, आत्मानम्, सृजामि, अहम्।।7।।

    अनुवाद: (भारत) हे भारत! (यदा,यदा) जब-जब (धर्मस्य) धर्मकी (ग्लानिः) हानि और (अधर्मस्य) अधर्मकी (अभ्युत्थानम्) वृद्धि (भवति) होती है (तदा) तब-तब (हि) ही (अहम्) मैं (आत्मानम्) अपना अंश अवतार (सृृजामि) रचता हूँ अर्थात् उत्पन्न करता हूँ। (7)

    अध्याय 4 का श्लोक 8

    परित्राणाय, साधूनाम्, विनाशाय, च, दुष्कृृताम्,
    धर्मसंस्थापनार्थाय, सम्भवामि, युगे, युगे।।8।।

    अनुवाद: (साधूनाम्) साधु पुरुषोंका (परित्राणाय) उद्धार करनेके लिये (दुष्कृताम्) बुरेकर्म करनेवालोंका (विनाशाय) विनाश करनेके लिये (च) और (धर्मसंस्थापनार्थाय) भक्ति मार्ग को शास्त्रा अनुकूल दिशा देने के लिए (युगे,युगे) युग-युगमें (सम्भवामि) अपने अंश प्रकट करता हूँ तथा उनमें गुप्त रूप से मैं प्रवेश करके अपनी लीला करता हूँ। (8)

    अध्याय 4 का श्लोक 9

    जन्म, कर्म, च, मे, दिव्यम्, एवम्, यः, वेत्ति, तत्त्वतः,
    त्यक्त्वा, देहम्, पुनः, जन्म, न, एति, माम्, एति, सः, अर्जुन।।9।।

    अनुवाद: (अर्जुन) हे अर्जुन! (मे) मेरे (जन्म) जन्म (च) और (कर्म) कर्म (दिव्यम्) दिव्य अर्थात् अलौकिक हैं (एवम्) इस प्रकार (यः) जो मनुष्य (तत्त्वतः) तत्वसे (वेत्ति) जान लेता है (सः) वह (देहम्) शरीरको (त्यक्त्वा) त्यागकर (पुनः) फिर (जन्म) जन्मको (न,एति) प्राप्त नहीं होता किंतु जो मुझ काल को तत्व से नहीं जानते (माम्) मुझे ही (एति) प्राप्त होता है। (9)

    विशेष:- काल (ब्रह्म) के अलौकिक जन्मों को जानने के लिए देखें अध्याय 8 में प्रलय की जानकारी।

    अध्याय 4 का श्लोक 10

    वीतरागभयक्रोधाः, मन्मयाः, माम्, उपाश्रिताः,
    बहवः, ज्ञानतपसा, पूताः, मद्भावम्, आगताः।।10।।

    अनुवाद: (वितरागभयक्रोधाः) जिनके राग भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गये और (मन्मयाः) जो मुझमें अनन्य प्रेमपूर्वक स्थित रहते हैं ऐसे (माम्) मेरे (उपाश्रिताः) आश्रित रहनेवाले (बहवः) बहुत-से भक्त उपर्युक्त (ज्ञानतपसा) ज्ञानरूप तपसे (पूताः) पवित्रा होकर (मद्भावम्) मतावलम्बी अर्थात् शास्त्रा अनुकूल साधना करने वाले स्वभाव के (आगताः) हो चुके हैं। (10)

  • अध्याय 4 का श्लोक 11

    ये, यथा, माम्, प्रपद्यन्ते, तान्, तथा, एव, भजामि, अहम्,
    मम्, वत्र्म, अनुवर्तन्ते, मनुष्याः, पार्थ, सर्वशः।।11।।

    अनुवाद: (पार्थ) हे अर्जुन! (ये) जो भक्त (माम्) मुझे (यथा) जिस प्रकार (प्रपद्यन्ते) भजते हैं (अहम्) मैं भी (तान्) उनको (तथा) उसी प्रकार (भजामि) भजता हूँ अर्थात् उनका पूरा ध्यान रखता हूँ (एव) वास्तव में (मनुष्याः) सभी मनुष्य (सर्वशः) सब प्रकारसे (मम्) मेरे ही (वत्र्म) व्यवहारका (अनुवर्तन्ते) अनुसरण करते हैं। (11)

    अध्याय 4 का श्लोक 12

    काङ्क्षन्तः, कर्मणाम्, सिद्धिम्, यजन्ते, इह, देवताः,
    क्षिप्रम्, हि, मानुषे, लोके, सिद्धिः, भवति, कर्मजा।।12।।

    अनुवाद: (इह) इस (मानुषे) मनुष्य (लोके) लोकमें (कर्मणाम्) कर्मोंके (सिद्धिम्) फलको (काङ्क्षन्तः) चाहनेवाले लोग (देवताः) देवताओं अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, शिव का (यजन्ते) पूजन किया करते हैं (हि) क्योंकि उनको (कर्मजा) कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाली अर्थात् कर्माधार से (सिद्धिः) सिद्धि (क्षिप्रम्) शीघ्र (भवति) मिल जाती है। (12)

    अध्याय 4 का श्लोक 13

    चातुर्वण्र्यम्, मया, सृष्टम्, गुणकर्मविभागशः,
    तस्य, कर्तारम्, अपि, माम्, विद्धि, अकर्तारम्, अव्ययम्।।13।।

    अनुवाद: (चातुर्वण्र्यम्) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों का समूह (गुणकर्म विभागशः) गुण और कर्मोंके विभागपूर्वक (मया) मेरे द्वारा (सृष्टम्) रचा गया है इस प्रकार (तस्य) उस कर्म का (कर्तारम्) कत्र्ता (अपि) भी (माम्) मुझ काल को ही (विद्धि) जान तथा (अव्ययम्) वह अविनाशी परमेश्वर (अकर्तारम्) अकत्र्ता है। भावार्थः- गीता अध्याय 3 श्लोक 14-15 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि कर्मों को ब्रह्मोद्धवम अर्थात् ब्रह्म से उत्पन्न जान। यही प्रमाण इस अध्याय 4 श्लोक 13 में है। गीता ज्ञान दाता काल ब्रह्म कह रहा है कि चार वर्णों की व्यवस्था मैंने की है। इनके कर्मों का विभाजन भी मैंने किया है। वह अविनाशी पूर्ण परमात्मा इन कर्मों का अकर्ता है, ब्रह्मा रजगुण, विष्णु सतगुण तथा शिव तमगुण के विभाग भी काल ब्रह्म ने बनाए हैं सृृष्टि, स्थिती, संहार। इनका करने वाला अविनाशी परमात्मा नहीं है। (13)

    अध्याय 4 का श्लोक 14

    न, माम्, कर्माणि, लिम्पन्ति, न, मे, कर्मफले, स्पृृहा,
    इति, माम्, यः, अभिजानाति, कर्मभिः, न, सः, बध्यते।।14।।

    अनुवाद: (कर्मफले) कर्मोंके फलमें (मे) मेरी (स्पृहा) स्पृृहा (न) नहीं है इसलिये (माम्) मुझे (कर्माणि) कर्म (न,लिम्पन्ति) लिप्त नहीं करते (इति) इस प्रकार (यः) जो (माम्) मुझ काल-ब्रह्म को (अभिजानाति) तत्वसे जान लेता है (सः) वह भी (कर्मभिः) कर्मोंसे (न) नहीं (बध्यते) बंधता अर्थात् गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में कहे तत्वदर्शी संत की खोज करके गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में कहे उस परमात्मा की शरण में जाकर पूर्ण परमात्मा की भक्ति करके कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाता है। (14)

    अध्याय 4 का श्लोक 15

    एवम्, ज्ञात्वा, कृृतम्, कर्म, पूर्वैः, अपि, मुमुक्षुभिः,
    कुरु, कर्म, एव, तस्मात्, त्वम्, पूर्वैः, पूर्वतरम्, कृृतम्।।15।।

    अनुवाद: (पूर्वैः) पूर्वकालके (मुमुक्षुभिः) मुमुक्षुओंने (अपि) भी (एवम्) इस प्रकार (ज्ञात्वा) जानकर ही शास्त्रा विधि अनुसार साधना रूपी (कर्म) कर्म (कृतम्) विशेष कसक के साथ किये हैं (तस्मात्) इसलिये (त्वम्) तू भी (पूर्वैः) पूर्वजोंद्वारा (पूर्वतरम्,कृतम्) सदासे किये जानेवाले शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति (कर्म) कर्मोंको (एव) ही (कुरु) कर। (15)

    अध्याय 4 का श्लोक 16

    किम्, कर्म, किम्, अकर्म, इति, कवयः, अपि, अत्रा, मोहिताः,
    तत्, ते, कर्म, प्रवक्ष्यामि, यत्, ज्ञात्वा, मोक्ष्यसे, अशुभात्।।16।।

    अनुवाद: (कर्म) कर्म (किम्) क्या है और (अकर्म) अकर्म (किम्) क्या है? (इति) इसप्रकार (अत्रा) यहाँ निर्णय करनेमें (कवयः) बुद्धिमान् साधक (अपि) भी (मोहिताः) मोहित हो जाते हैं इसलिये (तत्) वह (कर्म) कर्म-तत्व मैं (ते) तुझे (प्रवक्ष्यामि) भलीभाँति समझाकर कहूँगा (यत्) जिसे (ज्ञात्वा) जानकर तू (अशुभात्) शास्त्रा विरुद्ध किए जाने वाले दुष्कर्मों से (मोक्ष्यसे) मुक्त हो जायगा। (16)

    अध्याय 4 का श्लोक 17

    कर्मणः, हि, अपि, बोद्धव्यम्, बोद्धव्यम्, च, विकर्मणः,
    अकर्मणः, च, बोद्धव्यम्, गहना, कर्मणः, गतिः।।17।।

    अनुवाद: (कर्मणः) शास्त्रा विधि अनुसार कर्मका स्वरूप (अपि) भी (बोद्धव्यम्) जानना चाहिये (च) और (अकर्मणः) शास्त्रा विधि रहित अर्थात् अकर्मका स्वरूप भी (बोद्धव्यम्) जानना चाहिए (च) तथा (विकर्मणः) मास-मदिरा तम्बाखु सेवन तथा चोरी - दुराचार आदि विकर्मका स्वरूप भी (बोद्धव्यम्) जानना चाहिए (हि) क्योंकि (कर्मणः) कर्मकी (गतिः) गति (गहना) गहन है। (17) भावार्थ:- तत्वज्ञान को जान कर शास्त्रा अनुकूल भक्ति कर्म से होने वाले लाभ से तथा शास्त्रा विधि रहित भक्ति कर्म से तथा मांस, मदिरा, तम्बाखु सेवन व चोरी, दुराचार करना झूठ बोलना आदि बुरे कर्म से होने वाली हानि का ज्ञान होना अनिवार्य है। उसके लिए इस अध्याय के मंत्रा 34 में विवरण है।

    अध्याय 4 का श्लोक 18

    कर्मणि, अकर्म, यः, पश्येत्, अकर्मणि, च, कर्म, यः,
    सः, बुद्धिमान्, मनुष्येषु, सः, युक्तः, कृृत्स्न्नकर्मकृृत्।।18।।

    अनुवाद: (यः) जो मनुष्य (कर्मणि) कर्म अर्थात् शास्त्रा अनुकूल साधना रूपी करने योग्य कर्म तथा (अकर्म) अकर्म अर्थात् शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण न करने योग्य कर्म को (पश्येत्) देखता है अर्थात् जान लेता है (च) और (यः) जो (अकर्मणि) अकर्म अर्थात् वह शास्त्रा विरुद्ध साधना न करने योग्य कर्म को नहीं करता (कर्म) कर्म अर्थात् करने योग्य कर्म को करता है (सः) वह (मनुष्येषु) मनुष्योंमें (बुद्धिमान्) बुद्धिमान है और (सः) वह (युक्तः) योगी (कृत्स्न्नकर्मकृत्) समस्त शास्त्रा विधि अनुसार ही कर्मोंको करनेवाला है। (18)

    अध्याय 4 का श्लोक 19

    यस्य, सर्वे, समारम्भाः, कामसंकल्पवर्जिताः,
    ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्, तम्, आहुः, पण्डितम्, बुधाः।।19।।

    अनुवाद: (यस्य) जिसके (सर्वे) सम्पूर्ण (समारम्भाः) शास्त्रा अनुकूल कर्म (कामसंकल्प वर्जिताः) बिना कामना और संकल्पके होते हैं तथा (ज्ञानाग्निदग्ध कर्माणम्) बुरे कर्म अर्थात् शास्त्रा विधि रहित कार्य तत्व ज्ञानरूप अग्निके द्वारा भस्म हो गये हैं अर्थात् पूर्ण ज्ञान होने पर साधक पूर्ण संत तलाश करके वास्तविक मंत्रा प्राप्त कर लेता है, जिससे सर्व पाप विनाश हो जाते हैं (तम्) उसको (बुधाः) शास्त्रा विधि अनुसार साधना करने वाले बुद्धिमान लोग (पण्डितम्) पण्डित (आहुः) कहते हैं। (19)

    अध्याय 4 का श्लोक 20

    त्यक्त्वा, कर्मफलासंगम्, नित्यतृप्तः, निराश्रयः,
    कर्मणि, अभिप्रवृत्तः, अपि, न, एव, किंचित्, करोति, सः।।20।।

    अनुवाद: (कर्मफलासंगम्) तत्वज्ञान के आधार से शास्त्रा विधि रहित कर्मोंमें और उनके फलमें आसक्ति का सर्वथा (त्यक्त्वा) त्याग करके (निराश्रयः) शास्त्रा विधि रहित भक्ति के कर्म से रहित हो गया है और (नित्यतृृप्तः) शास्त्रा अनुकूल साधना के कर्मों से नित्य तृप्त है (सः) वह (कर्मणि) संसारिक व शास्त्रा अनुकूल भक्ति कर्मोंमें (अभिप्रवृत्त) भलीभाँति बरतता हुआ (अपि) भी (एव) वास्तवमें (किंचित्) कुछ भी शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमानी पूजा तथा दोषयुक्त कर्म (न) नहीं (करोति) करता। (20)

  • अध्याय 4 का श्लोक 21

    निराशीः, यतचित्तात्मा, त्यक्तसर्वपरिग्रहः,
    शारीरम्, केवलम्, कर्म, कुर्वन्, न, आप्नोति, किल्बिषम्।।21।।

    अनुवाद: (यतचित्तात्मा) शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति प्राप्त आत्मा (त्यक्तसर्वपरिग्रहः) जिसने समस्त शास्त्रा विरुद्ध संग्रह की हुई साधनाओं का परित्याग कर दिया है ऐसा (निराशीः) अविधिवत् साधना को फैंका हुआ अर्थात् शास्त्रा विधि रहित साधना त्यागा हुआ भक्त (केवलम्) केवल (शरीरम्) हठ योग न करके शरीर से जो आसानी से होने वाली सहज साधना तथा शरीर सम्बन्धी (कर्म) संसारिक कर्म तथा शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति कर्म (कुर्वन्) करता हुआ (किल्बिषम्) क्योंकि शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् पूजा करने वालों को गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 में राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म अर्थात् शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण करने वाले, मूर्ख मेरी भक्ति भी नहीं करते, वे केलव तीनों गुणों अर्थात् रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी की भक्ति करके उनसे मिलने वाली क्षणिक राहत पर आश्रित रहते हैं। इन्हीं तीनों गुणों अर्थात् श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी की साधना शास्त्रा विधि रहित कही है इस शास्त्रा विधि रहित साधना को त्याग कर शास्त्राविधि अनुसार भक्ति करता है। वह पापको (न) नहीं (आप्नोति) प्राप्त होता। यही प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 47-48 में भी है। (21)

    अध्याय 4 का श्लोक 22

    यदृच्छालाभसन्तुष्टः, द्वन्द्वातीतः, विमत्सरः,
    समः, सिद्धौ, असिद्धौ, च, कृत्वा, अपि, न, निबध्यते।।22।।

    अनुवाद: (यदृच्छालाभसन्तुष्टः) जो बिना इच्छाके अपने आप प्राप्त हुए पदार्थमें सदा संतुष्ट रहता है (विमत्सरः) जिसमें ईष्र्याका सर्वथा अभाव हो गया है (द्वन्द्वातीतः) जो हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वोंसे सर्वथा अतीत हो गया है ऐसा (सिद्धौ) कार्य की सिद्धि (च) और (असिद्धौ) असिद्धिमें (समः) समान रहने वाला अर्थात् अविचलित (कृृत्वा) कार्य करते-करते शास्त्रा अनुकूल भक्ति करता हुआ (अपि) भी उनसे (न) नहीं (निबध्यते) बँधता। क्योंकि पूर्ण संत से पूर्ण मंत्रा जाप प्राप्त करने के उपरान्त निष्काम शास्त्रा अनुकूल साधना के शुभ कर्म भक्ति में सहयोगी होते हैं तथा पाप विनाश हो जाते हैं। जिससे कर्म बन्धन मुक्त हो जाता है। (22)

    अध्याय 4 का श्लोक 23

    गतसंगस्य, मुक्तस्य, ज्ञानावस्थितचेतसः,
    यज्ञाय, आचरतः, कर्म, समग्रम्, प्रविलीयते।।23।।

    अनुवाद: (गतसंगस्य) शास्त्रा विरुद्ध साधना से आस्था हटने के कारण (मुक्तस्य) उस मुक्त हुए साधक का (ज्ञानावस्थितचेतसः) चित्त निरन्तर परमात्मा के तत्वज्ञानमें स्थित रहता है ऐसे केवल (यज्ञाय) शास्त्रा अनुकूल भक्ति के लिये कर्म (आचरतः) आचरण करनेवाले मनुष्यके (समग्रम्) सम्पूर्ण (कर्म) कर्म (प्रविलीयते) प्रभु साधना के प्रति विलीन हो जाते हैं। (23)

    अध्याय 4 का श्लोक 24

    ब्रह्म, अर्पणम्, ब्रह्म, हविः, ब्रह्माग्नौ, ब्रह्मणा, हुतम्,
    ब्रह्म, एव, तेन, गन्तव्यम्, ब्रह्मकर्मसमाधिना।।24।।

    अनुवाद: (अर्पणम्) ऐसे शास्त्रा अनुकूल साधक का समर्पण भी (ब्रह्म) ब्रह्म अर्थात् परमात्मा को है और (हविः) हवन किये जाने योग्य द्रव्य भी (ब्रह्म) प्रभु ही है तथा (ब्रह्मणा) पूर्ण परमात्मा के निमित्त (ब्रह्माग्नौ) ब्रह्मरूप अग्निमें अर्थात् प्रभु स्तुति से (हुतम्) पापांे की आहूति हो जाती है अर्थात् पाप विनाश हो जाते हैं (एव) वास्तव में (ब्रह्मकर्मसमाधिना) सांसारिक कार्य करते हुए भी जिसका ध्यान परमात्मा में ही लीन रहता है और जो आसानी से शरीर से होने वाले कर्म करता है अर्थात् सहज समाधी में रह कर साधना करता है (तेन) उसके लिए (ब्रह्म) परमात्मा (गन्तव्यम्) प्राप्त किये जाने योग्य है अर्थात् वही परमात्मा प्राप्त कर सकता है जो सहज समाधि में रहता है। (24)

    आदरणीय गरीबदास जी महाराज भी कहते हैं:-

    जैसे हाली बीज धुन, पंथी से बतलावै। वा में खण्ड पड़े नहीं ऐसे ध्यान(समाधी) लगावै।।

    भावार्थ:- जैसे किसान खेत में गेहूं या अन्य फसल बीज रहा हो और कोई यात्राी आ जाए तो रस्ता पूछने पर वह किसान हल चलाते-चलाते बीज बीजते हुए यात्राी को रस्ता भी बताता है, परन्तु उसकी समाधि (ध्यान) अपने मूल कार्य में ही रहता है। इसे सहज समाधि (कर्मसमाधी) कहा जाता है। इसी का प्रमाण पवित्रा गीता जी कह रही है कि जो कर्मयोगी अपना कार्य करता हुआ भी प्रभु में ध्यान रखता है, वही प्रभु को प्राप्त करने योग्य भक्त है।

    गरीब, नाम उठत नाम बैठत नाम सोवत जाग वे। नाम खाते नाम पीते नाम सेती लाग वे।।

    अध्याय 4 का श्लोक 25

    दैवम्, एव, अपरे, यज्ञम्, योगिनः, पर्युपासते,
    ब्रह्माग्नौ, अपरे, यज्ञम्, यज्ञेन, एव, उपजुह्नति।।25।।

    अनुवाद: (अपरे) इसके विपरित दूसरे (योगिनः) योगीजन (दैवम्) देवताओंके पूजनरूप (यज्ञम्) यज्ञका (एव) ही (पर्युपासते) भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और (अपरे) अन्य योगीजन (ब्रह्माग्नौ) परमात्मा प्राप्ति की विरह रूपी अग्नि (यज्ञेन) अपने ही विचार से धार्मिक कर्मों के द्वारा (एव) ही (यज्ञम्) धार्मिक कर्मों का (उपजुह्नति) अनुष्ठान किया करते हैं। (25)

    अध्याय 4 का श्लोक 26

    श्रोत्रादीनि, इन्द्रियाणि, अन्ये, संयमाग्निषु, जुह्नति,
    शब्दादीन्, विषयान्, अन्ये, इन्द्रियाग्निषु, जुह्नति।।26।।

    अनुवाद: (अन्ये) अन्य योगीजन (श्रोत्रादीनि) कान नाक आदि बन्द करके अर्थात् हठ योग से (इन्द्रियाणि) समस्त इन्द्रियोंको (संयमाग्निषु) संयमरूप अग्नियोंमें (जुह्नति) हवन की तरह पाप जलाने का प्रयत्न किया करते हैं और (अन्ये) दूसरे साधक (शब्दादीन्) शब्द-स्र्पस आदि (विषयान्) समस्त विषयोंको (इन्द्रियाग्निषु) इन्द्रियरूप अग्नियोंमें (जुह्नति) हवन की तरह पाप जलाने का प्रयत्न किया करते हैं अर्थात् हठ करके साधना करने को मोक्ष मार्ग मानते हैं। (26)

    अध्याय 4 का श्लोक 27

    सर्वाणि, इन्द्रियकर्माणि, प्राणकर्माणि, च, अपरे,
    आत्मसंयमयोगाग्नौ, जुह्नति, ज्ञानदीपिते।।27।।

    अनुवाद: (अपरे) दूसरे योगीजन (सर्वाणि,इन्द्रियकर्माणि) इन्द्रियोंकी सम्पूर्ण क्रियाओंको (च) और (प्राणकर्माणि) प्राणोंकी अर्थात् स्वांसों की समस्त क्रियाओंको (ज्ञानदीपिते) ज्ञानसे प्रकाशित (आत्मसंयमयोगाग्नौ) अपने आप को संयमयोगरूप अग्निमें (जुह्नति) हवन किया करते हैं अर्थात् ज्ञान से संयम करके साधना करते हैं, इसी को मोक्ष मार्ग मानते हैं। (27)

    अध्याय 4 का श्लोक 28

    द्रव्ययज्ञाः, तपोयज्ञाः, योगयज्ञाः, तथा, अपरे,
    स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः, च, यतयः, संशितव्रताः।।28।।

    अनुवाद: (अपरे) कई साधक (द्रव्ययज्ञाः) द्रव्य-सम्बन्धी धार्मिक कर्म केवल दान करनेवाले हैं कितने ही (तपोयज्ञाः) तपस्यारूप धार्मिक कर्म करनेवाले हैं (तथा) तथा दूसरे कितने ही (योगयज्ञाः) योगासन रूप धार्मिक कर्म करनेवाले हैं (च) और कितने ही (संशितव्रताः) घोर व्रतोंसे युक्त (यतयः) यत्नशील हैं और (स्वध्यायज्ञानयज्ञाः) कुछ स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ अर्थात् केवल सद्ग्रन्थों का नित्य पाठ करनेवाले हैं अर्थात् इसी को मोक्ष मार्ग मानते हैं। (28)

    अध्याय 4 का श्लोक 29-30

    अपाने, जुह्नति, प्राणम्, प्राणे, अपानम्, तथा, अपरे,
    प्राणापानगती, रुद्ध्वा, प्राणायामपरायणाः।।29।।

    अपरे, नियताहाराः, प्राणान्, प्राणेषु, जुह्नति,
    सर्वे, अपि, एते, यज्ञविदः, यज्ञक्षपितकल्मषाः।।30।।

    अनुवाद: (अपरे) दूसरे (अपाने) अपानवायुमें (प्राणम्) प्राणवायुको (जुह्नति) हवन की तरह पाप जलाने का प्रयत्न करते हैं। (तथा) वैसे ही (प्राणे) प्राणवायुमें (अपानम्) अपानवायुको करते हैं तथा (अपरे) अन्य कितने ही (नियताहाराः) नियमित आहार करनेवाले (प्राणायामपरायणाः) प्राणायामपरायण (प्राणापानगती) प्राण और अपानकी गतिको (रुद्ध्वा) रोककर (प्राणान्) प्राणोंको अर्थात् स्वांसों को सूक्ष्म करके (प्राणेषु) प्राणोंमें ही (जुह्नति) हवन की तरह जलाने का प्रयत्न किया करते हैं अर्थात् प्राणायाम करके ही प्रभु प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हैं। (एते) ये (सर्वे,अपि) सभी साधक (यज्ञक्षपितकल्मषाः) उपरोक्त धार्मिक कर्मों अर्थात् साधनाओं द्वारा पापोंका नाश कर देनेवाले (यज्ञविदः)भक्ति साधन समझते हैं अर्थात् इसी साधना को मोक्ष मार्ग मानते हैं। (29-30)

  • अध्याय 4 का श्लोक 31

    यज्ञशिष्टामृृतभुजः, यान्ति, ब्रह्म, सनातनम्,
    न, अयम्, लोकः, अस्ति, अयज्ञस्य, कुतः, अन्यः, कुरुसत्तम।।31।।

    अनुवाद: (कुरुसत्तम) हे कुरुक्षेष्ठ अर्जुन! (यज्ञशिष्टामृतभुजः) उपरोक्त शास्त्राविधि रहित साधनाओं से बचे हुए बुद्धिमान साधक शास्त्रा अनुकूल साधना से बचे हुए लाभ को उपभोग करके (सनातनम् ब्रह्म) आदि पुरुष परमेश्वर अर्थात्-पूर्णब्रह्मको (यान्ति) प्राप्त होते हैं और (अयज्ञस्य) शास्त्रा विधि अनुसार पूर्ण प्रभु की भक्ति न करनेवाले पुरुषके लिये तो (अयम्) यह (लोकः) मनुष्य-लोक भी सुखदायक (न) नहीं (अस्ति) है फिर (अन्यः) परलोक (कुतः) कैसे सुखदायक हो सकता है?(31)

    भावार्थ:- यज्ञ से बचे हुए अमृृत का भोग करने का अभिप्रायः है कि ‘‘पूर्ण परमात्मा की साधना करने वाले साधक अपने शरीर के कमलों को खोलने वाले मन्त्रा का जाप करते हैं। वे मन्त्रा श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्ण जी तथा श्री शिव जी व श्री दुर्गा जी के जाप भी हैं जो संसारिक सुख प्राप्त कराते हैं। इन के मन्त्रा जाप से उपरोक्त देवी व देवताओं के ऋण से मुक्ति मिलती है जो मन्त्रा जाप की ऋण उतरने के पश्चात् शेष कमाई है उस शेष जाप की कमाई से पूर्ण परमात्मा के साधक को अत्यधिक संसारिक लाभ प्राप्त होता है। इस श्लोक 31 में यही कहा है कि पूर्ण परमात्मा का साधक यज्ञ अर्थात् साधना (अनुष्ठान) से बची शेष भक्ति कमाई का उपयोग करके पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। भावार्थ है कि पूर्ण परमात्मा के विधिवत् साधक को संसारिक सुख भी अधिक प्राप्त होता है तथा पूर्ण मोक्ष भी प्राप्त होता है।

    विशेष - यही प्रमाण पवित्रा गीता अध्याय 3 श्लोक 13 में वर्णन है तथा अध्याय 16 श्लोक 23-24 में भी है कि हे भारत जो साधक शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमुखी पूजा करते हैं उनको न तो कोई सुख प्राप्त होता है, न सिद्धि तथा न ही कोई गति प्राप्त होती है अर्थात् व्यर्थ है। इसलिए शास्त्रों में अर्थात् वेदों में जो भक्ति साधना के कर्म करने का आदेश है तथा जो न करने का आदेश है वही मानना श्रेयकर है।

    अध्याय 4 का श्लोक 32

    एवम्, बहुविधाः, यज्ञाः, वितताः, ब्रह्मणः, मुखे,
    कर्मजान्, विद्धि, तान्, सर्वान्, एवम्, ज्ञात्वा, विमोक्ष्यसे।।32।।

    अनुवाद: (एवम्) इस प्रकार और भी (बहुविधाः) बहुत तरहके शास्त्राअनुसार (यज्ञाः) धार्मिक क्रियाऐं हैं (तान्) उन (सर्वान्) सबको तू (कर्मजान्) कर्मों के द्वारा होने वाली यज्ञों को (विद्धि) जान (एवम्) इस प्रकार (ब्रह्मणः) पूर्ण परमात्माके (मुखे) मुख कमल से (वितताः) पाँचवे वेद अर्थात् स्वसम वेद में विस्तारसे कहे गये हैं। (ज्ञात्वा) जानकर (विमोक्ष्यसे) पूर्ण मुक्त हो जायगा। (32)

    अध्याय 4 का श्लोक 33

    श्रेयान्, द्रव्यमयात्, यज्ञात्, ज्ञानयज्ञः, परन्तप,
    सर्वम्, कर्म, अखिलम्, पार्थ, ज्ञाने, परिसमाप्यते।।33।।

    अनुवाद: (परन्तप, पार्थ) हे परंतप अर्जुन! (द्रव्यमयात्) द्रव्यमय अर्थात् धन के द्वारा किये जाने वाले दान, भण्डारे आदि (यज्ञात्) यज्ञ अर्थात् धार्मिक कर्मों की अपेक्षा (ज्ञानयज्ञः) ज्ञानयज्ञ (श्रेयान्) अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा (सर्वम्) सम्पूर्ण (कर्म)शास्त्रा अनुकूल कर्म (अखिलम् ज्ञाने) सम्पूर्ण ज्ञान अर्थात् तत्वज्ञानमें (परिसमाप्यते)समाप्त हो जाते हैं। (33)

    अध्याय 4 का श्लोक 34

    तत्, विद्धि, प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन, सेवया,
    उपदेक्ष्यन्ति, ते, ज्ञानम्, ज्ञानिनः, तत्त्वदर्शिनः।।34।।

    अनुवाद: पवित्रा गीता बोलने वाला प्रभु कह रहा है कि उपरोक्त नाना प्रकार की साधना तो मनमाना आचरण है। मेरे तक की साधना की अटकल लगाया ज्ञान है, परन्तु पूर्ण परमात्मा के पूर्ण मोक्ष मार्ग का मुझे भी ज्ञान नहीं है। उसके लिए इस मंत्रा 34 में कहा है कि उस (तत्) तत्वज्ञान को (विद्धि) समझ उन पूर्ण परमात्मा के वास्तविक ज्ञान व समाधान को जानने वाले संतों को (प्रणिपातेन) भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करनेसे उनकी (सेवया) सेवा करनेसे और कपट छोड़कर (परिप्रश्नेन) सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे (ते) वे (तत्वदर्शिनः) पूर्ण ब्रह्म को तत्व से जानने वाले अर्थात् तत्वदर्शी (ज्ञानिनः) ज्ञानी महात्मा तुझे उस (ज्ञानम्) तत्वज्ञानका (उपदेक्ष्यन्ति) उपदेश करेंगे। (34) इसी का प्रमाण गीता अध्याय 2 श्लोक 15-16 में भी है।

    अध्याय 4 का श्लोक 35

    यत्, ज्ञात्वा, न, पुनः, मोहम्, एवम्, यास्यसि, पाण्डव,
    येन, भूतानि, अशेषेण, द्रक्ष्यसि, आत्मनि, अथो, मयि।।35।।

    अनुवाद: (यत्) जिस तत्व ज्ञान को (ज्ञात्वा) जानकर (पुनः) फिर तू (एवम्) इस प्रकार (मोहम्) मोहको (न) नहीं (यास्यसि) प्राप्त होगा तथा (पाण्डव) हे अर्जुन! (येन) जिस ज्ञानके द्वारा तू (भूतानि) प्राणियोंको (अशेषेण) पूर्ण रूपसे (आत्मनि) पूर्ण परमात्मा जो आत्मा के साथ अभेद रूप में रहता है उस पूर्ण परमात्मा में (अथो) और पीछे (मयि) मुझे (द्रक्ष्यसि) देखेगा कि मैं काल हूँ यह जान जाएगा। (35)

    अध्याय 4 का श्लोक 36

    अपि, चेत्, असि, पापेभ्यः, सर्वेभ्यः, पापकृत्तमः,
    सर्वम्, ज्ञानप्लवेन, एव, वृजिनम्, सन्तरिष्यसि।।36।।

    अनुवाद: (चेत्) यदि तू अन्य (सर्वेभ्यः) सब (पापेभ्यः) पापियोंसे (अपि) भी (पापकृृत्तमः) अधिक पाप करनेवाला (असि) है तो भी तू (ज्ञानप्लवेन) तत्वज्ञान के आधार पर वास्तविक नाम रूपी नौकाद्वारा (सर्वम्) सर्वस जानकर (वृजिनम्) अज्ञान से पार जाकर (एव) निःसन्देह (सन्तरिष्यसि) पूर्ण तरह तर जायेगा अर्थात् पाप रहित होकर पूर्ण मुक्त हो जायेगा। (36)

    अध्याय 4 का श्लोक 37

    यथा, एधांसि, समिद्धः, अग्निः, भस्मसात्, कुरुते, अर्जुन,
    ज्ञानाग्निः, सर्वकर्माणि, भस्मसात्, कुरुते, तथा।।37।।

    अनुवाद: (अर्जुन) हे अर्जुन! (यथा) जैसे (समिद्धः) प्रज्वलित (अग्निः) अग्नि (एधांसि) ईंधनोंको (भस्मसात्) भस्ममय (कुरुते) कर देता है (तथा) वैसे ही (ज्ञानाग्निः) तत्वज्ञानरूप अग्नि (सर्वकर्माणि) सम्पूर्ण अविधिवत् कर्मोंको (भस्मसात्) भस्ममय (कुरुते) कर देता है। (37)

    अध्याय 4 का श्लोक 38

    न, हि, ज्ञानेन, सदृृशम्, पवित्राम्, इह, विद्यते,
    तत् स्वयम्, योगसंसिद्धः, कालेन, आत्मनि, विन्दति।।38।।

    अनुवाद: (इह) इस संसारमें (ज्ञानेन) तत्व ज्ञानके (सदृृशम्) समान (पवित्राम्) पवित्र करनेवाला (हि) निःसन्देह कुछ भी (न) नहीं (विद्यते) जान पड़ता (योगसंसिद्धः) उस तत्वदर्शी संत के द्वारा दिए सत भक्ति मार्ग के द्वारा जिसकी भक्ति कमाई पूर्ण हो चुकी है (कालेन) समय अनुसार (तत् आत्मनि) आत्मा के साथ अभेद रूप में रहने वाले उस पूर्ण परमात्मा को गीता अध्याय 8 श्लोक 8 से 10 में वर्णित उल्लेख के आधार से(स्वयम्) अपने आप ही (विन्दति) प्राप्त कर लेता है। (38)

    अध्याय 4 का श्लोक 39

    श्रद्धावान्, लभते, ज्ञानम्, तत्परः, संयतेन्द्रियः,
    ज्ञानम्, लब्ध्वा, पराम्, शान्तिम्, अचिरेण, अधिगच्छति।।39।।

    अनुवाद: (संयतेन्द्रियः) जितेन्द्रिय (तत्परः) उस तत्वदर्शी संत द्वार प्राप्त साधन के साधनपरायण (श्रद्धावान्) श्रद्धावान् मनुष्य भक्ति की उपलब्धि होने पर पूर्ण परमेश्वर के (ज्ञानम्) तत्वज्ञानको (लभते) प्राप्त होता है तथा (ज्ञानम्) तत्वज्ञानको (लब्ध्वा) प्राप्त होकर वह (अचिरेण) बिना विलम्बके तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप (पराम्) परम (शान्तिम्) शान्तिको (अधिगच्छति) प्राप्त हो जाता है। (39)

    अध्याय 4 का श्लोक 40

    अज्ञः, च, अश्रद्दधानः, च, संशयात्मा, विनश्यति,
    न, अयम् लोकः, अस्ति, न, परः, न, सुखम्, संशयात्मनः।।40।।

    अनुवाद: जो साधक उस तत्वदर्शी संत के ज्ञान व साधना पर अविश्वास करता है वह (अज्ञः) विवेकहीन (च) और (अश्रद्दधानः) श्रद्धारहित (च) तथा (संशयात्मा) संश्ययुक्त मनुष्य (विनश्यति) भक्ति मार्ग से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है ऐसे (संशयात्मनः) संश्ययुक्त मनुष्यके लिये (न) न (अयम्) यह (लोकः) लोक में (न) न (परः) परलोक में (सुखम्) सुख (न अस्ति) नहीं है। (40)

    इसी का प्रमाण गीता अध्याय 6 श्लोक 40 में भी है।

  • अध्याय 4 का श्लोक 41

    योगसन्नयस्तकर्माणम्, ज्ञानसछिन्नसंशयम्,
    आत्मवन्तम्, न, कर्माणि, निबध्नन्ति, धनंजय।। 41।।

    अनुवाद: (धनंजय) हे धनंजय! (योगसन्नयस्तकर्माणम्) जिसने तत्वज्ञान के आधार से शास्त्रा विधि रहित भक्ति के सर्व कर्मों को त्याग कर दिया और (ज्ञानसछिन्नसंशयम्) जिसने तत्वज्ञान द्वारा समस्त संश्योंका नाश कर दिया है ऐसे (आत्मवन्तम्) पूर्ण परमात्मा के शास्त्रा अनुकूल ज्ञान पर अडिग साधक को (कर्माणि) शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण करने से पाप कर्म होते हैं वे शास्त्रा विधि अनुसार साधना करने वाले को नहीं होते इसलिए पाप कर्म (न) नहीं (निबध्नन्ति) बाँधते अर्थात् वे पूर्ण मोक्ष प्राप्त करते हैं। (41)

    अध्याय 4 का श्लोक 42

    तस्मात्, अज्ञानसम्भूतम्, हृत्स्थम्, ज्ञानासिना, आत्मनः,
    छित्त्वा, एनम्, संशयम्, योगम्, आतिष्ठ, उत्तिष्ठ, भारत।।42।।

    अनुवाद: (तस्मात्) इसलिये (भारत) हे भरतवंशी अर्जुन! तू (हृत्स्थम्) हृदयमें स्थित (अज्ञानसम्भूतम्) अज्ञानजनित (एनम् संशयम्) शास्त्रा विधि रहित संश्य रूपी (एनम्) पाप को (ज्ञानासिना) तत्वज्ञानरूप तलवारद्वारा (छित्त्वा) छेदन करके अर्थात् दूध पानी छान कर (उत्तिष्ठ) उठ अर्थात् सावधान होकर (आत्मनः) अन्तरात्मा से पूर्ण परमात्मा के (योगम्) शास्त्रा अनुकूल भक्ति में (आतिष्ठ) अडिग हो जा। (42)

    (इति अध्याय चैथा)