श्रीमद भगवद गीता

संत रामपाल जी महाराज द्वारा अनुवादित

गीता अध्याय 13 | Gita Adhyay 13

श्लोक |Shlokas

1-10
11-20
21-30
31-34
  • अध्याय 13 का श्लोक 1 (‘‘भगवान उवाच’’)

    इदम्, शरीरम्, कौन्तेय, क्षेत्राम्, इति, अभिधीयते,
    एतत्, यः, वेत्ति, तम्, प्राहुः, क्षेत्राज्ञः, इति, तद्विदः।।1।।

    अनुवाद: (कौन्तेय) हे अर्जुन! (इदम्) यह (शरीरम्) शरीर (क्षेत्राम्) क्षेत्रा (इति) इस नामसे (अभिधीयते) कहा जाता है और (एतत्) इसको (यः) जो (वेत्ति) जानता है (तम्) उसे (क्षेत्राज्ञः) क्षेत्राज्ञ (इति) इस नामसे (तद्विदः) तत्वको जाननेवाले ज्ञानीजन (प्राहुः) कहते हैं। (1)

    अध्याय 13 का श्लोक 2

    क्षेत्राज्ञम्, च, अपि, माम्, विद्धि, सर्वक्षेत्रोषु, भारत,
    क्षेत्राक्षेत्राज्ञयोः, ज्ञानम्, यत्, तत्, ज्ञानम्, मतम्, मम।।2।।

    अनुवाद: (भारत) हे अर्जुन! तू (सर्वक्षेत्रोषु) सब क्षेत्रों में अर्थात् शरीरों में (क्षेत्राज्ञम्) जानने वाला (अपि) भी (माम्) मुझे ही (विद्धि) जान (च) ओर (क्षेत्राक्षेत्राज्ञयोः) क्षेत्रा-क्षेत्राज्ञका (यत्) जो (ज्ञानम्) तत्वसे जानना है (तत्) वह (ज्ञानम्) ज्ञान है (मम) मेरा (मतम्) मत अर्थात् विचार है। (2)

    अध्याय 13 का श्लोक 3

    तत्, क्षेत्राम्, यत्, च, यादृक्, च, यद्विकारि, यतः, च, यत्,
    सः, च, यः, यत्प्रभावः, च, तत्, समासेन, मे, श्रृणु।।3।।

    अनुवाद: (तत्) वह (क्षेत्राम्) क्षेत्रा (यत्) जो (च) और (यादृक्) जैसा है (च) तथा (यद्विकारि) जिन विकारोंवाला है (च) ओर (यतः) जिस कारणसे (यत्) जो हुआ है (च) तथा (सः) वह (यः) जो (च) और (यत्प्रभावः) जिस प्रभाववाला है (तत्) वह सब (समासेन) संक्षेपमें (मे) मुझसे (श्रृृणु) सुन। (3)

    अध्याय 13 का श्लोक 4

    ऋषिभिः, बहुधा, गीतम्, छन्दोभिः, विविधैः, पृथक्,
    ब्रह्मसूत्रापदैः, च, एव, हेतुमद्भिः, विनिश्चितैः।।4।।

    अनुवाद: (ऋषिभिः) ऋषियोंद्वारा (बहुधा) बहुत प्रकारसे (गीतम्) कहा गया है और (विविधैः) विविध (छन्दोभिः) वेदमन्त्रोंद्वारा भी (पृथक्) विभागपूर्वक (गीतम्) कहा गया है (च) तथा (विनिश्चितैः) भलीभाँति निश्चय किये हुए (हेतुमद्भिः) युक्तियुक्त (ब्रह्मसूत्रापदैः) ब्रह्मसूत्राके पदों द्वारा (एव) भी कहा गया है। (4)

    अध्याय 13 का श्लोक 5

    महाभूतानि, अहंकारः, बुद्धिः, अव्यक्तम्, एव, च,
    इन्द्रियाणि, दश, एकम्, च, पॅंच, च, इन्द्रियगोचराः।। 5।।

    अनुवाद: (महाभूतानि) पाँच महाभूत (अंहकारः) अंहकार (बुद्धिः) बुद्धि (च) और (अव्यक्तम्) अप्रत्यक्ष (एव) भी (च) तथा (दश) दस (इन्द्रियाणि) इन्द्रियाँ, (एकम्) एक मन (च) और (पॅंच) पाँच (इन्द्रियगोचराः) इन्द्रियोंके विषय अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध। (5)

    अध्याय 13 का श्लोक 6

    इच्छा, द्वेषः, सुखम्, दुःखम्, सङ्घातः, चेतना, धृतिः,
    एतत्, क्षेत्राम्, समासेन, सविकारम्, उदाहृतम्।।6।।

    अनुवाद: (इच्छा) इच्छा (द्वेषः) द्वेष (सुखम्) सुख (दुःखम्) दुःख (सङ्घातः) स्थूल देहका पिण्ड (चेतना) चेतना और (धृतिः) धृृति इस प्रकार (सविकारम्) विकारों के सहित (एतत्) यह (क्षेत्राम्) क्षेत्रा (समासेन) संक्षेपमें (उदाहृतम्) कहा गया है। (6)

    अध्याय 13 का श्लोक 7

    अमानित्वम्, अदम्भित्वम्, अहिंसा, क्षान्तिः, आर्जवम्,
    आचार्योपासनम्, शौचम्, स्थैर्यम्, आत्मविनिग्रहः।।7।।

    अनुवाद: (अमानित्वम्) अभिमानका अभाव (अदम्भित्वम्) दम्भाचरणका अभाव (अहिंसा) किसी भी प्राणीको किसी प्रकार भी न सताना (क्षान्तिः) क्षमाभाव (आर्जवम्) सरलता (आचार्योपासनम्) श्रद्धाभक्तिसहित गुरुकी सेवा (शौचम्) बाहर-भीतरकी शुद्धि (स्थैर्यम्) अन्तःकरणकी स्थिरता और (आत्मविनिग्रहः) आत्मशोध। (7)

    अध्याय 13 का श्लोक 8

    इन्द्रियार्थेषु, वैराग्यम्, अनहंकारः, एव, च,
    जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।8।।

    अनुवाद: (इन्द्रियार्थेषु) इन्द्रियों के आनन्दके भोगोंमें (वैराग्यम्) आसक्तिका अभाव (च) और (अनहंकारः,एव) अहंकारका भी अभाव (जन्ममृत्युजरा व्याधिदुःख, दोषानुदर्शनम्) जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदिमें दुःख और दोषोंका बार-बार विचार करना। (8)

    अध्याय 13 का श्लोक 9

    असक्तिः, अनभिष्वङ्गः, पुत्रादारगृहादिषु,
    नित्यम्, च, समचित्तत्वम्, इष्टानिष्टोपपत्तिषु।।9।।

    अनुवाद: (पुत्रादारगृहादिषु) पुत्रा-स्त्राी-घर और धन आदिमें (असक्तिः) आसक्तिका अभाव (अनभिष्वङ्गः) ममताका न होना (च) तथा (इष्टानिष्टोपपत्तिषु) उपास्य देव-इष्ट या अन्य अनउपास्य देव की प्राप्ति या अप्राप्ति में अर्थात् इष्टवादिता को भूलकर (नित्यम्) सदा ही (समचित्तत्वम्) चितका सम रहना। (9)

    अध्याय 13 का श्लोक 10

    मयि, च, अनन्ययोगेन, भक्तिः, अव्यभिचारिणी,
    विविक्तदेशसेवित्वम्, अरतिः, जनसंसदि।।10।।

    अनुवाद: (मयि) मुझे (अनन्ययोगेन) अनन्य भक्ति के द्वारा (अव्यभिचारिणी) केवल एक इष्ट पर आधारित (भक्तिः) भक्ति (च) तथा (विविक्तदेशसेवित्वम्) एकान्त और शुद्ध देशमें रहनेका स्वभाव और (जनसंसदि) विकारी मनुष्योंके समुदायमें (अरतिः) प्रेमका न होना। (10)

  • अध्याय 13 का श्लोक 11

    अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम्, तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्,
    एतत्, ज्ञानम्, इति, प्रोक्तम्, अज्ञानम्, यत्, अतः, अन्यथा।।11।।

    अनुवाद: (अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम्) अध्यात्मज्ञानमें नित्य स्थिति और (तत्वज्ञानार्थदर्शनम्) तत्वज्ञानके हेतु देखना (एतत्) यहसब (ज्ञानम्) ज्ञान है और (यत्) जो (अतः) इससे (अन्यथा) विपरीत है (अज्ञानम्) वह अज्ञान है (इति) ऐसा (प्रोक्तम्) कहा है। (11)

    अध्याय 13 का श्लोक 12

    ज्ञेयम्, यत्, तत्, प्रवक्ष्यामि, यत्, ज्ञात्वा, अमृतम्, अश्नुते।
    अनादिमत्, परम्, ब्रह्म, न, सत्, तत्, न, असत्, उच्यते।।12।।

    अनुवाद: (यत्) जो (ज्ञेयम्) जानने योग्य है तथा (यत्) जिसको (ज्ञात्वा) जानकर मनुष्य (अमृतम्) परमानन्दको (अश्नुते) प्राप्त हेाता है (तत्) उसको (प्रवक्ष्यामि) भलीभाँति कहूँगा। (तत्) वह (अनादिमत्) अनादिवाला (परम्) परम (ब्रह्म) ब्रह्म (न) न (सत्) सत् ही (उच्यते) कहा जाता है (न) न (असत्) असत् ही। (12)

    अध्याय 13 का श्लोक 13

    सर्वतः पाणिपादम्, तत्, सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
    सर्वतःश्रुतिमत्, लोके, सर्वम्, आवृत्य, तिष्ठति।।13।।

    अनुवाद: (तत्) वह (सर्वतःपाणिपादम्) सब ओर हाथ-पैरवाला (सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्) सब ओर नेत्रा सिर और मुखवाला तथा (सर्वतःश्रुतिमत्) सब ओर कानवाला है। क्योंकि वह (लोके)संसारमें (सर्वम्) सबको (आवृत्य) व्याप्त करके (तिष्ठति) स्थित है। (13)

    अध्याय 13 का श्लोक 14

    सर्वेन्द्रियगुणाभासम्, सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
    असक्तम्, सर्वभृत्, च, एव, निर्गुणम्, गुणभोक्तृृ, च।।14।।

    अनुवाद: (सर्वेन्द्रियगुणाभासम्) सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है परंतु वास्तवमें (सर्वेन्द्रियविवर्जितम्) सब इन्द्रियोंसे रहित है (च) तथा (असक्तम्) आसक्तिरहित होनेपर (एव) भी (सर्वभृत्) सबका धारण-पोषण करनेवाला (च) और (निर्गुणम्) निर्गुण होनेपर भी (गुणभोक्तृ) गुणोंको भोगनेवाला है। (14)

    अध्याय 13 का श्लोक 15

    बहिः, अन्तः, च, भूतानाम्, अचरम्, चरम्, एव, च।
    सूक्ष्मत्वात्, तत्, अविज्ञेयम्, दूरस्थम्, च, अन्तिके, च, तत्।।15।।

    अनुवाद: (भूतानाम्) चराचर सब भूतोंके (बहिः अन्तः) बाहर-भीतर परिपूर्ण है (च) और (चरम् अचरम्) चर-अचररूप (एव) भी वही है (च) और (तत्) वह (सूक्ष्मत्वात्) सूक्ष्म होनेसे (अविज्ञेयम्) अविज्ञेय है अर्थात् जिसकी सही स्थिति न जानी जाए। (च) तथा (अन्तिके) अति समीपमें (च) और (दूरस्थम्) दूरमें भी स्थित (तत्) वही है। (15)

    अध्याय 13 का श्लोक 16

    अविभक्तम्, च, भूतेषु, विभक्तम्, इव, च, स्थितम्।
    भूतभर्तृ, च, तत्, ज्ञेयम्, ग्रसिष्णु, प्रभविष्णु, च।।16।।

    अनुवाद: (अविभक्तम्) विभागरहित होनेपर (च) भी (भूतेषु) प्राणियों में (विभक्तम् इव) विभक्त-सा (स्थितम्) स्थित है (च) तथा (तत्) वह (ज्ञेयम्) जाननेयोग्य परमात्मा (भूतभर्तृ) विष्णुरूपसे भूतों को धारण-पोषण करनेवाला (च) और (ग्रसिष्णु) संहार करनेवाला (च) तथा (प्रभविष्णु) सबको उत्पन्न करनेवाला है। (16)

    अध्याय 13 का श्लोक 17

    ज्योतिषाम्, अपि, तत्, ज्योतिः, तमसः, परम्, उच्यते।
    ज्ञानम्, ज्ञेयम्, ज्ञानगम्यम्, हृदि, सर्वस्य, विष्ठितम्।।17।।

    अनुवाद: (तत्) वह पूर्णब्रह्म (ज्योतिषाम्) ज्योतियोंका (अपि) भी (ज्योतिः) ज्योति एवं (तमसः) मायाधारी काल से (परम्) अन्य (उच्यते) कहा जाता है वह परमात्मा (ज्ञानम्) बोधस्वरूप (ज्ञेयम्) जाननेके योग्य एवं (ज्ञानगम्यम्) तत्त्वज्ञानसे प्राप्त करनेयोग्य है और (सर्वस्य)सबके(हृदि)हृदयमें (विष्ठितम्)विशेषरूपसे स्थित है। (17)

    अध्याय 13 का श्लोक 18

    इति, क्षेत्राम् तथा, ज्ञानम्, ज्ञेयम्, च, उक्तम्, समासतः।
    मद्भक्तः, एतत्, विज्ञाय, मद्भावाय, उपपद्यते।।18।।

    अनुवाद: (इति) इस प्रकार (क्षेत्राम्) शरीर (तथा) तथा (ज्ञेयम्) जानने योग्य परमात्मा का (ज्ञानम्) ज्ञान (समासतः) संक्षेपसे (उक्तम्) कहा है (च) और (मद्भक्तः) मत् भक्त अर्थात् इस मत् अर्थात् विचार को जानने वाला जिज्ञासु को मद्भक्त कहा है अर्थात् मेरे मत् को जानने वाला मेरा भक्त(एतत्) इसको (विज्ञाय) तत्त्वसे जानकर (मद्भावाय) मतावलम्बी अर्थात् मेरे उसी विचार भाव को (उपपद्यते) प्राप्त हो जाता है काल अर्थात् मेरे ब्रह्म साधना त्याग कर पूर्णब्रह्म अर्थात् सतपुरुष की साधना करके जन्म-मरण से पूर्ण रूप से मुक्त हो जाता है। (18)

    विशेष:-- यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्रा 9 में कहा है कि जो साधक पूर्व जन्मों में ब्रह्म साधना करता था। वह वर्तमान जन्म में भी उसी भाव से भावित रहता है। वह ब्रह्म साधना ही करता है। जब उसे तत्वदर्शी सन्त जो ब्रह्म व पूर्ण ब्रह्म की भक्ति की भिन्नता बताता है, मिल जाता है तो तुरन्त सत्य साधना पर लग जाता है।

    अध्याय 13 का श्लोक 19

    प्रकृतिम्, पुरुषम्, च, एव, विद्धि, अनादी, उभौ, अपि।
    विकारान्, च, गुणान्, च, एव, विद्धि, प्रकृतिसम्भवान्।।19।।

    अनुवाद: (प्रकृतिम्) प्रकृृति अर्थात् प्रथम माया जिसे पराशक्ति भी कहते हैं (च) और (पुरुषम्) पूर्ण परमात्मा (उभौ) इन दोनोंको (एव) ही तू (अनादी) अनादि (विद्धि) जान (च) और (विकारान्) राग-द्वेषादि विकारोंको (च) तथा (गुणान्) त्रिगुणात्मक तीनों गुणों अर्थात् रजगुण ब्रह्मा,सतगुण विष्णु तथा तम्गुण शिव जी को (अपि) भी (प्रकृतिसम्भवान् एव) प्रकृृतिसे ही उत्पन्न (विद्धि) जान। यही प्रमाण गीता अध्याय 14 श्लोक 5 में भी है कि तीनों गुण अर्थात् रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव जी प्रकृृति से उत्पन्न हैं। (19)

    अध्याय 13 का श्लोक 20

    कार्यकरणकतृर्त्वे, हेतुः, प्रकृतिः, उच्यते।
    पुरुषः सुखदुःखानाम्, भोक्तृृत्वे, हेतुः, उच्यते।।20।।

    अनुवाद: (कार्यकरणकतृत्वे) कार्य और करणको उत्पन्न करनेमें (हेतुः) हेतु (प्रकृतिः) प्रकृृति (उच्यते) कही जाती है और (पुरुषः) सतपुरुष (सुखदुःखानाम्) सुख-दुःखोंके (भोक्तृत्वे) जीवात्मा को भोग भोगवाने के कारण भोगनेमें (हेतुः) हेतु (उच्यते) कहा जाता है। गीता अध्याय 18 श्लोक 16 में कहा है कि परमेश्वर सर्व प्राणियों को यन्त्रा की तरह कर्मानुसार भ्रमण कराता हुआ सर्व प्राणियों के हृदय में स्थित है। गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में कहा है कि पूर्ण परमात्मा तो गीता ज्ञान दाता से अन्य है। वही अविनाशी परमात्मा तीनों लोकों में प्रवेश करके सर्व का धारण पोषण करता है। (20)

  • अध्याय 13 का श्लोक 21

    पुरुषः, प्रकृृतिस्थः, हि, भुङ्क्ते, प्रकृृतिजान्, गुणान्।
    कारणम्, गुणसंगः, अस्य, सदसद्योनिजन्मसु।।21।।

    अनुवाद: (प्रकृृतिस्थः) प्रकृतिमें स्थित (हि) ही (पुरुषः) पुरुष अर्थात् परमात्मा (प्रकृतिजान्) प्रकृतिसे उत्पन्न (गुणान्) त्रिगुणात्मक (भुड्क्ते) जीवात्मा को कर्मानुसार भोग भोगवाने के कारण भोगता है और इन (गुणसंगः) गुणोंका संग ही (अस्य) इस जीवात्माके (सदसद्योनिजन्मसु)अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका(कारणम्)कारण है। यही प्रमाण गीता अध्याय 14 श्लोक 5 में भी है तथा अध्याय 18 श्लोक 16 में भी है। (21)

    अध्याय 13 का श्लोक 22

    उपद्रष्टा, अनुमन्ता, च, भर्ता, भोक्ता, महेश्वरः।
    परमात्मा, इति, च, अपि, उक्तः, देहे, अस्मिन्, पुरुषः, परः।।22।।

    अनुवाद: (अस्मिन्) इस (देहे अपि) देहमें भी स्थित (पुरुषः) यह सतपुरुष अर्थात् पूर्ण ब्रह्म वास्तव में (परः) सर्वोपरि प्रभु तो गीता ज्ञान दाता से दूसरा अर्थात् अन्य ही है। वही (उपद्रष्टा) साक्षी होनेसे उपद्रष्टा (च) और (अनुमन्ता) यथार्थ सम्ति देनेवाला होनेसे अनुमन्ता (भर्ता) सबका धारण-पोषण करनेवाला होनेसे भर्ता (भोक्ता) जीवात्मा को भोग भोगवाने के कारण भोक्ता, (महेश्वरः) ब्रह्म व परब्रह्म आदिका भी स्वामी होनेसे महेश्वर (च) और (परमात्मा) परमात्मा (इति) ऐसा (उक्तः) कहा गया है। यही प्रमाण गीता अध्याय 15 श्लोक 16-17 में है। (22)

    अध्याय 13 का श्लोक 23

    यः, एवम्, वेत्ति, पुरुषम्, प्रकृृतिम्, च, गुणैः, सह,
    सर्वथा, वर्तमानः, अपि, न, सः, भूयः, अभिजायते।।23।।

    अनुवाद: (एवम्) इस प्रकार (पुरुषम्) सतपुरुषको (च) और (गुणैः) गुणों अर्थात् रजगुण ब्रह्म, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव जी के (सह) सहित (प्रकृतिम्) माया अर्थात् दुर्गा को (यः) जो (वेत्ति) तत्त्वसे जानता है (सः) वह (सर्वथा) सब प्रकारसे (वर्तमानः) वर्तमान में शास्त्रा विरुद्ध भक्ति साधना से मुड़ जाता है अर्थात् शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति कर्मों को वर्तमान में ही करता हुआ (अपि) भी (भूयः) फिर (न) नहीं (अभिजायते) जन्मता। (23)

    अध्याय 13 का श्लोक 24

    ध्यानेन, आत्मनि, पश्यन्ति, केचित्, आत्मानम्, आत्मना।
    अन्ये, साङ्ख्येन, योगेन, कर्मयोगेन, च, अपरे।।24।।

    अनुवाद: (आत्मानम्) परमात्माको (केचित्) कितने ही मनुष्य तो (आत्मना) अपनीदिव्य दृृष्टि से (ध्यानेन) ध्यानके द्वारा (आत्मनि) अपने शरीर में अपने अन्तःकरण में (पश्यन्ति) देखते हैं, (अन्ये) अन्य कितने ही (साड्ख्येन योगेन) ज्ञानयोग के द्वारा (च) और (अपरे) दूसरे कितने ही (कर्मयोगेन) कर्मयोगके द्वारा देखते हैं अर्थात् अनुभव करते हैं। गीता अध्याय 5 श्लोक 4-5 में भी प्रमाण है। (24)

    अध्याय 13 का श्लोक 25

    अन्ये, तु, एवम्, अजानन्तः, श्रुत्वा, अन्येभ्यः, उपासते।
    ते, अपि, च, अतितरन्ति, एव, मृत्युम्, श्रुतिपरायणाः।।25।।

    अनुवाद: (तु) इसके विपरित (अन्ये) इनसे दूसरे (एवम्) इस प्रकार (अजानन्तः) न जानते हुए (अन्येभ्यः) दूसरोंसे अर्थात् तत्वके जाननेवाले पुरुषोंसे (श्रुत्वा) सुनकर ही तदनुसार (उपासते) उपासना करते हैं (च) और (ते) वे (श्रुतिपरायणाः) कही सुनी मानने वाले (अपि) भी (मृत्युम्) मृृत्युरूप संसारसागरको (अतितरन्ति, एव) निःसन्देह तर जाते हैं। गीता अध्याय 5 श्लोक 4.5 में भी प्रमाण है। (25)

    अध्याय 13 का श्लोक 26

    यावत्, संजायते , किंचित, सत्त्वम्, स्थावरजंगमम्।
    क्षेत्राक्षेत्राज्ञसंयोगात्, तत्, विद्धि, भरतर्षभ।।26।।

    अनुवाद: (भरतर्षभ) हे भरतर्षभ अर्जुन! (यावत्) यावन्मात्रा (किंचित्) जितने भी (स्थावरजंगमम्) स्थावरजंगम (सत्त्वम्) प्राणी (संजायते) उत्पन्न होते हैं, (तत्) उन सबको तू (क्षेत्राक्षेत्राज्ञसंयोगात्) क्षेत्रा और क्षेत्राज्ञके संयोगसे ही उत्पन्न (विद्धि) जान। (26)

    अध्याय 13 का श्लोक 27

    समम्, सर्वेषु, भूतेषु, तिष्ठन्तम्, परमेश्वरम्।
    विनश्यत्सु, अविनश्यन्तम्, यः, पश्यति, सः, पश्यति।।27।।

    अनुवाद: (यः) जो (विनश्यत्सु) नष्ट होते हुए (सर्वेषु) सब (भूतेषु) चराचर भूतोंमें (परमेश्वरम्) परमेश्वरको (अविनश्यन्तम्) नाशरहित और (समम्) समभावसे (तिष्ठन्तम्) स्थित (पश्यति)देखता है (सः)वही यथार्थ (पश्यति)देखता है अर्थात् वह पूर्णज्ञानी है। (27)

    अध्याय 13 का श्लोक 28

    समम्, पश्यन्, हि, सर्वत्रा, समवस्थितम्, ईश्वरम्।
    न, हिनस्ति, आत्मना, आत्मानम्, ततः, याति, पराम्, गतिम्।।28।।

    अनुवाद: (हि) क्योंकि (सर्वत्रा) सबमें (समवस्थितम्) सर्वव्यापक (ईश्वरम्) उत्तम पुरूष अर्थात् परमेश्वरको (समम्) समान (पश्यन्) देखता हुआ (आत्मना) अपनेद्वारा (आत्मानम्) अपनेको (न हिनस्ति) नष्ट नहीं करता अर्थात् आत्मघात नहीं करता (ततः) इससे वह (पराम्) परम (गतिम्) गतिको (याति) प्राप्त होता है। (28)

    अध्याय 13 का श्लोक 29

    प्रकृत्या, एव, च, कर्माणि, क्रियमाणानि, सर्वशः।
    यः, पश्यति, तथा, आत्मानम्, अकर्तारम्, सः, पश्यति।।29।।

    अनुवाद: (च) और (यः) जो साधक (कर्माणि) सम्पूर्ण कर्मोंको (सर्वशः) सब प्रकारसे (प्रकृृत्या) प्रकृृतिके द्वारा (एव) ही (क्रियमाणानि) किये जाते हुए (पश्यति) देखता है (तथा) और (आत्मानम्) परमात्माको (अकर्तारम्) अकत्र्ता देखता है (सः) वही यथार्थ (पश्यति) देखता है। (29)

    अध्याय 13 का श्लोक 30

    यदा, भूतपृथग्भावम्, एकस्थम्, अनुपश्यति।
    ततः, एव, च, विस्तारम्, ब्रह्म, सम्पद्यते तदा।।30।।

    अनुवाद: (यदा) जब कोई साधक (भूतपृृथग्भावम्) प्राणियों के भिन्न-2 भावको (च) तथा (विस्तारम्) विस्तार को (अनुपश्यति) देखता है अर्थात् जान लेता है (तदा) तब वह भक्त (एकस्थम्) एक परमात्मा में स्थित (ततः ब्रह्म) उस पूर्ण परमात्मा को (एव) ही (सम्पद्यते) प्राप्त हो जाता है। (30)

  • अध्याय 13 का श्लोक 31

    अनादित्वात्, निर्गुणत्वात्, परमात्मा, अयम्, अव्ययः।
    शरीरस्थः, अपि, कौन्तेय, न, करोति, न, लिप्यते।।31।।

    अनुवाद: (कौन्तेय) हे अर्जुन! (अनादित्वात्) अनादि होनेसे और (निर्गुणत्वात्) उसकी शक्ति निर्गुण होनेसे (अयम्) यह (अव्ययः) अविनाशी (परमात्मा) परमात्मा (शरीरस्थः) शरीरमें रहता हुआ (अपि) भी वास्तवमें (न) न तो (करोति) कुछ करता है और (न) न (लिप्यते) लिप्त ही होता है। (31)

    भावार्थ - श्लोक 31 का भाव है कि जैसे सूर्य दूरस्थ होने से भी जल के घड़े में दृृष्टिगोचर होता है तथा निर्गुण शक्ति अर्थात् ताप प्रभावित करता रहता है, इसी प्रकार पूर्ण परमात्मा अपने सत्यलोक में रहते हुए भी प्रत्येक आत्मा में प्रतिबिम्ब रूप से रहता है। जैसे अवतल लैंस पर सूर्य की किरणें अधिक ताप पैदा कर देती हैं तथा उत्तल लैंस पर अपना स्वाभाविक प्रभाव ही रखती हैं। इसी प्रकार शास्त्रा विधि अनुसार साधक अवतल लैंस बन जाता है। जिससे ईश्वरीय शक्ति का अधिक लाभ प्राप्त करता है तथा शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण करने वाला साधक केवल कर्म संस्कार ही प्राप्त करता है। उसे उत्तल लैंस जानो।

    अध्याय 13 का श्लोक 32

    यथा, सर्वगतम्, सौक्ष्म्यात्, आकाशम्, न, उपलिप्यते।
    सर्वत्रा, अवस्थितः, देहे, तथा, आत्मा, न, उपलिप्यते।।32।।

    अनुवाद: (यथा) जिस प्रकार (सर्वगतम्) सर्वत्रा व्याप्त (आकाशम्) आकाश (सौक्ष्म्यात्) सूक्ष्म होने के कारण (न, उपलिप्यते) लिप्त नहीं होता (तथा) वैसे ही (देहे) देहमें घड़े में सूर्य सदृृश (सर्वत्रा) सर्वत्रा (अवस्थितः) स्थित (आत्मा) आत्मा सहित परमात्मा देहके गुणोंसे (न,उपलिप्यते) लिप्त नहीं होता। (32)

    अध्याय 13 का श्लोक 33

    यथा, प्रकाशयति, एकः, कृत्स्न्नम्, लोकम्, इमम्, रविः।
    क्षेत्राम्, क्षेत्राी, तथा, कृत्स्न्नम्, प्रकाशयति, भारत।।33।।

    अनवाुद: (भारत) हे अर्जुन! (यथा) जिस प्रकार (एकः) एक (रविः) सूर्य (इमम्) इस (कृृत्स्न्नम्) सम्पूर्ण (लोकम्) ब्रह्मण्डको (प्रकाशयति) प्रकाशित करता है (तथा) उसी प्रकार (क्षेत्राी) पूर्ण ब्रह्म (कृत्स्न्नम्) सम्पूर्ण (क्षेत्राम्) शरीर अर्थात् ब्रह्मण्डको (प्रकाशयति) प्रकाशित करता है। (33)

    अध्याय 13 का श्लोक 34

    क्षेत्राक्षेत्राज्ञयोः, एवम्, अन्तरम्, ज्ञानचक्षुषा।
    भूतप्रकृतिमोक्षम्, च, ये, विदुः, यान्ति, ते, परम्।।34।।

    अनुवाद: (एवम्) इस प्रकार (क्षेत्रा) शरीर (च) तथा (क्षेत्राज्ञयो) ब्रह्म कालके (अन्तरम्) भेदको (ये) जो (ज्ञानचक्षुषा) ज्ञान रूपी नेत्रों से अर्थात् तत्वज्ञान से (विदुः) अच्छी तरह जान लेता है, (ते भूत) वे प्राणी (प्रकृृति) प्रकृृति से अर्थात् काल की छोड़ी हुई शक्ति माया अष्टंगी से (मोक्षम्) मुक्त हो कर (परम्) गीता ज्ञान दाता से दूसरे पूर्णपरमात्माको (यान्ति) प्राप्त होते हैं। गीता अध्याय 13 श्लोक 1-2 में कहा है कि क्षेत्राज्ञ अर्थात् शरीर को जानने वाला क्षेत्राज्ञ कहा जाता है। इसलिए क्षेत्राज्ञ भी मुझे ही जान। इससे सिद्ध हो कि क्षेत्राज्ञ ज्ञान दाता काल अर्थात् ब्रह्म है। (34)

    (इति अध्याय तेरहवाँ)