श्रीमद भगवद गीता

संत रामपाल जी महाराज द्वारा अनुवादित

गीता अध्याय 6 | Gita Adhyay 6

श्लोक |Shlokas

1-10
11-20
21-30
31-40
41-47
  • अध्याय 6 का श्लोक 1

    अनाश्रितः, कर्मफलम्, कार्यम्, कर्म, करोति, यः,
    सः, सन्यासी, च, योगी, च, न, निरग्निः, न, च, अक्रियः।।1।।

    अनुवाद: (यः) जो साधक (कर्मफलम्) कर्मफलका (अनाश्रितः) आश्रय न लेकर (कार्यम्) शास्त्रा विधि अनुसार करनेयोग्य (कर्म) भक्ति कर्म (करोति) करता है (सः) वह (सन्यासी) सन्यासी अर्थात् शास्त्रा विरुद्ध साधना कर्मों को त्यागा हुआ व्यक्ति (च) तथा (योगी) योगी अर्थात् भक्त है (च) और (निरग्निः) वासना रहित (न) नहीं है (च) तथा केवल (अक्रियः) एक स्थान पर बैठ कर विशेष आसन आदि लगा कर लोक दिखावा करके क्रियाओंका त्याग करने वाला भी योगी (न) नहीं है। भावार्थ है कि जो हठ योग करके दम्भ करता है मन में विकार है, ऊपर से निष्क्रिय दिखता है वह न सन्यासी है, न ही कर्मयोगी अर्थात् भक्त है। (1)

    अध्याय 6 का श्लोक 2

    यम्, सन्यासम्, इति, प्राहुः, योगम्, तम्, विद्धि पाण्डव,
    न, हि, असन्यस्तसङ्कल्पः, योगी, भवति, कश्चन।।2।।

    अनुवाद: (पाण्डव) हे अर्जुन! (यम्) जिसको (सन्यासम्) सन्यास (इति) ऐसा (प्राहुः) कहते हैं (तम्) उस (योगम्) भक्ति ज्ञान योग को (विद्धि) जान (हि) क्योंकि (असन्यस्तसङ्कल्पः) संकल्पोंका त्याग न करनेवाला (कश्चन) कोई भी पुरुष (योगी) योगी (न) नहीं (भवति) होता। (2)

    गरीब, एक नारी त्याग दीन्हीं, पाँच नारी गैल बे।
    पाया न द्वारा मुक्ति का, सुखदेव करी बहु सैल बे।।

    भावार्थ है कि एक पत्नी को त्याग कर सन्यास प्रस्त हो गए परंतु पाँच विकार(काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) रूपी पत्नियाँ साथ ही हैं अर्थात् संकल्प अभी भी रहे, ये त्यागो, तब सन्यासी होवोगे। जैसे सुखदेव जी सन्यासी बन कर बहुत फिरा परंतु मान-बड़ाई नहीं त्यागी जिसके कारण विफल रहा।

    अध्याय 6 का श्लोक 3

    आरुरुक्षोः, मुनेः, योगम्, कर्म, कारणम्, उच्यते,
    योगारूढस्य, तस्य, एव, शमः, कारणम्, उच्यते।।3।।

    अनुवाद: (योगम्) योग अर्थात् भक्ति में (आरुरुक्षोः) आरूढ़ होनेकी इच्छावाले (मुनेः) मननशील साधकके लिये (कर्म) शास्त्रा अनुकूल भक्ति कर्म करना ही (कारणम्) हेतु अर्थात् भक्ति का उद्देश्य (उच्यते) कहा जाता है (तस्य) उस (योगारूढस्य) भक्ति में संलग्न साधकका (शमः) जो सर्वसंकल्पोंका अभाव है वही (एव) वास्तव में (कारणम्) भक्ति करने का कारण अर्थात् हेतु (उच्यते) कहा जाता है। (3)

    अध्याय 6 का श्लोक 4

    यदा, हि, न, इन्द्रियार्थेषु, न, कर्मसु, अनुषज्जते,
    सर्वसङ्कल्पसन्यासी, योगारूढः, तदा, उच्यते।।4।।

    अनुवाद: (यदा) जिस समयमें (न) न तो (इन्द्रियार्थेषु) इन्द्रियोंके भोगोंमें और (न) न (कर्मसु) कर्मोंमें (हि) ही (अनुषज्जते) आसक्त होता है (तदा) उस स्थितिमें (सर्वसङ्कल्पसन्यासी) सर्वसंकल्पोंका त्यागी पुरुष (योगारूढः) वास्तव में भक्ति में दृढ़ निश्चय से संलग्न (उच्यते) कहा जाता है। (4)

    अध्याय 6 का श्लोक 5

    उद्धरेत्, आत्मना, आत्मानम्, न, आत्मानम्, अवसादयेत्,
    आत्मा, एव, हि, आत्मनः, बन्धुः, आत्मा, एव, रिपुः, आत्मनः।।5।।

    अनुवाद: (आत्मना) पूर्ण परमात्मा जो आत्मा के साथ अभेद रूप में रहता है के तत्वज्ञान को ध्यान में रखते हुए शास्त्रा अनुकूल साधना से अपने द्वारा (आत्मानम्) अपनी आत्माका (उद्धरेत्) उद्धार करे और (आत्मानम्) अपनेको (न अवसादयेत्) बर्बाद न करे (हि) क्योंकि (आत्मा) शास्त्रा अनुकूल साधक को पूर्ण परमात्मा विशेष लाभ प्रदान करता है वही प्रभु आत्मा के साथ अभेद रूप में रहता है, इसलिए वह आत्म रूप परमात्मा (एव) वास्तव में (आत्मनः) आत्माका (बन्धुः) मित्रा है और (आत्मा) शास्त्रा विधि को त्याग कर मनमाना आचरण करने से जीवात्मा (एव) वास्तव में (आत्मनः) स्वयं का (रिपुः) शत्राु है। (5)

    अध्याय 6 का श्लोक 6

    बन्धुः, आत्मा, आत्मनः, तस्य, येन, आत्मा, एव, आत्मना, जितः,
    अनात्मनः, तु, शत्राुत्वे, वर्तेत, आत्मा, एव, शत्राुवत्।।6।।

    अनुवाद: (आत्मनः) जो आत्मा शास्त्रानुकूल साधना करता है (तस्य) उसका (बन्धुः आत्मा) पूर्ण परमात्मा ही साथी है (येन) जिस कारण से (एव) वास्तव में (आत्मना) शास्त्रा अनुकूल साधक की आत्मा के साथ पूर्ण परमात्मा की शक्ति विशेष कार्य करती है जैसे बिजली का कनेक्शन लेने पर मानव शक्ति से न होने वाले कार्य भी आसानी से हो जाते हैं। ऐसे पूर्ण परमात्मा से (आत्मा) जीवात्मा की (जितः) विजय होती है अर्थात् सर्व कार्य सिद्ध तथा सर्व सुख प्राप्त होता है तथा परमगति को अर्थात् पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है तथा मन व इन्द्रियों पर भी वही विजय प्राप्त करता है। (तू) परन्तु इसके विपरीत जो शास्त्रा अनुकूल साधना नहीं करते उनकी आत्मा को पूर्ण प्रभु का विशेष सहयोग प्राप्त नहीं होता, वह केवल कर्म संस्कार ही प्राप्त करता रहता है इसलिए (अनात्मनः) पूर्ण प्रभु के सहयोग रहित जीवात्मा (शत्राुत्वे) स्वयं दुश्मन जैसा (वर्तेत) व्यवहार करता है (एव) वास्तव में वह साधक (आत्मा) अपना ही (शत्राुवत्) शत्राु तुल्य है अर्थात् शास्त्रा विधि को त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमुखी पूजायें करने वाले को न तो सुख प्राप्त होता है न ही कार्य सिद्ध होता है, न परमगति ही प्राप्त होती है, प्रमाण पवित्रा गीता अध्याय 16 मंत्र 23-24। (6)

    अध्याय 6 का श्लोक 7

    जितात्मनः, प्रशान्तस्य, परमात्मा, समाहितः,
    शीतोष्णसुखदुःखेषु, तथा, मानापमानयोः।।7।।

    अनुवाद: उपरोक्त श्लोक 6 में जिस विजयी आत्मा का विवरण है उसी से सम्बन्धित है कि वह (जितात्मनः) परमात्मा के कृप्या पात्रा विजयी आत्मा अर्थात् शास्त्रा अनुकूल साधना करने से प्रभु से सर्व सुख व कार्य सिद्धि प्राप्त हो रही है वह (प्रशान्तस्य) पूर्ण संतुष्ट साधक (परमात्मा) पूर्ण प्रभु के ऊपर (समाहितः) पूर्ण रूपेण आश्रित है अर्थात् उसको किसी अन्य से लाभ की चाह नहीं रहती। वह तो (शितोष्ण) सर्दी व गर्मी अर्थात् (सुख दुःखेषु) सुख व दुःख में (तथा) तथा (मान-अपमानयोः) मान व अपमान में भी प्रभु की इच्छा जान कर ही निश्चिंत रहता है। (7)

    अध्याय 6 का श्लोक 8

    ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा, कूटस्थः, विजितेन्द्रियः,
    युक्तः, इति, उच्यते, योगी, समलोष्टाश्मका×चनः।। 8।।

    अनुवाद: (ज्ञानविज्ञानतृृप्तात्मा) जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान अर्थात् तत्वज्ञान से तृप्त है (कूटस्थः) जिसकी जीवात्मा की स्थिति विकाररहित है (विजितेन्द्रियः) प्रभु के सहयोग से जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और (समलोष्टाश्म का×चनः) जिसके लिये मिट्टी पत्थर और सुवर्ण समान हैं वह (योगी) शास्त्रा अनुकूल साधक (युक्तः) युक्त अर्थात् भगवत्प्राप्त है (इति) यह अन्तिम (उच्यते) ठीक सही भक्ति करने वाला कहा जाता है। (8)

    अध्याय 6 का श्लोक 9

    सुहृद् मित्रा अरि उदासीन मध्यस्थ द्वेष्य बन्धुषु,
    साधुषु, अपि, च, पापेषु, समबुद्धिः, विशिष्यते।।9।।

    अनुवाद: (सुहृद्) सुहृद्,(मित्रा) मित्रा,(अरि) वैरी,(उदासीन) उदासीन,(मध्यस्थ) मध्यस्थ,(द्वेष्य) द्वेष्य और (बन्धुषु) बन्धुगणोंमें (साधुषु) धर्मात्माओंमें (च) और (पापेषु) पापियों में (अपि) भी (समबुद्धिः) समान भाव रखनेवाला (विशिष्यते) अत्यन्त श्रेष्ठ है। (9)

    (श्लोक 10 से 15 में ब्रह्म ने अपनी पूजा के ज्ञान की अटकल लगाई है)

    अध्याय 6 का श्लोक 10

    योगी, युजीत, सततम्, आत्मानम्, रहसि, स्थितः,
    एकाकी, यतचित्तात्मा, निराशीः, अपरिग्रहः।।10।।

    अनुवाद: (यतचित्तात्मा) मन और इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें रखनेवाला (निराशीः) आशारहित और (अपरिग्रहः) संग्रहरहित (योगी) साधक (एकाकी) अकेला ही (रहसि) एकान्त स्थानमें रहता है तथा (स्थितः) स्थित होकर (आत्मानम्) आत्माको (सतत्म) निरन्तर परमात्मामें (युजीत) लगावे। (10)

  • अध्याय 6 का श्लोक 11

    शुचै, देशे, प्रतिष्ठाप्य, स्थिरम्, आसनम्, आत्मनः,
    न, अत्युच्छ्रितम्, न, अतिनीचम्, चैलाजिनकुशोत्तरम्।।11।।

    अनुवाद: (शुचै) शुद्ध (देशे) स्थान में जिसके ऊपर क्रमशः (चैलाजिनकुशोत्तरम्) कुशा मृगछाला और वस्त्रा बिछे हैं जो (न) न (अत्युच्छ्रितम्) बहुत ऊँचा है और (न) न (अतिनीचम्) बहुत नीचा ऐसे (आत्मनः) अपने (आसनम्) आसनको (स्थिरम्) स्थिर (प्रतिष्ठाप्य) स्थापन करके। (11)

    अध्याय 6 का श्लोक 12

    तत्रा, एकाग्रम्, मनः, कृत्वा, यतचितेन्द्रियक्रियः,
    उपविश्य, आसने, युज्यात्, योगम्, आत्मविशुद्धये।। 12।।

    अनुवाद: (तत्रा) उस (आसने) आसनपर (उपविश्य) बैठकर (यतचितेन्द्रियक्रियः) चित और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें रखते हुए (मनः) मनको (एकाग्रम्) एकाग्र (कृत्वा) करके (आत्मविशुद्धये) अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये (योगम्) साधना का (युज्यात्) अभ्यास करे। ( 12)

    अध्याय 6 का श्लोक 13

    समम्, कायशिरोग्रीवम्, धारयन्, अचलम्, स्थिरः,
    सम्प्रेक्ष्य, नासिकाग्रम्, स्वम्, दिशः, च, अनवलोकयन्।।13।।

    अनुवाद: (कायशिरोग्रीवम्) काया सिर और गर्दन को (समम्) समान एवम् (अचलम्) स्थिर (धारयन्) धारण करके (च) और (स्थिरः) स्थिर होकर (स्वम्) अपनी (नासिकाग्रम्) नासिका के अग्रभागपर (सम्पे्रक्ष्य) दृष्टि जमाकर अन्य (दिशः) दिशाओंको (अनवलोकयन्) न देखता हुआ। (13)

    अध्याय 6 का श्लोक 14

    प्रशान्तात्मा, विगतभीः, ब्रह्मचारिव्रते, स्थितः,
    मनः, संयम्य, मच्चितः, युक्तः, आसीत, मत्परः।।14।।

    अनुवाद: (ब्रह्मचारिव्रते) ब्रह्मचारीके व्रतमें (स्थितः) स्थित (विगतभीः) भयरहित तथा (प्रशान्तात्मा) भलीभाँति शान्त अन्तःकरणवाला (मनः) मनको (संयम्य) रोककर (मच्चितः) लीन चितवाला (मत्परः) मतावलम्बी मत् अनुसार अर्थात् जो काल विचार दे रहा है ऐसे करता हुआ (युक्तः) साधना में संलग्न (आसीत) स्थित होवे। (14)

    अध्याय 6 का श्लोक 15

    यु×जन्, एवम्, सदा, आत्मानम्, योगी, नियतमानसः,
    शान्तिम्, निर्वाणपरमाम्, मत्संस्थाम्, अधिगच्छति।।15।।

    अनुवाद: (एवम्) इस प्रकार (सदा) निरन्तर (नियतमानसः) मेरे द्वारा उपरोक्त हठयोग बताया गया है उस के अनुसार मन को वश में करके (आत्मानम्) स्वयं को परमात्मा के (यु×जन्) साधना में लगाता हुआ (मत्संस्थाम्) जैसे कर्म करेगा वैसा ही फल प्राप्त होने वाले नियमित सिद्धांत के आधार से मेरे ही ऊपर आश्रित रहने वाला (योगी) साधक (निवार्ण परमाम्) अति शान्त अर्थात् समाप्त प्रायः (शान्तिम्) शान्ति को (अधिगच्छति) प्राप्त होता है अर्थात् मेरे से मिलने वाली नाम मात्रा मुक्ति को प्राप्त होता है। अपनी मुक्ति को गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में स्वयं ही अति अश्रेष्ठ कहा है। गीता अध्याय 6 श्लोक 23 में अनिर्वणम् का अर्थात् न उकताए अर्थात् न मुर्झाए किया है इसलिए निर्वाणम् का अर्थ मुर्झायी हुई अर्थात् मरी हुई नाम मात्रा की शान्ति हुई। (15)

    विशेष:- उपरोक्त गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 15 में एक स्थान पर विशेष आसन पर विराजमान होकर हठ करके ध्यान व दृृष्टि नाक के अग्र भाग पर लगाने आदि की सलाह दी है तथा गीता अध्याय 3 श्लोक 5 से 9 तक इसी को मना किया है।

    (श्लोक 16 से 30 तक पूर्ण परमात्मा के विषय में ज्ञान है)

    अध्याय 6 का श्लोक 16

    न, अति, अश्नतः, तु, योगः, अस्ति, न, च, एकान्तम्, अनश्नतः,
    न, च, अति, स्वप्नशीलस्य, जाग्रतः, न, एव, च, अर्जुन।।16।।

    अनुवाद: उपरोक्त श्लोक 10 से 15 में वर्णित विधि वाली एकान्त में बैठ कर विशेष आसन आदि लगा कर साधना करना तो मेरे तक का लाभ प्राप्ति मात्रा है, यह वास्तव में श्रेष्ठ नहीं है। गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में अपने द्वारा दिए जाने वाले लाभ (गति) को अश्रेष्ठ बताया है। इसलिए (अर्जुन) हे अर्जुन (तु) इसके विपरीत उस पूर्ण परमात्मा को प्राप्त करने वाली (योग) भक्ति (न एकान्तम्) न तो एकान्त स्थान पर विशेष आसन या मुद्रा में बैठने से तथा (न) न ही (अति) अत्यधिक (अश्नतः) खाने वाले की (च) और (अनश्नतः) न बिल्कुल न खाने वाले अर्थात् व्रत रखने वाले की (च) तथा (न) न ही (अति) बहुत (स्वप्नशीलस्य) शयन करने वाले की (च) तथा (न) न (एव) ही (जाग्रतः) हठ करके अधिक जागने वाले की (अस्ति) सिद्ध होती है अर्थात् उपरोक्त श्लोक 10 से 15 में वर्णित विधि व्यर्थ है। (16)

    अध्याय 6 का श्लोक 17

    युक्ताहारविहारस्य, युक्तचेष्टस्य, कर्मसु,
    युक्तस्वप्नावबोधस्य, योगः, भवति, दुःखहा।।17।।

    अनुवाद: (दुःखहा) दुःखोंका नाश करनेवाला (योगः) भक्ति तो (युक्ताहारविहारस्य) यथायोग्य आहार-विहार करनेवालेका (कर्मसु) शास्त्रा अनुसार कर्मोंमें (युक्तचेष्टस्य) यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका और (युक्तस्वप्नावबोधस्य) यथायोग्य सोने तथा जागने वालेका ही सिद्ध (भवति) होता है। (17)

    अध्याय 6 का श्लोक 18

    यदा, विनियतम्, चित्तम्, आत्मनि, एव, अवतिष्ठते,
    निःस्पृहः, सर्वकामेभ्यः, युक्तः, इति, उच्यते, तदा।।18।।

    अनुवाद: (विनियतम्) एक पूर्ण परमात्मा की शास्त्रा अनुकूल भक्ति में अत्यन्त नियमित किया हुआ (चित्तम्) चित (यदा) जिस स्थितिमें (आत्मनि) परमात्मा में (एव) ही (अवतिष्ठते) भलीभाँति स्थित हो जाता है (तदा) उस कालमें (सर्वकामेभ्यः) सम्पूर्ण मनोकामनाओंसे (निःस्पृृहः) मुक्त (युक्तः) भक्तियुक्त अर्थात् भक्ति में संलग्न है (इति) ऐसा (उच्यते) कहा जाता है। (18)

    अध्याय 6 का श्लोक 19

    यथा, दीपः, निवातस्थः, न, इंगते, सा, उपमा, स्मृता,
    योगिनः, यतचित्तस्य, युज्तः, योगम्, आत्मनः।।19।।

    अनुवाद: (यथा) जिस प्रकार (निवातस्थः) वायुरहित स्थानमें स्थित (दीपः) दीपक (न,इगंते) चलायमान नहीं होता (सा) वैसी ही (उपमा) उपमा (आत्मनः) शास्त्रा अनुकूल साधक आत्मा के साथ अभेद रूप में रहने वाले परमात्मा अर्थात् पूर्ण ब्रह्म की (योगम्) साधना में (युज्तः) लगे हुए (यत) प्रयत्न शील (योगिनः) साधक के (चित्तस्य) चितकी (स्मृता) सुमरण स्थिति कही गयी है। (19)

    अध्याय 6 का श्लोक 20

    यत्रा, उपरमते, चित्तम्, निरुद्धम्, योगसेवया,
    यत्रा, च, एव, आत्मना, आत्मानम्, पश्यन्, आत्मनि, तुष्यति।।20।।

    अनुवाद: (चित्तम्) चित (निरुद्धम्) निरुद्ध (योगसेवया) योगके अभ्याससे (यत्रा) जिस अवस्थामें (उपरमते) ऊपर बताए मत - विचारों पर आधारित हो कर उपराम हो जाता है (च) और (यत्रा) जिस अवस्थामें (आत्मना) शास्त्रा अनुकूल साधक जीवात्मा द्वारा (आत्मानम्) आत्मा के साथ रहने वाले पूर्ण परमात्मा को सर्वत्रा (पश्यन्) देखकर (एव) ही वास्तव में (आत्मनि) आत्मा से अभेद पूर्ण परमात्मा में (तुष्यति) संतुष्ट रहता है अर्थात् वह डगमग नहीं रहता। (20)

  • अध्याय 6 का श्लोक 21

    सुखम् आत्यन्तिकम्, यत्, तत्, बुद्धिग्राह्यम्, अतीन्द्रियम्,
    वेत्ति, यत्रा, न, च, एव, अयम्, स्थितः, चलति, तत्त्वतः।।21।।

    अनुवाद: (अतीन्द्रियम्) इन्द्रियोंसे अतीत (बुद्धिग्राह्यम्) केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वारा ग्रहण करने योग्य (यत्) जो (आत्यन्तिकम्) अनन्त (सुखम्) आनन्द है। कभी न समाप्त होने वाला सुख अर्थात् पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति पूर्ण मुक्ति के लिए प्रयत्न करता हुआ (तत्) उसको (यत्रा) जिस अवस्थामें (वेत्ति) अनुभव करता है (च) और (एव) वास्तव में इस प्रकार (स्थितः) स्थित (अयम्) यह योगी (तत्त्वतः) तत्वज्ञानी (न,चलति) विचलित नहीं होता। (21)

    अध्याय 6 का श्लोक 22

    यम्, लब्ध्वा, च, अपरम्, लाभम्, मन्यते, न, अधिकम्, ततः,
    यस्मिन्, स्थितः, न, दुःखेन, गुरुणा, अपि, विचाल्यते।।22।।

    अनुवाद: (यम्) केवल एक पूर्ण परमात्मा की शास्त्रा अनुकूल साधना से एक ही प्रभु पर मन को रोकने वाले साधक जिस (लाभम्) लाभको (लब्ध्वा) प्राप्त होकर (ततः) उससे (अधिकम्) अधिक (अपरम्) दूसरा कुछ भी लाभ (न,मन्यते) नहीं मानता (च) और (यस्मिन्) जिस कारण से (स्थितः) सत्य भक्ति पर अडिग साधक (गुरुणा) बड़े भारी (दुःखेन) दुःखसे (अपि) भी (न, विचाल्यते) चलायमान नहीं होता। (22)

    अध्याय 6 का श्लोक 23

    तम्, विद्यात्, दुःखसंयोगवियोगम्, योगसज्ञितम्,
    सः, निश्चयेन, योक्तव्यः, योगः, अनिर्विण्णचेतसा।।23।।

    अनुवाद: (तम्) अज्ञान अंधकार से अज्ञात पूर्ण परमात्मा के (योगसज्ञितम्) वास्तविक भक्ति ज्ञान को (विद्यात्) जानना चाहिए। (दुःख संयोग) जो पापकर्मों के संयोग से उत्पन्न दुःख का (वियोगम्) अन्त अर्थात् छूटकारा करता है (सः) वह (योगः) भक्ति (अनिर्विण्णचेतसा) न उकताये अर्थात् न मुर्झाए् हुए चितसे (निश्चयेन) निश्चयपूर्वक (योक्तव्यः) करना कत्र्तव्य है अर्थात् करनी चाहिए। (23)

    अध्याय 6 का श्लोक 24

    संकल्पप्रभवान्, कामान्, त्यक्त्वा, सर्वान्, अशेषतः,
    मनसा, एव, इन्द्रियग्रामम्, विनियम्य, समन्ततः।।24।।

    अनुवाद: (संकल्पप्रभवान्) संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली (सर्वान्) सम्पूर्ण (कामान्) कामनाओंको (एव) वास्तव में (अशेषतः) जड़ामूल से अर्थात् समूल (त्यक्त्वा) त्यागकर और (मनसा) मनके द्वारा (इन्द्रियग्रामम्) इन्द्रियोंके (समन्ततः) सभी ओरसे (विनियम्य) भलीभाँति रोककर। (24)

    अध्याय 6 का श्लोक 25

    शनैः, शनैः, उपरमेत्, बुद्धया, धृतिगृृहीतया,
    आत्मसंस्थम्, मनः, कृत्वा, न, किंचित्, अपि, चिन्तयेत्।।25।।

    अनुवाद: (शनैः,शनैः) धीरे-धीरे अभ्यास करता हुआ (उपरमेत्) उपरोक्त दिए गए मत अर्थात् ज्ञान विचार द्वारा (धृतिगृृहीतया) धैर्ययुक्त (बुद्धया) बुद्धिके द्वारा (मनः) मनको (आत्मसंस्थम्) पूर्ण परमात्मा में टिका कर अर्थात् स्थित (कृत्वा) करके (किंचित्) कुछ (अपि) भी (न,चिन्तयेत्) चिन्तन न करे। (25)

    अध्याय 6 का श्लोक 26

    यतः, यतः, निश्चरति, मनः, चंचलम्, अस्थिरम्,
    ततः, ततः, नियम्य, एतत्, आत्मनि, एव, वशम्, नयेत्।।26।।

    अनुवाद: (एतत्) यह (अस्थिरम्) स्थिर न रहनेवाला और (चंचलम्) चंचल (मनः) मन (यतः,यतः) जहाँ-जहाँ (निश्चरति) विचरता है (ततः,ततः) उस उससे (नियम्य) हटाकर (आत्मनि) शास्त्र अनुकूल साधक पूर्ण परमात्मा की कृप्या पात्रा आत्मा अपने पूर्ण प्रभु के सहयोग से (एव) ही (वशम्) मनवश (नयेत्) करे। (26)

    अध्याय 6 का श्लोक 27

    प्रशान्तमनसम्, हि, एनम्, योगिनम्, सुखम्, उत्तमम्,
    उपैति, शान्तरजसम्, ब्रह्मभूतम्, अकल्मषम्।।27।।

    अनुवाद: (एनम्) शास्त्रा विधि त्यागकर साधना करना पाप है इसलिए इस पाप को (हि) निश्चय ही त्याग कर (प्रशान्तमनसम्) जिस शास्त्रा अनुकूल साधक का मन भली प्रकार एक पूर्ण परमात्मा में शांत है (अकल्मषम्) जो पापसे रहित है, (शान्तरजसम्) जो भौतिक सुख नहीं चाहता (ब्रह्मभूतम्) परमात्मा के हंस (योगिनम्) विधिवत् साधक को (उत्तमम्) उत्तम (सुखम्) आनन्द (उपैति) प्राप्त होता है अर्थात् पूर्ण मुक्ति प्राप्त होती है। (27)

    अध्याय 6 का श्लोक 28

    युज्न्, एवम्, सदा, आत्मानम्, योगी, विगतकल्मषः,
    सुखेन, ब्रह्मसंस्पर्शम्, अत्यन्तम्, सुखम्, अश्नुते।।28।।

    अनुवाद: (विगतकल्मषः) पापरहित (योगी) साधक (एवम्) इस प्रकार (सदा) निरन्तर (युज्न्) साधना करता हुआ (आत्मानम्) अपने समर्पण भाव से(सुखेन) सुखपूर्वक (ब्रह्मसंस्पर्शम्) पूर्ण परमात्मा के मिलन रूप (अत्यन्तम्) कभी समाप्त न होने वाले (सुखम्) आनन्दका (अश्नुते) अनुभव करता है अर्थात् पूर्ण मुक्त हो जाता है। (28)

    अध्याय 6 का श्लोक 29

    सर्वभूतस्थम्, आत्मानम्, सर्वभूतानि, च, आत्मनि,
    ईक्षते, योगयुक्तात्मा, सर्वत्रा, समदर्शनः।।29।।

    अनुवाद: (योगयुक्तात्मा) भक्तियुक्त आत्मावाला (सर्वत्रा) सबमें (समदर्शनः) समभावसे देखनेवाला (आत्मानम्) पूर्ण परमात्मा जो आत्मा के साथ अभेद रूप में है उसको (सर्वभूतस्थम्) सम्पूर्ण प्राणियों में स्थित (च) और (सर्वभूतानि) सम्पूर्ण प्राणियों को (आत्मनि) अपने समान अर्थात् जैसा दुःख व सुख अपने होता है इस दृष्टिकोण से(ईक्षते) देखता है। (29)

    (श्लोक नं 30-31 में अपनी भक्ति वाले साधक की स्थिति बताई है)

    अध्याय 6 का श्लोक 30

    यः, माम्, पश्यति, सर्वत्रा, सर्वम्, च, मयि, पश्यति,
    तस्य, अहम्, न, प्रणश्यामि, सः, च, मे, न, प्रणश्यति।।30।।

    अनुवाद: (यः) जो (सर्वत्रा) सब जगह (माम्) मुझे (पश्यति) देखता है (च) और (सर्वम्) सर्व को (मयि) मुझमें (पश्यति) देखता है (तस्य) उसके लिये (अहम्) मैं (न,प्रणश्यामि) अदृश्य नहीं होता (च) और (सः) वह (मे) मेरे से (न,प्रणश्यति) अदृश्य नहीं होता अर्थात् वह तो मेरे ही जाल में मेरी दृृष्टि है उसको पूर्ण ज्ञान नहीं है। (30)

  • अध्याय 6 का श्लोक 31

    सर्वभूतस्थितम्, यः, माम्, भजति, एकत्वम्, आस्थितः,
    सर्वथा, वर्तमानः, अपि, सः, योगी, मयि, वर्तते।।31।।

    अनुवाद: (यः) जो (एकत्वम्) एकीभावमें (आस्थितः) स्थित होकर (सर्वभूतस्थितम्) सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित (माम्) मुझे (भजति) भजता है (सः) वह (योगी) योगी (सर्वथा) सब प्रकारसे (वर्तमानः) इस समय (अपि) भी (मयि) मुझमें ही (वर्तते) बरतता है। (31)

    (श्लोक नं 32 में पूर्ण परमात्मा की भक्ति तत्व दर्शी संत से प्राप्त करके करता है वही सर्व श्रेष्ठ है)

    अध्याय 6 का श्लोक 32

    आत्मौपम्येन, सर्वत्रा, समम्, पश्यति, यः, अर्जुन,
    सुखम्, वा, यदि, वा, दुःखम्, सः, योगी, परमः, मतः।।32।।

    अनुवाद: (अर्जुन) हे अर्जुन! (यः) जो योगी (आत्मौपम्येन) शास्त्रा अनुकूल साधना से आत्मा पूर्ण परमात्मा की कृृप्या पात्रा हो जाती है उस पर प्रभु की विशेष कृृपा होने से वह स्वयं भी परमात्मा की उपमा जैसा हो जाता है, इसलिए आत्मा के साथ अभेद रूप में रहने वाले परमात्मा को (सर्वत्रा) सब जगह तथा सर्व प्राणियों में (समम्) सम (पश्यति) देखता है (वा) और (सुखम्) सुख (यदि,वा) अथवा (दुःखम्) दुःखको भी सबमें सम देखता है (सः) वह (मतः) शास्त्रानुकूल आचरण वाला (योगी) योगी (परमः) श्रेष्ठ है। (32)

    (अर्जुन उवाच)
    अध्याय 6 का श्लोक 33

    यः, अयम्, योगः, त्वया, प्रोक्तः, साम्येन, मधुसूदन,
    एतस्य, अहम्, न, पश्यामि, चंचलत्वात्, स्थितिम्, स्थिराम्।।33।।

    अनुवाद: (मधुसूदन) हे मधुसूदन! (यः) जो (अयम्) यह (योगः) योग (त्वया) आपने (साम्येन) समभावसे (प्रोक्तः) कहा है मनके (चंचलत्वात्) चंचल होनेसे (अहम्) मैं (एतस्य) इसकी (स्थिराम्) नित्य (स्थितिम्) स्थितिको (न) नहीं (पश्यामि) देखता हूँ। (33)

    अध्याय 6 का श्लोक 34

    चंचलम्, हि, मनः, कृष्ण, प्रमाथि, बलवत्, दृढम्,
    तस्य, अहम्, निग्रहम्, मन्ये, वायोः, इव, सुदुष्करम्।।34।।

    अनुवाद: (हि) क्योंकि (कृष्ण) हे श्रीकृृष्ण! यह (मनः) मन (चंचलम्) बड़ा चंचल (प्रमाथि) प्रमथन स्वभाववाला (दृृढम्) बड़ा दृढ़ और (बलवत्) बलवान् है। इसलिये (तस्य) उसका (निग्रहम्) वशमें करना (अहम्) मैं (वायोः) वायुको रोकनेकी (इव) भाँति (सुदुष्करम्) अत्यन्त दुष्कर (मन्ये) मानता हूँ। (34)

    (भगवान उवाच)
    अध्याय 6 का श्लोक 35

    असंशयम्, महाबाहो, मनः, दुर्निग्रहम्, चलम्,
    अभ्यासेन, तु, कौन्तेय, वैराग्येण, च, गृह्यते।।35।।

    अनुवाद: (महाबाहो) हे महाबाहो! (असंशयम्) निःसन्देह (मनः) मन (चलम्) चंचल और (दुर्निग्रहम्) कठिनतासे वशमें होनेवाला है (तु) परंतु (कौन्तेय) हे कुन्तीपुत्रा अर्जुन! यह (अभ्यासेन) अभ्यास (च) और (वैराग्येण) वैराग्यसे (गृह्यते) वशमें होता है। (35)

    अध्याय 6 का श्लोक 36

    असंयतात्मना, योगः, दुष्प्रापः, इति, मे, मतिः,
    वश्यात्मना, तु, यतता, शक्यः, अवाप्तुम्, उपायतः।।36।।

    अनुवाद: (असंयतात्मना) जिसका मन वशमें किया हुआ नहीं है अर्थात् जो संयमी नहीं ऐसे पुरुषद्वारा (योगः) भक्ति (दुष्प्रापः) दुष्प्राप्य है (तु) परन्तु (वश्यात्मना) शास्त्रा विधि अनुसार साधना करने वाले अर्थात् मनमानी पूजा न करके वशमें किये हुए मनवाले (यतता) प्रयत्नशील पुरुषद्वारा (उपायतः) साधनसे उसका (अवाप्तुम्) प्राप्त होना (शक्यः) सम्भव है (इति) यह (मे) मेरा (मतिः) मत अर्थात् विचार है। (36)

    (अर्जुन उवाच)
    अध्याय 6 का श्लोक 37

    अयतिः, श्रद्धया, उपेतः, योगात्, चलितमानसः,
    अप्राप्य, योगसंसिद्धिम्, काम्, गतिम्, कृष्ण, गच्छति।।37।।

    अनुवाद: (कृष्ण) हे श्रीकृृष्ण! (श्रद्धया, उपेतः) जो योगमें श्रद्धा रखनेवाला है, किंतु (अयतिः) जो संयमी नहीं है (योगात्चलितमानसः) जिसका मन योगसे विचलित हो गया है, ऐसा साधक योगी (योगसंसिद्धिम्) योगकी सिद्धिको अर्थात् (अप्राप्य)न प्राप्त होकर (काम्)किस (गतिम्) गतिको (गच्छति) प्राप्त होता है। (37)

    अध्याय 6 का श्लोक 38

    कच्चित्, न, उभयविभ्रष्टः, छिन्नाभ्रम्, इव, नश्यति,
    अप्रतिष्ठः, महाबाहो, विमूढः, ब्रह्मणः, पथि।।38।।

    अनुवाद: (महाबाहो) हे महाबाहो! (कच्चित्) क्या वह (ब्रह्मणः) पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति के (पथि) मार्ग से (विमूढः) भटका हुआ मूर्ख (अप्रतिष्ठः) शास्त्रा विधि त्याग कर साधना करने वाले साधक को प्रभु का आश्रय प्राप्त नहीं होता ऐसा आश्रयरहित पुरुष (छिन्नाभ्रम्) छिन्न भिन्न बादलकी (इव) भाँति (उभयविभ्रष्टः) दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर (न, नश्यति) नष्ट तो नहीं हो जाता? दुष्प्राय है अर्थात् भक्ति लाभ नहीं है। वह योग तो मनवश किए हुए को ही शक्य है। विचार करें फिर श्लोक 40 का यह अर्थ करना कि वह योग भ्रष्ट व्यक्ति न तो इस लोक में नष्ट होता है न परलोक में, न्याय संगत नहीं है। क्योंकि अध्याय 6 श्लोक 42 से 44 में भी यही प्रमाण है कहा है योग भ्रष्ट व्यक्ति योग भ्रष्ट होने से पूर्व के भक्ति संस्कार से कुछ दिन स्वर्ग में जाता है फिर अच्छे कुल में जन्म प्राप्त करता है परन्तु पुनः वह मानव जन्म इस लोक में अत्यन्त दुर्लभ है। यदि मानव जन्म प्राप्त हो जाता है तो पूर्व के स्वभाववश मनमाना आचरण करके तत्वज्ञान का उल्लंघन कर जाता है। अर्थात् नष्ट हो जाता है। इसलिए श्लोक 40 का अनुवाद उपरोक्त सही है। अध्याय 6 श्लोक 45 में भी स्पष्ट है। (38)

    अध्याय 6 का श्लोक 39

    एतत्, मे, संशयम्, कृष्ण, छेत्तुम्, अर्हसि, अशेषतः,
    त्वदन्यः, संशयस्य, अस्य, छेत्ता, न, हि, उपपद्यते।।39।।

    अनुवाद: (कृृष्ण) हे श्रीकृृष्ण! (मे) मेरे (एतत्) इस (संशयम्) संशयको (अशेषतः) सम्पूर्णरूपसे (छेत्तुम्) छेदन करनेके लिये आपही (अर्हसि) योग्य हैं (हि) क्योंकि (त्वदन्यः) आपके सिवा दूसरा (अस्य) इस (संशयस्य) संशयका (छेत्ता) छेदन करनेवाला (न,उपपद्यते) मिलना सम्भव नहीं है। (39)

    भावार्थ:- श्लोक 40 से 44 का भावार्थ है कि पहले वाले सर्व शुभ व अशुभ कर्मों का भोग स्वर्ग-नरक में भोग कर पिछले भक्ति स्वभाव के अनुसार तो भक्ति की तड़फ बन जाती है तथा पिछले स्वभाव से ही फिर पथ भ्रष्ट हो जाता है अर्थात् पूर्ण संत न मिलने के कारण कभी मुक्त नहीं होता।

    (भगवान उवाच)
    अध्याय 6 का श्लोक 40

    पार्थ, न, एव, इह, न, अमुत्रा, विनाशः, तस्य, विद्यते,
    न, हि, कल्याणकृत्, कश्चित्, दुर्गतिम्, तात, गच्छति।।40।।

    अनुवाद: (पार्थ) हे पार्थ! (एव) वास्तव में पथ भ्रष्ट साधक (न) न तो (इह) यहाँ का रहता है (न) न (अमुत्रा) वहाँ का रहता है। (तस्य) उसका (विनाशः) विनाश ही (विद्यते) जाना जाता है (हि) निसंदेह (कश्चित्) कोई भी व्यक्ति जो (न कल्याणकृृत्) अन्तिम स्वांस तक मर्यादा से आत्म कल्याण के लिए कर्म करने वाला नहीं है अर्थात् जो योग भ्रष्ट हो जाता है (तात) हे प्रिय वह तो (दुर्गतिम्) दुर्गति को (गच्छति) चला जाता है अर्थात् प्राप्त होता है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 4 श्लोक 40 में भी है। (40)

    भावार्थ:- गीता जी अन्य अनुवाद कर्ताओं ने इस श्लोक 40 में लिखा है कि योग भ्रष्ट अर्थात् जिसका मन वश नहीं है वह साधक इस लोक में भी नष्ट नहीं होता तथा परलोक में भी नष्ट नहीं होता। जबकि अध्याय 6 श्लोक 36 में लिखा है कि मेरे मत (विचार) अनुसार जिसका मन वश नहीं है उस को भक्ति (योग) का लाभ मिलना दुष्प्राप्य है अर्थात् भक्ति लाभ नहीं है। वह योग तो मन वश किए हुए को ही शक्य है।

    विचार करें फिर श्लोक 40 का यह अर्थ करना कि वह योग भ्रष्ट व्यक्ति न तो इस लोक में नष्ट होता है न परलोक में न्याय संगत नहीं है। क्योंकि अध्याय 6 श्लोक 42 से 44 तक में भी यही प्रमाण है कहा है योग भ्रष्ट व्यक्ति योग भ्रष्ट होने से पूर्व के भक्ति संस्कार से कुछ दिन स्वर्ग में जाता है फिर अच्छे कुल में मानव जन्म प्राप्त करता है। परन्तु पुनः वह मानव जन्म इस लोक मे अत्यन्त दुर्लभ है। यदि मानव जन्म प्राप्त हो जाता है तो पूर्व के स्वभाव वश मनमाना आचरण करके तत्वज्ञान का उल्लंघन कर जाता है अर्थात् नष्ट हो जाता है। इसलिए श्लोक 40 का अनुवाद उपरोक्त सही है अध्याय 6 श्लोक 45 में भी स्पष्ट है।

    उदाहरण:- जड़भरत नाम के योगी का एक हिरण के बच्चे में मोह हो जाने से भक्ति मार्ग से भ्रष्ट होने से हिरण का ही जन्म प्राप्त हुआ तथा दुर्गति को प्राप्त हुआ।

  • अध्याय 6 का श्लोक 41

    प्राप्य, पुण्यकृताम्, लोकान्, उषित्वा, शाश्वतीः, समाः,
    शुचीनाम्, श्रीमताम्, गेहे, योगभ्रष्टः, अभिजायते।।41।।

    अनुवाद: (योगभ्रष्टः) योगभ्रष्ट पुरुष (पुण्यकृृताम्) चैरासी लाख योनियों के कष्ट के बाद पुण्य कर्मों के आधार पर पुण्यवानोंके (लोकान्) लोकोंको अर्थात् स्वर्गादि लोकोंको (प्राप्य) प्राप्त होकर उनमें (शाश्वतीः) वेद वाणी के आधार से नियत (समाः) समय तक (उषित्वा) निवास करके फिर (शुचीनाम्) शुद्ध आचरणवाले (श्रीमताम्) अच्छे विचारों वाले अर्थात् श्रेष्ठ व्यक्तियों के (गेहे) घरमें (अभिजायते) जन्म लेता है, नीचे वाले श्लोक 43 में कहा है कि ऐसा जन्म दुर्लभ है। (41)

    अध्याय 6 का श्लोक 42

    अथवा, योगिनाम्, एव, कुले, भवति, धीमताम्,
    एतत्, हि, दुर्लभतरम्, लोके, जन्म, यत्, ईदृृशम्।।42।।

    अनुवाद: (अथवा) अथवा (धीमताम्) ज्ञानवान् (योगिनाम्) योगियोंके (कुले) कुलमें (भवति) जन्म लेता है। (एव) वास्तव में (ईदृशम्) इस प्रकारका (यत्) जो (एतत्) यह (जन्म) जन्म है सो (लोके) संसारमें (हि) निःसन्देह (दुर्लभतरम्) अत्यन्त दुर्लभ है। (42)

    अध्याय 6 का श्लोक 43

    तत्र, तम्, बुद्धिसंयोगम्, लभते, पौर्वदेहिकम्,
    यतते, च, ततः, भूयः, संसिद्धौ, कुरुनन्दन।।43।।

    अनुवाद: यदि (तत्र) वहाँ (तम्) वह (पौर्वदेहिकम्) पहले शरीरमें संग्रह किये हुए (बुद्धिसंयोगम्) बुद्धिके संयोगको अनायास ही (लभते) प्राप्त हो जाता है (च) और (कुरुनन्दन) हे कुरुनन्दन! (ततः) उसके पश्चात् (भूयः) फिर (संसिद्धौ) परमात्माकी प्राप्तिरूप सिद्धिके लिये (यतते) प्रयत्न करता है। (43)

    अध्याय 6 का श्लोक 44

    पूर्वाभ्यासेन, तेन, एव, ह्रियते, हि, अवशः, अपि, सः,
    जिज्ञासुः, अपि, योगस्य, शब्दब्रह्म, अतिवर्तते।।44।।

    अनुवाद: (सः) वह पथभ्रष्ट साधक (अवशः) स्वभाव वश विवश हुआ (अपि) भी (तेन) उस (पूर्वाभ्यासेन) पहलेके अभ्याससे (एव) ही वास्तव में (ह्रियते) आकर्षित किया जाता है (हि) क्योंकि (योगस्य)परमात्मा की भक्ति का (जिज्ञासुः) जिज्ञासु (अपि) भी (शब्दब्रह्म) परमात्मा की भक्ति विधि जो सद्ग्रन्थों में वर्णित है उस विधि अनुसार साधना न करके पूर्व के स्वभाव वश विचलित होकर उस वास्तविक नाम का जाप न करके प्रभु की वाणी रूपी आदेश का (अतिवर्तते) उल्लंघन कर जाता है। क्योंकि पूर्व स्वभाववश फिर विचलित हो जाता है। इसीलिए गीता अध्याय 7 श्लोक 16-17 में जिज्ञासु को अच्छा नहीं कहा है केवल ज्ञानी भक्त जो एक परमात्मा की भक्ति करता है वह श्रेष्ठ कहा है। गीता अध्याय 18 श्लोक 58 में भी प्रमाण है। (44)

    अध्याय 6 का श्लोक 45

    प्रयत्नात्, यतमानः, तु, योगी, संशुद्धकिल्बिषः,
    अनेकजन्मसंसिद्धः, ततः, याति, पराम्, गतिम्।।45।।

    अनुवाद: (तु) इसके विपरीत (यतमानः) शास्त्रा अनुकुल साधक जिसे पूर्ण प्रभु का आश्रय प्राप्त है वह संयमी अर्थात् मन वश किया हुआ प्रयत्नशील(प्रयत्नात्) सत्यभक्ति के प्रयत्न से (अनेकजन्मसंसिद्धः) अनेक जन्मों की भक्ति की कमाई से (योगी) भक्त (संशुद्धकिल्बिषः) पाप रहित होकर (ततः) तत्काल उसी जन्म में (पराम् गतिम्) श्रेष्ठ मुक्ति को (याति) प्राप्त हो जाता है। (45)

    अध्याय 6 का श्लोक 46

    तपस्विभ्यः, अधिकः, योगी, ज्ञानिभ्यः, अपि, मतः, अधिकः,
    कर्मिभ्यः, च, अधिकः, योगी, तस्मात्, योगी, भव, अर्जुन।।46।।

    अनुवाद: भगवान कह रहा है कि (योगी) तत्वदर्शी संत से ज्ञान प्राप्त करके साधना करने वाला नाम साधक मेरे द्वारा दिया (मतः) अटकल लगाया साधना का मत अर्थात् पूजा विधि के ज्ञान अनुसार जो श्लोक 10 से 15 तक में हठ योग का विवरण दिया है उनमें जो हठ करके भक्ति कर्म से जो साधना करते हैं उन (तपस्विभ्यः) तपस्वियों से (ज्ञानिभ्यः) गीता अध्याय 7 श्लोक 16-17 में वर्णित ज्ञानियों से (च) तथा (कर्मिभ्य) कर्म करने वाले से अर्थात् शास्त्राविरूद्ध साधना करने वालों से (अपि) भी (अधिकः) श्रेष्ठ है। (तस्मात्) इसलिए (अर्जुन) हे अर्जुन गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में कहे तत्वदर्शी संत की खोज करके उस से उपदेश प्राप्त करके (योगी) शास्त्रा अनुकूल भक्त (भव) हो। गीता अध्याय 2 श्लोक 39 से 53 तक में कहा है कि हे अर्जुन! जिस समय तेरा मन भाँति-भाँति के ज्ञान वचनों से हट कर एक तत्वज्ञान पर स्थित हो जाएगा तब तो तू योग को प्राप्त होगा अर्थात् योगी बनेगा। (46)

    अध्याय 6 का श्लोक 47

    योगिनाम्, अपि, सर्वेषाम्, मद्गतेन, अन्तरात्मना,
    श्रद्धावान्, भजते, यः, माम्, सः, मे, युक्ततमः, मतः।।47।।

    अनुवाद: (सर्वेषाम्) सर्व (योगिनाम्) योगियों में (अपि) भी (यः) जो (श्रद्धावान) श्रद्धावान साधक (मत्गतेन) मेरे द्वारा दिए भक्ति मत अनुसार (अन्तरात्माना) अन्तरात्मा से (माम्) मुझको (भजते) भजता है (सः) वह योगी (मे) मेरे (मतः) मत अनुसार (युक्ततमः) यथार्थ विधि से भक्ति में लीन है। (47)

    भावार्थ:- तत्वज्ञान प्राप्त साधक वास्तव में शास्त्राअनुकूल साधक अर्थात् योगी है। वह ब्रह्म काल का ओं (ॐ) नाम का जाप विधिवत् करता है ओं नाम का जाप विधिवत् करना है मेरे नाम की जाप कमाई ब्रह्म को त्याग देता है तथा फिर पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।

    (इति अध्याय छठा)